मोह पर भगवद्गीता

82 श्लोक, अर्थ और जीवन में उपयोग सहित

"मोह" में सहायक भगवद्गीता के श्लोक 82 श्लोक, अर्थ, मूल शिक्षा और व्यावहारिक उपयोग सहित।

मोह अपनों, वस्तुओं या अपनी धारणाओं से ऐसा गहरा लगाव है जिसमें सही-गलत का विवेक ढक जाता है। संतान के प्रति अंधा स्नेह, बीत चुके रिश्ते से न निकल पाना या अपने पक्ष को हमेशा सही मानना, ये सब मोह के रूप हैं। प्रेम हमें खोलता है, जबकि मोह हमें बाँधता है और दृष्टि को संकरा कर देता है।

गीता का आरंभ ही मोह से घिरी दृष्टि से होता है: गीता 1.1 में धृतराष्ट्र 'मेरे' और 'पाण्डु के' पुत्रों का भेद करते हैं। आगे गीता 2.13 सिखाती है कि देह बदलती है, आत्मा नहीं, इसलिए धीर पुरुष मोहित नहीं होता। गीता 2.18 में शरीर को नाशवान और आत्मा को अविनाशी जानकर कर्तव्य निभाने की बात है। गीता 4.35 के अनुसार ज्ञान से मोह मिटता है और सबमें एकत्व का दर्शन होता है।

जब मोह अपने बल पर न छूटे, तो गीता 7.14 ईश्वर की शरण और श्रेष्ठ मार्गदर्शन की ओर संकेत करती है। गीता 18.73 में अर्जुन कहते हैं कि उनका मोह नष्ट हुआ, स्मृति मिली और संशय दूर हुआ। इसलिए संबंध निभाएँ, पर निर्णय में 'अपने-पराए' के पक्षपात को पहचानें और निष्पक्ष विवेक से सोचें।

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6.4

ध्यानयोग

योगारूढ़ की पहचान

आसक्ति और संकल्पों का त्याग ही योगारूढ़ होने की पहचान है।

गीता में कहाँ

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गुण

जीवन-क्षेत्र

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विषय

आधुनिक संदर्भ

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गीता के अनुसार मोह से कैसे छुटकारा पाएँ?
गीता ज्ञान और शरणागति को उपाय बताती है। गीता 4.35 के अनुसार सच्चा ज्ञान मिलने पर मोह नहीं रहता, और गीता 7.14 में भगवान की शरण को माया पार करने का साधन कहा गया है। साथ ही आत्मा और शरीर का भेद समझना मोह की पकड़ ढीली करता है।
गीता 18.73 में अर्जुन का मोह कैसे दूर हुआ?
अर्जुन स्वीकार करते हैं कि भगवान् की कृपा से उनका मोह नष्ट हो गया, उन्हें अपने स्वरूप और कर्तव्य की स्मृति मिली और संशय दूर हो गया। इसके बाद वे स्थिर होकर आज्ञा के अनुसार कर्म करने को तैयार होते हैं। इसे गीता-उपदेश का फल माना गया है।
मोह और प्रेम में क्या अंतर है?
प्रेम दूसरे के कल्याण को देखता है, जबकि मोह अपनी पकड़ और पक्षपात को। गीता 1.1 में 'मेरे' और 'उनके' का भेद मोह-ग्रस्त दृष्टि का उदाहरण है। रिश्तों में स्नेह रखते हुए भी निष्पक्ष विवेक बनाए रखना मोह से बचने का व्यावहारिक तरीका है।
गीता 2.13 बिछड़ने और परिवर्तन के मोह के बारे में क्या कहती है?
गीता 2.13 के अनुसार शरीर की अवस्थाएँ बदलती रहती हैं और मृत्यु भी उसी क्रम का एक परिवर्तन है, पर आत्मा वही रहती है। इसे समझने वाला धीर पुरुष इस परिवर्तन से मोहित नहीं होता। यह दृष्टि प्रियजनों के वियोग और जीवन के बदलावों को स्वीकारने में सहायता करती है।
गीता 7.14 के अनुसार माया से पार कैसे जाएँ?
गीता 7.14 कहती है कि गुणमयी माया को अपने प्रयास से पार करना अत्यंत कठिन है, पर जो भगवान् की शरण लेते हैं वे उसे सरलता से पार कर लेते हैं। व्यावहारिक अर्थ यह है कि जब उलझनें अपने बल पर न सुलझें, तो अहंकार छोड़कर श्रेष्ठ मार्गदर्शन की शरण लें।

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