भगवद्गीता 7.8 — जल के रस से ओंकार तक: प्रत्येक सार में परमात्मा
रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः ।
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥ ७.८ ॥
🔊 इस श्लोक का अर्थ सुनें
Current voice: —
Ready
Text-to-speech is not supported by this browser.
हे कुन्तीपुत्र! मैं जल में रस हूँ, चन्द्रमा और सूर्य में प्रकाश हूँ, सब वेदों में प्रणव (ओंकार) हूँ, आकाश में शब्द हूँ और मनुष्यों में पुरुषार्थ हूँ।
पदच्छेद
संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।
शब्दार्थ
| पंक्ति 1 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| रसः | रस (स्वाद-तत्त्व) |
| अहम् | मैं |
| अप्सु | जल में |
| कौन्तेय | हे कुन्तीपुत्र |
| प्रभा | प्रकाश |
| अस्मि | हूँ |
| शशिसूर्ययोः | चन्द्रमा और सूर्य में |
| पंक्ति 2 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| प्रणवः | ओंकार |
| सर्ववेदेषु | सब वेदों में |
| शब्दः | शब्द (ध्वनि) |
| खे | आकाश में |
| पौरुषम् | पुरुषार्थ |
| नृषु | मनुष्यों में |
| पंक्ति 1 | पंक्ति 2 | ||
|---|---|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ | संस्कृत शब्द | अर्थ |
| रसः | रस (स्वाद-तत्त्व) | प्रणवः | ओंकार |
| अहम् | मैं | सर्ववेदेषु | सब वेदों में |
| अप्सु | जल में | शब्दः | शब्द (ध्वनि) |
| कौन्तेय | हे कुन्तीपुत्र | खे | आकाश में |
| प्रभा | प्रकाश | पौरुषम् | पुरुषार्थ |
| अस्मि | हूँ | नृषु | मनुष्यों में |
| शशिसूर्ययोः | चन्द्रमा और सूर्य में | ||
विस्तृत विवरण
परिचय
सूत्र और मणियों की उपमा के बाद भगवान अब ठोस उदाहरणों से अपनी उपस्थिति दिखाते हैं। इस श्लोक में वे जल, चंद्रमा-सूर्य, वेदों और मनुष्य के पौरुष में अपनी विभूति का वर्णन करते हैं।
भावार्थ
श्लोक का भाव: हर सार में परमात्मा
भगवान कहते हैं कि हे कौन्तेय! मैं जल में रस हूँ, चंद्रमा और सूर्य में प्रकाश हूँ, संपूर्ण वेदों में प्रणव (ओंकार) हूँ, आकाश में शब्द हूँ और पुरुषों में पौरुष हूँ। यहाँ भगवान यह नहीं कहते कि वे जल, सूर्य या वेद 'बन गए' हैं, बल्कि कहते हैं कि इनके भीतर जो सार तत्त्व है, वही वे हैं।
चार उदाहरणों का भाव
रसोऽहमप्सु — जल में रस: जल को जल बनाने वाला तत्त्व उसका रस, अर्थात तरलता और तृप्ति देने की क्षमता है। प्यासे के लिए जल की मिठास और जीवनदायिनी शक्ति ही उसका सार है। भगवान कहते हैं कि वह सार वही हैं।
प्रभास्मि शशिसूर्ययोः — चंद्र-सूर्य में प्रभा: चंद्रमा की शीतलता और सूर्य की ऊर्जा, दोनों प्रकार के प्रकाश के पीछे जो दीप्ति है, वही परमात्मा की शक्ति है। हम प्रकाश का उपयोग करते हैं, पर उसके स्रोत को प्रायः भूल जाते हैं।
प्रणवः सर्ववेदेषु — वेदों में ओंकार: ओंकार वह मूल ध्वनि है जिसमें सभी मंत्रों और शास्त्रों का सार समाया है। जैसे सब नदियाँ सागर में मिलती हैं, वैसे सब वैदिक ज्ञान प्रणव में विश्राम पाता है। इसीलिए ध्यान और जप में ओंकार का विशेष स्थान है।
