सजगता पर भगवद्गीता

167 श्लोक, अर्थ और जीवन में उपयोग सहित

भगवद्गीता और सजगता 167 श्लोक, अर्थ और व्यावहारिक शिक्षाओं सहित।

सजगता का अर्थ है जो हो रहा है, उसमें पूरी तरह उपस्थित रहना: अपने विचार, भावनाएँ, शब्द और कर्म, सब पर बिना बहे नज़र रखना। हम अक्सर खाते समय फ़ोन में, बात करते समय भविष्य की योजना में और काम करते समय पुरानी बातों में होते हैं। इससे गलतियाँ, तनाव और खोखलापन बढ़ते हैं, जबकि सजग व्यक्ति छोटे पलों में भी स्थिर रहता है।

गीता 4.18 में सच्चा ज्ञानी कर्म के पीछे की चेतना और उद्देश्य को समझता है, यानी बाहरी क्रिया के साथ भीतर की स्थिति पर भी उसकी दृष्टि रहती है। गीता 2.62 बताती है कि विषय-चिंतन से आसक्ति, कामना और क्रोध बनते हैं, इसलिए प्रारंभिक चिंतन पर ही सजग रहना सरल है। गीता 4.24 सब कर्मों में एक ही परम सत्य का अनुभव करने की दृष्टि देती है।

गीता 6.18 में योग तब सिद्ध माना जाता है जब संयमित मन आत्मा में स्थिर हो जाता है और कामनाओं की दासता से मुक्त होता है, यानी ध्यान का उद्देश्य केवल तनाव कम करना नहीं है। गीता 6.19 में स्थिर चित्त की उपमा हवा-रहित स्थान के दीपक से दी गई है, और गीता 6.25 तथा 6.26 में मन को धैर्य से बार-बार लौटाने का अभ्यास है। गीता 9.34 दिन की शुरुआत और अंत स्मरण से करने और काम के बीच भी मन को लौटाने की सलाह देती है।

इन श्लोकों से शुरू करें

सभी 167 श्लोक

4.29

ध्यान साधना

प्राणायाम रूप यज्ञ

नियंत्रित श्वास आंतरिक संतुलन और एकाग्रता का द्वार है।

8.10

मृत्यु और पुनर्जन्म

अंत समय में भक्ति और योगबल से भ्रूमध्य में प्राण स्थापित कर परम पुरुष की प्राप्ति

भक्ति और योगबल से स्थिर मन अंतिम क्षण में भी परम पुरुष तक पहुँचा देता है।

13.34

क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ

जैसे एक सूर्य सारे जगत को प्रकाशित करता है, वैसे क्षेत्री सम्पूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करता है

जैसे सूर्य जगत को, वैसे आत्मा सम्पूर्ण शरीर को प्रकाशित करती है।

गीता में कहाँ

संबंधित विषय

जीवन-क्षेत्र

चुनौतियाँ

गुण

विषय

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गीता के अनुसार रोज़ के जीवन में सजग कैसे रहें?
मन को धैर्य से बार-बार वर्तमान की ओर लौटाकर। गीता 6.25 में मन को बलपूर्वक नहीं, धैर्ययुक्त बुद्धि और निरंतर अभ्यास से धीरे-धीरे स्थिर करने की बात है। साथ ही गीता 9.34 की तरह दिन की शुरुआत और अंत स्मरण से करें और काम के बीच भी मन को लौटाने का अभ्यास रखें।
गीता 4.18 में कर्म के पीछे की चेतना देखने का क्या अर्थ है?
गीता 4.18 के अनुसार सच्चा ज्ञानी बाहरी क्रियाओं से परे जाकर कर्म के वास्तविक तत्त्व को समझता है। इसका अर्थ है कि केवल यह न देखें कि क्या किया जा रहा है, बल्कि यह भी कि वह किस चेतना, उद्देश्य और आंतरिक स्थिति से किया जा रहा है। यही सजगता का गहरा रूप है।
गीता 6.18 के अनुसार ध्यान का उद्देश्य क्या है?
गीता 6.18 में योग की सिद्धि तब बताई गई है जब संयमित मन आत्मा में स्थिर हो जाता है और साधक सब कामनाओं से निःस्पृह हो जाता है। इसलिए ध्यान का उद्देश्य केवल तनाव कम करना नहीं, बल्कि मन को भीतर स्थिर करके इच्छाओं की दासता से मुक्त होना भी है।
विचारों के स्तर पर सजग रहना क्यों ज़रूरी है?
क्योंकि गीता 2.62 के अनुसार पतन की प्रक्रिया विषय-चिंतन से शुरू होती है: चिंतन से आसक्ति, आसक्ति से कामना और अपूर्ण कामना से क्रोध। इसलिए किसी भी आकर्षण या लगाव के प्रारंभिक चिंतन पर ही सजग रहें, क्योंकि शुरुआत में रोकना बाद में रोकने से अधिक सरल है।
गीता 4.24 के अनुसार हर काम में सजगता कैसे लाएँ?
गीता 4.24 में ब्रह्मदृष्टि प्राप्त साधक समस्त कर्मों और सम्पूर्ण जगत में एक ही परम सत्य का अनुभव करता है। व्यवहार में इसका अर्थ है कि हर काम और हर व्यक्ति में एकता, सम्मान और दिव्यता को देखने का अभ्यास करें, जिससे भेदभाव और अलगाव की भावना घटती है और मन अधिक उपस्थित रहता है।

एक्सप्लोरर में फ़िल्टर करें

भगवद्गीता खोजें

← आधुनिक संदर्भ