भगवद्गीता 6.18 — जब मन आत्मा में स्थित हो जाता है तब योग सिद्ध माना जाता है
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा॥ ६.१८॥
जब साधक का संयमित चित्त आत्मा में ही स्थिर हो जाता है और वह समस्त कामनाओं से निःस्पृह हो जाता है, तब उसे वास्तव में योगयुक्त कहा जाता है।
पदच्छेद
संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।
शब्दार्थ
| पंक्ति 1 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| यदा | जब |
| विनियतं | भलीभाँति संयमित |
| चित्तम् | चित्त |
| आत्मनि | आत्मा में |
| एव | ही |
| अवतिष्ठते | स्थित हो जाता है |
| पंक्ति 2 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| निःस्पृहः | स्पृहारहित |
| सर्वकामेभ्यः | समस्त कामनाओं से |
| युक्तः | योगयुक्त |
| इति | ऐसा |
| उच्यते | कहा जाता है |
| तदा | तब |
| पंक्ति 1 | पंक्ति 2 | ||
|---|---|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ | संस्कृत शब्द | अर्थ |
| यदा | जब | निःस्पृहः | स्पृहारहित |
| विनियतं | भलीभाँति संयमित | सर्वकामेभ्यः | समस्त कामनाओं से |
| चित्तम् | चित्त | युक्तः | योगयुक्त |
| आत्मनि | आत्मा में | इति | ऐसा |
| एव | ही | उच्यते | कहा जाता है |
| अवतिष्ठते | स्थित हो जाता है | तदा | तब |
विस्तृत विवरण
परिचय
यहाँ भगवान श्रीकृष्ण उस अवस्था का वर्णन करते हैं जिसमें साधक का मन पूरी तरह संयमित होकर आत्मा में स्थित हो जाता है और सभी सांसारिक इच्छाओं से ऊपर उठ जाता है।
भावार्थ
श्रीकृष्ण का गहरा आध्यात्मिक विश्लेषण
भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक में योग की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि का वर्णन करते हैं। यह वह अवस्था है जहाँ मन अब बाहरी विषयों में भटकना छोड़ देता है और अपनी वास्तविक प्रकृति में स्थिर होने लगता है।
यदा विनियतं चित्तम्: मन का संयमित होना योग का मूल आधार है। सामान्यतः मन अनेक इच्छाओं, स्मृतियों और कल्पनाओं के बीच भटकता रहता है। जब अभ्यास और वैराग्य के द्वारा वह नियंत्रित हो जाता है, तब साधना गहराई पकड़ती है।
आत्मन्येवावतिष्ठते: संयमित मन बाहरी वस्तुओं से हटकर आत्मा में स्थित होने लगता है। साधक की प्रसन्नता अब बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं रहती, बल्कि भीतर से उत्पन्न होने लगती है।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यः: इसका अर्थ इच्छाओं का दमन नहीं है, बल्कि उनसे स्वतंत्र हो जाना है। साधक अब वस्तुओं का उपयोग तो करता है, लेकिन उनकी प्राप्ति या अप्राप्ति से उसकी शांति प्रभावित नहीं होती।
युक्त इत्युच्यते: ऐसी अवस्था को ही वास्तविक योग कहा गया है। यहाँ योग केवल अभ्यास नहीं, बल्कि एक स्थायी चेतना-अवस्था बन जाता है।
भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि जब मन आत्मा में स्थिर हो जाता है, तब व्यक्ति बाहरी आकर्षणों से मुक्त होकर सच्ची स्वतंत्रता का अनुभव करता है।
हमारे जीवन के लिए संदेश (Freedom from Dependency)
खुशी को बाहरी वस्तुओं पर निर्भर मत बनाइए: जब तक हमारी प्रसन्नता किसी वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति पर आधारित है, तब तक हम वास्तव में स्वतंत्र नहीं हैं।
व्यावहारिक तरीका: प्रतिदिन कुछ समय अपने भीतर के अनुभवों पर ध्यान दें। धीरे-धीरे ऐसी गतिविधियाँ विकसित करें जो केवल बाहरी उपलब्धियों पर आधारित न हों। इससे आत्मनिर्भर प्रसन्नता विकसित होने लगती है।
आगे का विषय
भगवान श्रीकृष्ण ने अब उस अवस्था का परिचय दिया जहाँ मन आत्मा में स्थित हो जाता है। अगले श्लोक में वे इस स्थिर और एकाग्र मन की तुलना एक अत्यंत सुंदर और प्रसिद्ध उपमा के माध्यम से करते हैं।
इस श्लोक में छिपे संदेश
इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।
सूत्र
संयमित चित्त ही आत्मा में स्थिर हो सकता है।
आत्मा में स्थित होने पर बाहरी आकर्षण अपना प्रभाव खो देते हैं।
कामनाओं की कमी से मन की शान्ति बढ़ती है।
योग की पहचान चित्त की स्थिरता है।
जो भीतर तृप्त है, वह बाहर कम भटकता है।
निःस्पृहता आन्तरिक स्वतंत्रता का द्वार है।
सच्ची सम्पन्नता इच्छाओं की पूर्ति से नहीं, इच्छाओं के अतिक्रमण से आती है।