5.15
अज्ञान ही बन्धन का कारण है
आत्मा न किसी के पाप को ग्रहण करती है और न पुण्य को; अज्ञान ही जीव को वास्तविक स्वरूप से दूर कर मोह में रखता है।
जीवन में उपयोग: समस्याओं के लिए केवल बाहरी परिस्थितियों को दोष देने के बजाय अपने दृष्टिकोण और समझ की समीक्षा करें।