अहंकार पर भगवद्गीता

159 श्लोक, अर्थ और जीवन में उपयोग सहित

"अहंकार" में सहायक भगवद्गीता के श्लोक 159 श्लोक, अर्थ, मूल शिक्षा और व्यावहारिक उपयोग सहित।

अहंकार वह भाव है जिसमें व्यक्ति स्वयं को सबसे अलग, सबसे ऊपर और हर काम का एकमात्र कर्ता मान लेता है। सफलता मिले तो घमंड और असफलता मिले तो अपराधबोध, दोनों का स्रोत यही 'मैं' होता है। इससे रिश्ते बिगड़ते हैं, आलोचना सुनना कठिन हो जाता है और सीखने का रास्ता धीरे-धीरे बंद होने लगता है।

गीता 3.27 बताती है कि कर्म प्रकृति के गुणों से होते हैं, पर अहंकार के कारण मनुष्य स्वयं को कर्ता मान बैठता है। गीता 5.8 में तत्त्वज्ञानी यह समझता है कि शरीर और इन्द्रियाँ अपनी-अपनी क्रियाएँ करती हैं। गीता 11.32 में भगवान स्वयं को लोकों का क्षय करने वाला काल कहते हैं, जो दिखाता है कि परिणाम मनुष्य के कर्तापन के अभिमान पर निर्भर नहीं हैं।

समाधान गीता 11.33 के निमित्त भाव में मिलता है: कर्तव्य पूरी निष्ठा से करें, पर स्वयं को केवल माध्यम समझें। गीता 5.18 के अनुसार ज्ञानी सबमें एक ही आत्मा देखता है, इसलिए पद, धन या पहचान के आधार पर किसी को छोटा-बड़ा नहीं मानता। सफलता का श्रेय अकेले न लें और असफलता का पूरा बोझ भी अपने ऊपर न रखें।

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13.30

कर्म और अकर्म

सब कर्म प्रकृति द्वारा हो रहे हैं और आत्मा अकर्ता है, यह देखने वाला ही यथार्थ देखता है

कर्म प्रकृति करती है, आत्मा साक्षी है; यह दृष्टि कर्तापन के बोझ से मुक्त करती है।

गीता में कहाँ

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आधुनिक संदर्भ

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गीता के अनुसार अहंकार को कैसे कम करें?
कर्तापन का अभिमान छोड़कर। गीता 11.33 में निमित्त मात्र बनने की सीख है, यानी कर्तव्य पूरी निष्ठा से निभाएँ पर स्वयं को ही सब कुछ करने वाला न मानें। साथ ही साक्षीभाव का अभ्यास और सबमें समान मानवता को देखना अहंकार को धीरे-धीरे ढीला करता है।
गीता 3.27 में कर्ता होने के अभिमान के बारे में क्या कहा गया है?
गीता 3.27 के अनुसार कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा होते हैं, परंतु अहंकार से मोहित मनुष्य सोचता है कि मैं कर्ता हूँ। इस भाव को छोड़ने से कर्म का बंधन ढीला होता है और सफलता-असफलता का बोझ भी हल्का लगने लगता है।
निमित्त मात्र बनने का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ कर्म छोड़ना नहीं, बल्कि कर्तापन का अभिमान छोड़ना है। गीता 11.33 में अर्जुन को उठकर कर्तव्य निभाने और स्वयं को निमित्त मात्र मानने को कहा गया है। इस दृष्टि से व्यक्ति पूरा प्रयास करता है, पर परिणाम का श्रेय या दोष अकेले अपने ऊपर नहीं लेता।
क्या अहंकार और आत्मविश्वास एक ही चीज़ हैं?
नहीं। आत्मविश्वास अपने कर्तव्य और क्षमता पर भरोसा है, जबकि अहंकार स्वयं को ही एकमात्र कर्ता मान लेना है। गीता 3.27 और 5.8 की दृष्टि में प्रयास में कमी नहीं आती, केवल यह बोध जुड़ता है कि कर्म के पीछे शरीर, इन्द्रियाँ और बड़ी व्यवस्था भी काम करती हैं।
गीता 5.18 की समदृष्टि का अहंकार से क्या संबंध है?
गीता 5.18 बताती है कि ज्ञानी बाहरी भेदों से परे सभी प्राणियों में एक ही परम सत्य को देखता है। अहंकार 'मैं ऊँचा, तुम नीचे' का भेद बनाता है, जबकि समदृष्टि उस भेद को मिटाती है। इसलिए जाति, पद या धन के आधार पर किसी को आँकना कम करना इस दिशा में उपयोगी अभ्यास है।

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