भगवद्गीता 17.6 — शरीर और अन्तर्यामी परमात्मा को कष्ट देने वाले आसुरी निश्चय वाले
कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः ।
मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान् ॥ १७.६ ॥
🔊 इस श्लोक का अर्थ सुनें
Current voice: —
Ready
Text-to-speech is not supported by this browser.
जो अविवेकी लोग शरीर में स्थित भूत-समुदाय को और शरीर के भीतर स्थित अन्तर्यामी मुझ परमात्मा को भी कष्ट देते हैं, उन्हें तुम आसुरी निश्चय वाला जानो।
पदच्छेद
संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।
शब्दार्थ
| पंक्ति 1 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| अचेतसः | अविवेकी, अज्ञानी लोग |
| शरीरस्थम् | शरीर में स्थित |
| भूतग्रामम् | भूतसमुदाय को, इन्द्रिय-मन आदि तत्त्वों को |
| कर्शयन्तः | कृश करते हुए, कष्ट देते हुए |
| पंक्ति 2 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| च | और |
| अन्तःशरीरस्थम् | शरीर के भीतर स्थित |
| माम् एव | मुझे ही |
| तान् | उन्हें |
| आसुरनिश्चयान् | आसुरी निश्चय वाले |
| विद्धि | जानो |
| पंक्ति 1 | पंक्ति 2 | ||
|---|---|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ | संस्कृत शब्द | अर्थ |
| अचेतसः | अविवेकी, अज्ञानी लोग | च | और |
| शरीरस्थम् | शरीर में स्थित | अन्तःशरीरस्थम् | शरीर के भीतर स्थित |
| भूतग्रामम् | भूतसमुदाय को, इन्द्रिय-मन आदि तत्त्वों को | माम् एव | मुझे ही |
| कर्शयन्तः | कृश करते हुए, कष्ट देते हुए | तान् | उन्हें |
| आसुरनिश्चयान् | आसुरी निश्चय वाले | ||
| विद्धि | जानो | ||
विस्तृत विवरण
परिचय
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण पिछले श्लोक की बात को पूर्ण करते हैं। वे कहते हैं कि जो लोग अविवेक से देह को कष्ट देते हैं, वे भीतर स्थित परमात्मा को भी पीड़ित करते हैं, और उनकी निष्ठा आसुरी है।
भावार्थ
देह को पीड़ा देने का वास्तविक अर्थ
भगवान यहाँ अत्यंत गंभीर बात कहते हैं। जो अज्ञानी लोग शरीर में स्थित भूतसमुदाय को कृश करते हैं, वे वास्तव में केवल शरीर को नहीं, बल्कि उसके भीतर बैठे परमात्मा का भी अनादर करते हैं।
शरीरस्थं भूतग्रामम् — शरीर में स्थित तत्त्वों का समूह: हमारा शरीर पंचमहाभूतों से बना है और अनेक इंद्रियों, अंगों और शक्तियों का समुच्चय है। इसे जानबूझकर अनावश्यक कष्ट देना प्रकृति के प्रति भी अन्याय है।
मां चैवान्तःशरीरस्थम् — मुझे भी, जो भीतर स्थित हूँ: इस वाक्य में एक सुंदर दृष्टि छिपी है कि भगवान प्रत्येक देह के भीतर साक्षी रूप में विद्यमान हैं। इसलिए शरीर एक मंदिर के समान है, जिसकी उपेक्षा या प्रताड़ना भीतर के देवता का अपमान है।
असुरनिश्चयान् — आसुरी निश्चय वाले: यहाँ भगवान स्पष्ट निर्णय देते हैं कि ऐसे लोगों का संकल्प आसुरी प्रवृत्ति का है। कारण यह है कि उनका तप विवेकहीन है और उसके पीछे अहंकार तथा कामना काम कर रही है।
हमारे जीवन के लिए संदेश
गीता का मार्ग शरीर के दमन का नहीं, शरीर के सम्यक उपयोग का मार्ग है। स्वस्थ आहार, पर्याप्त विश्राम और संतुलित दिनचर्या साधना के विरोधी नहीं, बल्कि उसके सहायक हैं। जो अपने शरीर और मन के साथ करुणा से पेश आता है, वही दूसरों के साथ भी सही व्यवहार कर पाता है।
देह को पीड़ा देने का वास्तविक अर्थ
भगवान यहाँ अत्यंत गंभीर बात कहते हैं। जो अज्ञानी लोग शरीर में स्थित भूतसमुदाय को कृश करते हैं, वे वास्तव में केवल शरीर को नहीं, बल्कि उसके भीतर बैठे परमात्मा का भी अनादर करते हैं।
शरीरस्थं भूतग्रामम् — शरीर में स्थित तत्त्वों का समूह: हमारा शरीर पंचमहाभूतों से बना है और अनेक इंद्रियों, अंगों और शक्तियों का समुच्चय है। इसे जानबूझकर अनावश्यक कष्ट देना प्रकृति के प्रति भी अन्याय है।
मां चैवान्तःशरीरस्थम् — मुझे भी, जो भीतर स्थित हूँ: इस वाक्य में एक सुंदर दृष्टि छिपी है कि भगवान प्रत्येक देह के भीतर साक्षी रूप में विद्यमान हैं। इसलिए शरीर एक मंदिर के समान है, जिसकी उपेक्षा या प्रताड़ना भीतर के देवता का अपमान है।
असुरनिश्चयान् — आसुरी निश्चय वाले: यहाँ भगवान स्पष्ट निर्णय देते हैं कि ऐसे लोगों का संकल्प आसुरी प्रवृत्ति का है। कारण यह है कि उनका तप विवेकहीन है और उसके पीछे अहंकार तथा कामना काम कर रही है।
हमारे जीवन के लिए संदेश
गीता का मार्ग शरीर के दमन का नहीं, शरीर के सम्यक उपयोग का मार्ग है। स्वस्थ आहार, पर्याप्त विश्राम और संतुलित दिनचर्या साधना के विरोधी नहीं, बल्कि उसके सहायक हैं। जो अपने शरीर और मन के साथ करुणा से पेश आता है, वही दूसरों के साथ भी सही व्यवहार कर पाता है।
आगे का विषय
तप के विषय में यह स्पष्टता हो गई। अब भगवान तीन गुणों के भेद को जीवन की एक अत्यंत दैनिक वस्तु, आहार, के माध्यम से समझाना आरंभ करते हैं।
इस श्लोक में छिपे संदेश
इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।
सूत्र
शरीर साधना का साधन है, उसे अनावश्यक कष्ट देना अज्ञान है।
परमात्मा भीतर भी विराजमान हैं, इसलिए देह के प्रति आदर आवश्यक है।
बिना समझ का कठोर तप आत्मघात की ओर ले जा सकता है।
जहाँ अहंकार और हठ हो, वहाँ साधना भी आसुरी बन जाती है।
युक्त आहार-विहार ही योग और तप को सुफल बनाता है।
दूसरों के साथ-साथ स्वयं के प्रति भी करुणा आवश्यक है।
सच्चा साधक शरीर को परमात्मा का निवास मानकर संभालता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
'भूतग्राम' से क्या अभिप्राय है?
भगवान् ने 'माम्' क्यों कहा?
'आसुरनिश्चय' का क्या अर्थ है?
क्या संयम और कठोरता में भेद है?
इस श्लोक का एक वाक्य में व्यावहारिक संदेश क्या है?
संबंधित विषय खोजें
इस श्लोक से जुड़े विषयों पर और श्लोक: