भगवद्गीता 9.4 — अव्यक्त स्वरूप से व्याप्त जगत्: सब प्राणी मुझमें, पर मैं उनमें बँधा नहीं

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥ ९.४ ॥

मुझ अव्यक्त स्वरूप वाले से यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है। सब प्राणी मुझमें स्थित हैं, परन्तु मैं उनमें स्थित (उनकी सीमाओं में बँधा) नहीं हूँ।

पदच्छेद

संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।

मया ततम् इदम् सर्वम्
जगत् अव्यक्तमूर्तिना ।
मत्स्थानि सर्वभूतानि
न च अहम् तेषु अवस्थितः ॥

शब्दार्थ

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संस्कृत शब्द अर्थ
मया मुझसे
ततम् व्याप्त
इदम् सर्वम् यह सब
जगत् जगत्
अव्यक्तमूर्तिना अप्रकट स्वरूप वाले
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संस्कृत शब्द अर्थ
मत्स्थानि मुझमें स्थित
सर्वभूतानि सब प्राणी
न नहीं
च और
अहम् मैं
तेषु उनमें
अवस्थितः स्थित
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संस्कृत शब्द अर्थ संस्कृत शब्द अर्थ
मया मुझसे मत्स्थानि मुझमें स्थित
ततम् व्याप्त सर्वभूतानि सब प्राणी
इदम् सर्वम् यह सब न नहीं
जगत् जगत् च और
अव्यक्तमूर्तिना अप्रकट स्वरूप वाले अहम् मैं
तेषु उनमें
अवस्थितः स्थित

विस्तृत विवरण

परिचय

यहाँ से भगवान श्रीकृष्ण अपने स्वरूप का गूढ़ रहस्य बताते हैं। यह श्लोक पहली बार सुनने पर विरोधाभासी लगता है, पर इसमें परमात्मा की सर्वव्यापकता और निर्लिप्तता का सुंदर संतुलन छिपा है।

भावार्थ

श्लोक का भाव: सबमें व्याप्त, फिर भी सबसे परे

भगवान कहते हैं कि यह संपूर्ण जगत मेरे अव्यक्त स्वरूप से व्याप्त है। सब प्राणी मुझमें स्थित हैं, परंतु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ। यह कथन गीता के सबसे गहरे सूत्रों में से एक है और इसे समझने के लिए शब्दों के पीछे का भाव देखना आवश्यक है।

मुख्य शब्दों का मर्म

मया ततमिदं सर्वं जगत् — मुझसे यह सारा जगत व्याप्त है: परमात्मा सृष्टि के हर कण में फैले हुए हैं, जैसे घड़े के भीतर और बाहर आकाश फैला रहता है। संसार का कोई भी भाग उनकी सत्ता से खाली नहीं। यह वही भाव है जो सातवें अध्याय में धागे और मणियों की उपमा से कहा गया था।

अव्यक्तमूर्तिना — अव्यक्त स्वरूप से: यह व्याप्ति उनके उस रूप से है जो इंद्रियों से दिखाई नहीं देता। हम संसार की वस्तुओं को देखते हैं, पर उनमें व्याप्त उस चेतन सत्ता को नहीं देख पाते। जैसे बिजली तारों में बहती है पर आँखों से दिखती नहीं, फिर भी उसका प्रभाव हर जगह दिखता है।

मत्स्थानि सर्वभूतानि — सब प्राणी मुझमें स्थित हैं: सारी सृष्टि परमात्मा के आधार पर टिकी है। जैसे समुद्र की लहरें समुद्र के बिना नहीं हो सकतीं, वैसे ही कोई प्राणी परमात्मा के आधार के बिना नहीं रह सकता।

न चाहं तेष्ववस्थितः — पर मैं उनमें स्थित नहीं हूँ: यह वाक्य विरोधाभास जैसा लगता है, पर इसका भाव यह है कि परमात्मा किसी प्राणी की सीमाओं में बँधे नहीं हैं। प्राणी का जन्म, मृत्यु, सुख, दुःख, रोग और विकार उन्हें स्पर्श नहीं करते। लहर का उठना-गिरना समुद्र को घटाता-बढ़ाता नहीं। इसलिए वे सबमें व्याप्त होकर भी किसी में सीमित या उसके दोषों से प्रभावित नहीं होते।

गहरे भाव और आंतरिक संदेश

सर्वव्यापकता और निर्लिप्तता का मेल: हम प्रायः समझते हैं कि जो सबमें है वह सबके दोषों से भी प्रभावित होगा। गीता बताती है कि परमात्मा इसका अपवाद हैं। वे सबमें हैं पर अलिप्त हैं। यह दृष्टि हमें भी सिखाती है कि संसार में रहते हुए भीतर से अप्रभावित रहना संभव है।

आधार और आधेय का संबंध: परमात्मा आधार हैं और सृष्टि आधेय। आधार आधेय के बिना भी रह सकता है, पर आधेय आधार के बिना नहीं। इसलिए सृष्टि परमात्मा पर निर्भर है, परमात्मा सृष्टि पर नहीं।

व्यापकता का दैनिक अनुभव

परमात्मा की इस व्यापकता को समझने के लिए एक सरल उदाहरण लिया जा सकता है। हम जिस कमरे में बैठे हैं, उसमें हवा हर जगह है, पर वह किसी वस्तु के रंग, आकार या कमी से प्रभावित नहीं होती। कमरे की सजावट बदल जाए, फिर भी हवा वही रहती है। इसी प्रकार सृष्टि के असंख्य परिवर्तनों के बीच परमात्मा की सत्ता अपरिवर्तित बनी रहती है।

श्लोक को पढ़ने का संतुलित तरीका: इस श्लोक में दो परस्पर विरोधी दिखने वाले कथन साथ आए हैं, इसलिए उसे तुरंत समझ लेने की जल्दबाज़ी न करें। बार-बार मनन करने, अगले श्लोकों की उपमा से जोड़ने और सत्संग में चर्चा करने से इसके अर्थ धीरे-धीरे स्पष्ट होते हैं।

हमारे दैनिक जीवन के लिए संदेश

संसार में रहकर निर्लिप्त रहना: जीवन में अनेक संबंध, जिम्मेदारियाँ और परिस्थितियाँ होती हैं। हम उन सबमें पूरी निष्ठा से भाग लें, पर भीतर यह स्मरण रखें कि हमारा मूल स्वरूप उनसे परे है। इससे हर उतार-चढ़ाव में स्थिरता बनी रहती है।

अदृश्य आधार पर भरोसा: जैसे हम बिजली को देखे बिना भी उस पर भरोसा करते हैं, वैसे ही जीवन के अदृश्य आधार पर श्रद्धा रखना हमें स्थिरता देता है।

आगे का विषय

भगवान ने यह रहस्य रखा कि सब उनमें हैं पर वे सबमें लिप्त नहीं। अब वे इसी बात को और स्पष्ट करते हुए अपने ऐश्वर्यमय योग की ओर अर्जुन का ध्यान खींचते हैं।

इस श्लोक में छिपे संदेश

इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।

दार्शनिक
अव्यक्तमूर्ति सर्वव्यापकता
आध्यात्मिक
मत्स्थानि भूतानि
ज्ञानयोग
अलिप्तता
भक्ति-दृष्टि
भगवान् का आधारत्व
मनोवैज्ञानिक
सबमें होकर भी अलग
शैक्षिक
विरोधाभासी कथन
साधना-दृष्टि
साक्षी-भाव
नैतिक
अहंकार का त्याग
व्यावहारिक
जिम्मेदारी में अनासक्ति
आत्मशुद्धि
मोह से ऊपर
समन्वय-दृष्टि
व्याप्ति और अलिप्तता
प्रतीक-दृष्टि
अव्यक्तमूर्ति
पर्यावरणीय
जगत् का आधार
एकत्व-दृष्टि
सब कुछ उसी में

सूत्र

परमात्मा का रूप इन्द्रियों से नहीं दिखता, पर उसी से सब कुछ व्याप्त है।

सब प्राणी उसी परम सत्ता पर टिके हैं, जैसे सभी लहरें समुद्र पर।

आधार होकर भी वह प्राणियों की सीमाओं में बँधा नहीं।

'मुझमें स्थित और फिर भी मैं उनमें स्थित नहीं'—ये दो दृष्टियाँ आधार और असंग-भाव का संकेत देती हैं।

जो सबका आधार होकर भी सुख-दुःख से अछूता है, वही साक्षी-भाव का आदर्श है।

जिम्मेदारी निभाते हुए भी भीतर से मुक्त रहना सम्भव है।

सब कुछ उसी में है, इसलिए कोई भी उससे बाहर नहीं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'अव्यक्तमूर्तिना' का क्या अर्थ है?
जिसका स्वरूप इन्द्रियों से अप्रकट है, अर्थात् निराकार या अदृश्य परम सत्ता।
'मत्स्थानि सर्वभूतानि' का क्या भाव है?
सब प्राणी उसी परमात्मा में आश्रित हैं।
'न चाहं तेष्ववस्थितः' का क्या अर्थ है?
परमात्मा उनमें बँधे या सीमित नहीं हैं।
यह कथन विरोधी क्यों लगता है?
क्योंकि एक ही बात दो दृष्टियों से कही गई है—आधार-रूप में सब उसमें हैं, पर वह उनकी सीमाओं से अलिप्त है। अगला श्लोक इसी को और स्पष्ट करता है।
इस श्लोक का व्यावहारिक सन्देश एक वाक्य में क्या है?
अपनी भूमिकाओं और जिम्मेदारियों को निभाते हुए भीतर से अनासक्त और साक्षी बने रहने का अभ्यास करो।

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