शब्दः खे और पौरुषं नृषु: आकाश का गुण शब्द है, इसलिए आकाश की पहचान ध्वनि से होती है। और मनुष्य में पौरुष, अर्थात उद्यम, साहस और पुरुषार्थ की शक्ति वही परमात्मा है, जो उसे कर्म करने का सामर्थ्य देता है।
सार तत्त्व की दृष्टि: विभूति का अर्थ
इन उदाहरणों में एक पैटर्न है। भगवान हर वस्तु के उस गुण को अपना स्वरूप कहते हैं जो उसे उसकी पहचान देता है। बिना रस के जल जल नहीं रहता, बिना प्रभा के सूर्य-चंद्र का कोई अर्थ नहीं, बिना ध्वनि के आकाश अपना परिचय नहीं दे सकता। इसलिए वस्तु का मूल सार ही उसका ईश्वरीय पक्ष है। यही दृष्टि आगे दसवें अध्याय की 'विभूतियोग' में विस्तार पाती है।
प्रणव की महिमा: ओंकार तीन अक्षरों, अ, उ और म से बना है, जो जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति, इन तीनों अवस्थाओं तथा उनके पार स्थित चेतना का संकेत देते हैं। इसलिए साधक के लिए ओंकार केवल ध्वनि नहीं, परमात्मा तक पहुँचने का सेतु है। इसका नियमित जप मन को एकाग्र और शांत करता है।
पौरुष का सही अर्थ: पौरुष का अर्थ केवल शारीरिक बल या पुरुष होने का गर्व नहीं है। यह वह अंतःप्रेरणा है जो मनुष्य को असंभव लगने वाले कार्य में भी आगे बढ़ने का साहस देती है। यह प्रत्येक स्त्री-पुरुष में विद्यमान उद्यम की शक्ति है, जिसे भगवान अपना रूप बताते हैं।
हमारे जीवन के लिए संदेश (सार को पहचानना)
हर अनुभव में दिव्यता देखना: एक गिलास पानी का स्वाद, सुबह की धूप, किसी मंत्र की गूँज या अपने भीतर की हिम्मत, इन सबमें यदि हम परमात्मा की झलक देखना सीख जाएँ, तो साधारण जीवन भी पूजा जैसा हो जाता है।
पौरुष का सदुपयोग: जो साहस और सामर्थ्य हमें मिला है, वह ईश्वर की देन है। इसे अहंकार बढ़ाने में नहीं, बल्कि सेवा और कर्तव्य निभाने में लगाना चाहिए।
श्लोक का भाव: हर सार में परमात्मा
भगवान कहते हैं कि हे कौन्तेय! मैं जल में रस हूँ, चंद्रमा और सूर्य में प्रकाश हूँ, संपूर्ण वेदों में प्रणव (ओंकार) हूँ, आकाश में शब्द हूँ और पुरुषों में पौरुष हूँ। यहाँ भगवान यह नहीं कहते कि वे जल, सूर्य या वेद 'बन गए' हैं, बल्कि कहते हैं कि इनके भीतर जो सार तत्त्व है, वही वे हैं।
चार उदाहरणों का भाव
रसोऽहमप्सु — जल में रस: जल को जल बनाने वाला तत्त्व उसका रस, अर्थात तरलता और तृप्ति देने की क्षमता है। प्यासे के लिए जल की मिठास और जीवनदायिनी शक्ति ही उसका सार है। भगवान कहते हैं कि वह सार वही हैं।
प्रभास्मि शशिसूर्ययोः — चंद्र-सूर्य में प्रभा: चंद्रमा की शीतलता और सूर्य की ऊर्जा, दोनों प्रकार के प्रकाश के पीछे जो दीप्ति है, वही परमात्मा की शक्ति है। हम प्रकाश का उपयोग करते हैं, पर उसके स्रोत को प्रायः भूल जाते हैं।
प्रणवः सर्ववेदेषु — वेदों में ओंकार: ओंकार वह मूल ध्वनि है जिसमें सभी मंत्रों और शास्त्रों का सार समाया है। जैसे सब नदियाँ सागर में मिलती हैं, वैसे सब वैदिक ज्ञान प्रणव में विश्राम पाता है। इसीलिए ध्यान और जप में ओंकार का विशेष स्थान है।
