बुद्धिग्राह्य और इन्द्रियातीत परम सुख की अनुभूति
योग की परिपक्व अवस्था में साधक इन्द्रियों से परे, केवल शुद्ध बुद्धि द्वारा अनुभव होने वाले परम आनन्द को प्राप्त करता है और सत्य में दृढ़तापूर्वक स्थित रहता है।
जीवन में उपयोग: क्षणिक इन्द्रिय-सुखों के पीछे भागने के बजाय ऐसा जीवन अपनाएँ जो आंतरिक शांति, आत्मबोध और स्थायी संतोष प्रदान करे।