अध्याय 15 पुरुषोत्तम योग

20 श्लोक

यह अध्याय जीवन के गहन उद्देश्य और परम सत्य का अत्यंत सुंदर चित्र प्रस्तुत करता है। श्रीकृष्ण संसार की तुलना एक उल्टे अश्वत्थ वृक्ष से करते हैं जिसकी जड़ें उच्च आध्यात्मिक सत्य में स्थित हैं। इस अध्याय से हमें यह सीखने को मिलता है कि आसक्ति हमें नश्वर वस्तुओं में बाँधे रखती है, जबकि अपने शाश्वत स्वरूप को पहचानना वास्तविक स्वतंत्रता की ओर ले जाता है। यह अध्याय मनुष्य को उस परम पुरुष की ओर उन्मुख करता है जो सम्पूर्ण जीवन का आधार और अंतिम लक्ष्य है।

श्लोक सूची

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श्लोक 1 संसार-वृक्ष: ऊपर मूल, नीचे शाखाएँ श्रीभगवानुवाच । ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् । छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥ १५.१ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा—इस संसार को एक पीपल (अश्वत्थ) वृक्ष के रूप में बताया गया है, जिसका मूल ऊपर परमात्मा में है और शाखाएँ नीचे की ओर फैली हैं। यह प्रवाह रूप से अविनाशी कहा गया है। वेद इसके पत्ते हैं—अर्थात् वेद इसकी रक्षा और पोषण करते हैं। जो इस वृक्ष को उसके मूल-सहित यथार्थ रूप में जान लेता है, वही वास्तव में वेद का तात्पर्य जानने वाला है। → श्लोक 2 गुणों से पोषित संसार-वृक्ष और कर्मों के बन्धन अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः । अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥ १५.२ ॥ उस संसार-वृक्ष की शाखाएँ नीचे और ऊपर—सब योनियों और लोकों में—फैली हुई हैं। वे सत्त्व, रज और तम गुणों से बढ़ती हैं और इन्द्रियों के विषय उसकी कोंपलें हैं। मनुष्य लोक में कर्मों के अनुसार बाँधने वाली वासनारूप जड़ें भी नीचे की ओर निरन्तर फैली रहती हैं। → श्लोक 3 असङ्गता के शस्त्र से संसार-वृक्ष का छेदन न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा । अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलमसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥ १५.३ ॥ इस संसार-वृक्ष का जैसा स्वरूप बताया गया है, वैसा यहाँ दिखाई नहीं देता; न इसका आदि दिखता है, न अन्त और न इसकी ठीक-ठीक स्थिति। इसलिए अत्यन्त दृढ़ जड़ों वाले इस संसार-रूप वृक्ष को दृढ़ असङ्गता (वैराग्य) रूपी शस्त्र से काटकर आगे बढ़ना चाहिए। → श्लोक 4 उस परम पद की खोज जहाँ से लौटना नहीं होता ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः । तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥ १५.४ ॥ संसार-वृक्ष को वैराग्य से काटने के बाद उस परम पद की खोज करनी चाहिए, जिसे प्राप्त कर लेने पर मनुष्य फिर संसार में नहीं लौटते। साधक को यह भाव रखना चाहिए कि 'जिस आदि पुरुष परमात्मा से यह अनादि सृष्टि-प्रवाह फैला है, मैं उसी की शरण लेता हूँ।' → श्लोक 5 अमूढ़ पुरुष कौन? जो अव्यय पद को प्राप्त करता है निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः । द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ॥ १५.५ ॥ जो मान और मोह से रहित हैं, जिन्होंने आसक्ति के दोष को जीत लिया है, जो निरन्तर परमात्म-तत्त्व में स्थित रहते हैं, जिनकी कामनाएँ समाप्त हो चुकी हैं और जो सुख-दुःख नामक द्वन्द्वों से मुक्त हैं—ऐसे मोह रहित ज्ञानीजन उस अविनाशी परम पद को प्राप्त होते हैं। → श्लोक 6 परम धाम: जहाँ सूर्य, चन्द्र और अग्नि का प्रकाश भी नहीं पहुँचता न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः । यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥ १५.६ ॥ उस परम धाम को न सूर्य प्रकाशित करता है, न चन्द्रमा और न अग्नि; वह स्वयं-प्रकाश है। जिसे प्राप्त करके जीव फिर संसार में नहीं लौटते, वही मेरा परम धाम है। → श्लोक 7 जीव परमात्मा का सनातन अंश है ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः । मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥ १५.७ ॥ इस जीवलोक में जीव मेरा ही सनातन अंश है। वही प्रकृति में स्थित होकर पाँच इन्द्रियों और छठे मन को अपनी ओर आकर्षित करता है, अर्थात् उनसे सम्बन्ध जोड़कर संसार में बँध जाता है। → श्लोक 8 जीवात्मा नये शरीर में मन-इन्द्रियों को साथ ले जाता है शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः । गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥ १५.८ ॥ देह का स्वामी जीवात्मा जब नया शरीर प्राप्त करता है या पुराने शरीर को छोड़ता है, तब इन मन और इन्द्रियों को अपने साथ ले जाता है—जैसे वायु पुष्प आदि के स्थान से गन्ध को अपने साथ ले जाती है। → श्लोक 9 जीव इन्द्रियों और मन का आश्रय लेकर विषयों का भोग करता है श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च । अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥ १५.९ ॥ यह जीवात्मा कान, आँख, त्वचा, जीभ और नाक—इन पाँच इन्द्रियों तथा मन का आश्रय लेकर शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध आदि विषयों का सेवन करता है। → श्लोक 10 जीवात्मा को मूढ़ नहीं, ज्ञान-चक्षु वाले देखते हैं उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् । विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ॥ १५.१० ॥ शरीर छोड़ते समय, शरीर में रहते समय अथवा गुणों से युक्त होकर विषयों को भोगते समय—जीवात्मा के इस रूप को मोहग्रस्त लोग नहीं देख पाते; केवल ज्ञानरूपी नेत्र वाले विवेकी ही उसे देखते हैं। → श्लोक 11 योगी आत्मा को अपने भीतर देखते हैं, अशुद्ध चित्त वाले नहीं यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् । यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः ॥ १५.११ ॥ प्रयत्नशील योगी इस आत्मा को अपने भीतर स्थित देखते हैं; किन्तु जिनका अन्तःकरण शुद्ध नहीं हुआ है, वे अविवेकी लोग प्रयत्न करते हुए भी इसे नहीं देख पाते। → श्लोक 12 सूर्य, चन्द्र और अग्नि का तेज परमात्मा का ही है यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् । यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥ १५.१२ ॥ सूर्य में स्थित जो तेज सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है तथा जो तेज चन्द्रमा और अग्नि में है, उस तेज को तुम मेरा ही जानो। → श्लोक 13 परमात्मा पृथ्वी को धारण करते और औषधियों का पोषण करते हैं गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा । पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥ १५.१३ ॥ मैं पृथ्वी में प्रवेश करके अपनी शक्ति से सब प्राणियों को धारण करता हूँ और रसमय चन्द्रमा बनकर सम्पूर्ण औषधियों तथा वनस्पतियों को पुष्ट करता हूँ। → श्लोक 14 जठराग्नि रूप में परमात्मा ही अन्न को पचाते हैं अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः । प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥ १५.१४ ॥ मैं ही प्राणियों के शरीर में स्थित वैश्वानर अर्थात् जठराग्नि होकर, प्राण और अपान वायु से युक्त होकर चार प्रकार के अन्न को पचाता हूँ। → श्लोक 15 हृदय में स्थित परमात्मा: स्मृति, ज्ञान और विस्मृति के दाता सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च । वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥ १५.१५ ॥ मैं सब प्राणियों के हृदय में अन्तर्यामी रूप से स्थित हूँ। मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और उनका अभाव (विस्मृति) होता है। सब वेदों से मैं ही जानने योग्य हूँ; वेदान्त का कर्ता और वेदों का जानने वाला भी मैं ही हूँ। → श्लोक 16 क्षर और अक्षर: लोक में दो पुरुष द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च । क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥ १५.१६ ॥ इस लोक में दो प्रकार के पुरुष हैं—क्षर और अक्षर। सम्पूर्ण प्राणी-शरीर क्षर अर्थात् नाशवान् हैं, और कूटस्थ अर्थात् सदा एकरस रहने वाला अक्षर कहा जाता है। → श्लोक 17 क्षर और अक्षर से परे उत्तम पुरुष: परमात्मा उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥ १५.१७ ॥ क्षर और अक्षर से भिन्न एक उत्तम पुरुष है, जिसे परमात्मा कहा गया है। वह अविनाशी ईश्वर तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका धारण और पोषण करता है। → श्लोक 18 पुरुषोत्तम: क्षर से अतीत और अक्षर से भी उत्तम यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः । अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥ १५.१८ ॥ क्योंकि मैं नाशवान् क्षर से सर्वथा परे हूँ और अविनाशी अक्षर से भी उत्तम हूँ, इसलिए लोक में और वेद में मैं पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हूँ। → श्लोक 19 पुरुषोत्तम को जानने वाला सर्वज्ञ सर्वभाव से भजन करता है यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् । स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥ १५.१९ ॥ हे भारत! जो मोह-रहित पुरुष मुझे इस प्रकार पुरुषोत्तम रूप में जान लेता है, वह सर्वज्ञ है और सब प्रकार से मेरा ही भजन करता है। → श्लोक 20 गुह्यतम शास्त्र: इसे जानकर मनुष्य कृतकृत्य होता है इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ । एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥ १५.२० ॥ हे निष्पाप अर्जुन! इस प्रकार यह अत्यन्त गोपनीय शास्त्र मैंने तुम्हें कहा। हे भारत! इसे जानकर मनुष्य ज्ञानवान् और कृतकृत्य हो जाता है, अर्थात् उसके लिए कुछ करना या पाना शेष नहीं रहता। →

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