शब्दः खे और पौरुषं नृषु: आकाश का गुण शब्द है, इसलिए आकाश की पहचान ध्वनि से होती है। और मनुष्य में पौरुष, अर्थात उद्यम, साहस और पुरुषार्थ की शक्ति वही परमात्मा है, जो उसे कर्म करने का सामर्थ्य देता है।
सार तत्त्व की दृष्टि: विभूति का अर्थ
इन उदाहरणों में एक पैटर्न है। भगवान हर वस्तु के उस गुण को अपना स्वरूप कहते हैं जो उसे उसकी पहचान देता है। बिना रस के जल जल नहीं रहता, बिना प्रभा के सूर्य-चंद्र का कोई अर्थ नहीं, बिना ध्वनि के आकाश अपना परिचय नहीं दे सकता। इसलिए वस्तु का मूल सार ही उसका ईश्वरीय पक्ष है। यही दृष्टि आगे दसवें अध्याय की 'विभूतियोग' में विस्तार पाती है।
प्रणव की महिमा: ओंकार तीन अक्षरों, अ, उ और म से बना है, जो जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति, इन तीनों अवस्थाओं तथा उनके पार स्थित चेतना का संकेत देते हैं। इसलिए साधक के लिए ओंकार केवल ध्वनि नहीं, परमात्मा तक पहुँचने का सेतु है। इसका नियमित जप मन को एकाग्र और शांत करता है।
पौरुष का सही अर्थ: पौरुष का अर्थ केवल शारीरिक बल या पुरुष होने का गर्व नहीं है। यह वह अंतःप्रेरणा है जो मनुष्य को असंभव लगने वाले कार्य में भी आगे बढ़ने का साहस देती है। यह प्रत्येक स्त्री-पुरुष में विद्यमान उद्यम की शक्ति है, जिसे भगवान अपना रूप बताते हैं।
हमारे जीवन के लिए संदेश (सार को पहचानना)
हर अनुभव में दिव्यता देखना: एक गिलास पानी का स्वाद, सुबह की धूप, किसी मंत्र की गूँज या अपने भीतर की हिम्मत, इन सबमें यदि हम परमात्मा की झलक देखना सीख जाएँ, तो साधारण जीवन भी पूजा जैसा हो जाता है।
पौरुष का सदुपयोग: जो साहस और सामर्थ्य हमें मिला है, वह ईश्वर की देन है। इसे अहंकार बढ़ाने में नहीं, बल्कि सेवा और कर्तव्य निभाने में लगाना चाहिए।
आगे का विषय
भगवान ने जल, प्रकाश, ध्वनि और पौरुष में अपना सार प्रकट किया। अब वे इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए पृथ्वी की सुगंध, अग्नि के तेज, जीवन-शक्ति और तपस्वियों के तप में अपनी उपस्थिति बताते हैं।
इस श्लोक में छिपे संदेश
इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।
सूत्र
जल की जो मिठास और जीवनदायिनी शक्ति है, वही परमात्मा की अभिव्यक्ति है।
चन्द्र-सूर्य का प्रकाश हमें याद दिलाता है कि प्रकाश का स्रोत एक है।
ओंकार वेदों का सार और परमात्मा का नादरूप प्रतीक है।
आकाश में गूँजने वाला शब्द उसी सत्ता का सूक्ष्म स्वरूप है।
मनुष्य का सच्चा पुरुषार्थ, उत्साह और साहस भी ईश्वरीय शक्ति से प्रेरित है।
जो हर वस्तु का सार देखे, वह वस्तु में ईश्वर को भी देख लेता है।
प्रतिदिन के अनुभवों को ईश्वर-स्मरण का अवसर बनाना ही सहज साधना है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
'रसोऽहमप्सु' का क्या अर्थ है?
'प्रणव' से क्या तात्पर्य है?
'पौरुषं नृषु' का क्या अर्थ है?
भगवान् ने इतने भिन्न उदाहरण क्यों दिए?
इस श्लोक का व्यावहारिक सन्देश एक वाक्य में क्या है?
संबंधित विषय खोजें
इस श्लोक से जुड़े विषयों पर और श्लोक: