भगवद्गीता 15.17 — क्षर और अक्षर से परे उत्तम पुरुष: परमात्मा

उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥ १५.१७ ॥

क्षर और अक्षर से भिन्न एक उत्तम पुरुष है, जिसे परमात्मा कहा गया है। वह अविनाशी ईश्वर तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका धारण और पोषण करता है।

पदच्छेद

संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।

उत्तमः पुरुषः तु अन्यः
परमात्मा इति उदाहृतः ।
यः लोकत्रयम् आविश्य
बिभर्ति अव्ययः ईश्वरः ॥

शब्दार्थ

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संस्कृत शब्द अर्थ
उत्तमः सर्वश्रेष्ठ
पुरुषः पुरुष
तु किन्तु
अन्यः अन्य (भिन्न)
परमात्मा परमात्मा
इति इस नाम से
उदाहृतः कहा गया है
पंक्ति 2
संस्कृत शब्द अर्थ
यः जो
लोकत्रयम् तीनों लोकों में
आविश्य प्रवेश करके
बिभर्ति धारण-पोषण करता है
अव्ययः अविनाशी
ईश्वरः सबका स्वामी
पंक्ति 1 पंक्ति 2
संस्कृत शब्द अर्थ संस्कृत शब्द अर्थ
उत्तमः सर्वश्रेष्ठ यः जो
पुरुषः पुरुष लोकत्रयम् तीनों लोकों में
तु किन्तु आविश्य प्रवेश करके
अन्यः अन्य (भिन्न) बिभर्ति धारण-पोषण करता है
परमात्मा परमात्मा अव्ययः अविनाशी
इति इस नाम से ईश्वरः सबका स्वामी
उदाहृतः कहा गया है

विस्तृत विवरण

परिचय

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण क्षर और अक्षर से भिन्न एक उत्तम पुरुष का परिचय देते हैं, जिसे परमात्मा कहा जाता है और जो तीनों लोकों में प्रविष्ट होकर सबका भरण-पोषण करता है।

भावार्थ

तीसरा और सर्वोच्च पुरुष

पिछले श्लोक के दो पुरुषों के बाद भगवान तीसरे का वर्णन करते हैं। यह वर्णन इस अध्याय के नाम, पुरुषोत्तमयोग, की ओर बढ़ने की सीढ़ी है।

उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः (उत्तम पुरुष तो अन्य है): 'अन्य' शब्द महत्त्वपूर्ण है। भगवान स्पष्ट कहते हैं कि यह तत्त्व क्षर और अक्षर, दोनों से अलग और श्रेष्ठ है। वह न नाशवान जगत है और न केवल अपरिवर्तनशील जीव-भाव, बल्कि इन दोनों का आधार और स्वामी है।

परमात्मेत्युदाहृतः (परमात्मा कहा गया है): शास्त्रों में इसे परमात्मा नाम दिया गया है। आत्मा हर जीव के भीतर है, पर परमात्मा सब आत्माओं का भी आधार है।

यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्ति (जो तीनों लोकों में प्रवेश कर पालन करता है): वह कहीं बाहर बैठा दर्शक नहीं है। भूलोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक, अर्थात संपूर्ण सृष्टि में वह व्याप्त है और उसे धारण करता है। अव्ययः ईश्वरः के रूप में वह कभी क्षीण नहीं होता और सबका नियंत्रक है।

यहाँ गहरी बात है कि वह एक साथ सर्वव्यापक भी है और सबसे ऊपर भी। जैसे सूर्य की रोशनी हर वस्तु पर पड़ती है, पर सूर्य किसी वस्तु में सीमित नहीं होता।

हमारे जीवन के लिए संदेश (संसार के पार भी, संसार के भीतर भी)

न केवल बदलाव, न केवल स्थिरता: जीवन को संभालने के लिए हमें दोनों की आवश्यकता है, यानी परिवर्तन को स्वीकार करने की लचीलापन और भीतर की अटल आस्था।

व्यावहारिक तरीका: संसार के कर्तव्य पूरी निष्ठा से निभाएँ, पर मन में यह भाव रखें कि इन सबका संचालक कोई बड़ी सत्ता है। इससे कर्म में उत्साह रहता है और परिणाम का बोझ नहीं रहता।

आगे का विषय

भगवान ने उत्तम पुरुष परमात्मा का परिचय दिया जो क्षर और अक्षर दोनों से भिन्न है। अब वे स्वयं स्पष्ट करते हैं कि वही परमात्मा वे स्वयं हैं और उन्हें पुरुषोत्तम क्यों कहा जाता है।

इस श्लोक में छिपे संदेश

इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।

आध्यात्मिक
परमात्मा उत्तम पुरुष
दार्शनिक
तीन तत्त्व-विभाग
भक्ति-दृष्टि
ईश्वर का पालन-पोषण
ज्ञानयोग
त्रिविध पुरुष-बोध
एकत्व-दृष्टि
सबमें एक परमात्मा
साधना-दृष्टि
परम तत्त्व का ध्यान
नैतिक
जिम्मेदारी और विनम्रता
मनोवैज्ञानिक
सुरक्षित आश्रय
शैक्षिक
परमात्मा की परिभाषा
प्रतीक-दृष्टि
तीन लोक
जिज्ञासा-दृष्टि
सबसे परे कौन?
आत्मशुद्धि
अहंकार का समर्पण
नेतृत्व
धारण और पोषण का आदर्श
समन्वय-दृष्टि
निराकार और साकार का मेल

सूत्र

जो नश्वर और अविनाशी दोनों से परे है, वही परम सत्ता है।

परमात्मा केवल ऊपर नहीं, तीनों लोकों में व्याप्त है।

जो सबका भार उठाता है, उसी पर भरोसा सबसे सुरक्षित है।

जो कभी क्षीण नहीं होता, वही सच्चा आश्रय है।

स्वामी वही है जो सेवा भाव से सबका पोषण करता है।

क्षर-अक्षर को जानकर उत्तम पुरुष की ओर बढ़ना ही साधना है।

जब परम आश्रय का बोध होता है, तब चिन्ता घटती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'उत्तम पुरुष' कौन हैं?
वे परमात्मा हैं, जो क्षर और अक्षर दोनों से परे और श्रेष्ठ हैं तथा सबके धारक और स्वामी हैं।
'लोकत्रयम्' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है भू, भुवः और स्वः—अर्थात् तीनों लोक या सम्पूर्ण जगत्।
'बिभर्ति' से क्या भाव है?
इसका भाव है धारण करना और पालन-पोषण करना; परमात्मा सब प्राणियों को सम्भालते हैं।
परमात्मा और जीवात्मा में क्या अन्तर है?
जीवात्मा परमात्मा का अंश है, जबकि परमात्मा सम्पूर्ण जगत् के स्वामी, व्यापक और सबके धारक हैं।
इस श्लोक का एक वाक्य में व्यावहारिक संदेश क्या है?
नश्वर और अपरिवर्तनशील से परे उस परमात्मा को पहचानो जो सबको धारण करता है।

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