भगवद्गीता 5.3 — सच्चा संन्यासी कौन है?
ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति ।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥ ५.३ ॥
हे महाबाहो अर्जुन! जो न किसी से द्वेष करता है और न किसी वस्तु की आकांक्षा करता है, उसे ही सच्चा नित्यसंन्यासी जानना चाहिए। क्योंकि जो द्वन्द्वों से ऊपर उठ जाता है, वह सहज ही संसार के बन्धनों से मुक्त हो जाता है।
पदच्छेद
संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।
शब्दार्थ
| पंक्ति 1 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| ज्ञेयः | जानने योग्य है |
| सः | वह |
| नित्यसंन्यासी | सदा संन्यासी |
| यः | जो |
| न | न |
| द्वेष्टि | द्वेष करता है |
| न | न |
| काङ्क्षति | कामना करता है |
| पंक्ति 2 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| निर्द्वन्द्वः | द्वन्द्वों से रहित |
| हि | निश्चय ही |
| महाबाहो | हे महाबाहो अर्जुन! |
| सुखम् | सहज ही |
| बन्धात् | बंधन से |
| प्रमुच्यते | मुक्त हो जाता है |
| पंक्ति 1 | पंक्ति 2 | ||
|---|---|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ | संस्कृत शब्द | अर्थ |
| ज्ञेयः | जानने योग्य है | निर्द्वन्द्वः | द्वन्द्वों से रहित |
| सः | वह | हि | निश्चय ही |
| नित्यसंन्यासी | सदा संन्यासी | महाबाहो | हे महाबाहो अर्जुन! |
| यः | जो | सुखम् | सहज ही |
| न | न | बन्धात् | बंधन से |
| द्वेष्टि | द्वेष करता है | प्रमुच्यते | मुक्त हो जाता है |
| न | न | ||
| काङ्क्षति | कामना करता है | ||
विस्तृत विवरण
परिचय
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण संन्यास की एक बिल्कुल नई और आंतरिक परिभाषा देते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि सच्चा संन्यास बाहरी रूप या जीवनशैली से नहीं, बल्कि मन की अवस्था से पहचाना जाता है।
भावार्थ
सच्चे संन्यासी की नई परिभाषा
भगवान श्रीकृष्ण यहाँ स्पष्ट कर रहे हैं कि संन्यास का संबंध कपड़ों, स्थान या बाहरी त्याग से नहीं, बल्कि मन की स्थिति से है।
यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति: हमारा मन पूरे दिन दो ध्रुवों के बीच डोलता रहता है। कभी हम किसी व्यक्ति या परिस्थिति से नफरत करते हैं और उसे दूर करना चाहते हैं, तो कभी किसी वस्तु या उपलब्धि को पाने की तीव्र इच्छा करते हैं। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो व्यक्ति संसार में रहते हुए भी इन दोनों मानसिक प्रवृत्तियों से मुक्त है, वही वास्तविक संन्यासी है।
नित्यसंन्यासी: यदि कोई व्यक्ति जंगल में चला जाए, लेकिन उसके मन में अभी भी इच्छाएँ, आसक्तियाँ और द्वेष भरे हों, तो वह सच्चा संन्यासी नहीं है। इसके विपरीत यदि कोई व्यक्ति संसार में रहकर अपने कर्तव्यों का पालन कर रहा है, परन्तु भीतर से शांत और संतुलित है, तो वही नित्य संन्यासी है।
निर्द्वन्द्वो हि सुखं बन्धात्प्रमुच्यते: सुख-दुख, लाभ-हानि, मान-अपमान और ठंड-गर्मी जैसे द्वंद्व जीवन का हिस्सा हैं। जो व्यक्ति इन्हें सहज रूप से स्वीकार कर लेता है, वह बिना किसी कठिन संघर्ष के मानसिक बंधनों से मुक्त होने लगता है।
हमारे जीवन के लिए संदेश
यह श्लोक मानसिक स्वतंत्रता का अत्यंत व्यावहारिक सूत्र देता है।
ऑफिस और घर का संन्यास: आज अधिकांश मानसिक तनाव राग और द्वेष से पैदा होता है। किसी की सफलता देखकर ईर्ष्या होना या अपनी इच्छाओं की पूर्ति न होने पर बेचैन होना ही हमारे बंधन हैं।
भगवान श्रीकृष्ण सिखाते हैं कि अपनी पूरी क्षमता से कर्म करो, लेकिन परिणामों और परिस्थितियों से अपनी मानसिक शांति को मत बाँधो। जब यह आसक्ति समाप्त होने लगती है, तब व्यक्ति संसार में रहकर भी भीतर से मुक्त और शांत हो जाता है।
आगे का विषय
भगवान श्रीकृष्ण ने संन्यास की आंतरिक परिभाषा तो स्पष्ट कर दी, किन्तु अब एक और महत्वपूर्ण भ्रम शेष रहता है। अगले श्लोक में वे बताएंगे कि ज्ञानयोग और कर्मयोग को एक-दूसरे से अलग मानना क्यों अधूरी समझ का परिणाम है।
इस श्लोक में छिपे संदेश
इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।
सूत्र
वस्त्र बदलना संन्यास नहीं, दृष्टि बदलना संन्यास है।
द्वेष हमें उसी वस्तु से बाँधे रखता है जिससे हम दूर होना चाहते हैं।
असीम इच्छाएँ मन को दास बनाती हैं।
जो परिस्थितियों से नहीं हिलता, वही वास्तव में स्वतंत्र है।
बन्धन बाहर नहीं, मन के भीतर होते हैं।
त्याग का अर्थ खोना नहीं, स्वतंत्र होना है।
जहाँ राग-द्वेष समाप्त होते हैं, वहीं शान्ति प्रारम्भ होती है।