विवेक एक ऐसा गुण है जिसे अभ्यास से विकसित किया जा सकता है: सही-गलत, स्थायी-क्षणिक और ज़रूरी-गैरज़रूरी के बीच ठहरकर भेद करने की क्षमता। जल्दबाज़ी, भय, लालच और दबाव के बीच विवेक सबसे पहले कमज़ोर पड़ता है, इसलिए इसे नियमित चिंतन, अच्छे मार्गदर्शन और संशय के समाधान से मज़बूत करना पड़ता है। गीता इस गुण को आत्मज्ञान और कर्म, दोनों से जोड़कर सिखाती है।
गीता 4.18 में सच्चा ज्ञानी बाहरी क्रियाओं से परे कर्म के वास्तविक तत्त्व को समझता है, इसलिए किसी बात या व्यक्ति को आँकते समय बाहरी गतिविधियों के बजाय उसकी चेतना, उद्देश्य और आंतरिक स्थिति को देखें। गीता 2.12 और 2.11 आत्मा के शाश्वत अस्तित्व और शोक की जड़ को आत्मज्ञान से काटने की बात करती हैं, जिससे हानि और परिवर्तन के समय भी दृष्टि स्पष्ट रहती है।
गीता 4.40 के अनुसार अज्ञान, श्रद्धा का अभाव और निरंतर संशय प्रगति और शांति के सबसे बड़े अवरोध हैं, इसलिए अत्यधिक संदेह और नकारात्मक सोच में फँसने के बजाय सत्य की खोज, अध्ययन और अनुभव से स्पष्टता विकसित करें। गीता 4.33 और 4.37 कहती हैं कि ज्ञान कर्मों को उनके परम उद्देश्य तक पहुँचाता है और संचित बंधनों को जला देता है, और गीता 4.35 के अनुसार ज्ञान से मोह मिटकर एकत्व का दर्शन होता है। गीता 4.24 में ज्ञान की पराकाष्ठा सबमें एक ही परम सत्य का दर्शन है।