आत्मसंयम पर भगवद्गीता

141 श्लोक, अर्थ और जीवन में उपयोग सहित

आत्मसंयम गुण पर भगवद्गीता के श्लोक 141 श्लोक, अर्थ और उपयोग सहित।

आत्मसंयम एक ऐसा गुण है जो जन्मजात नहीं, बल्कि छोटे-छोटे नियमित चुनावों से बनता है: इच्छा और कर्म के बीच विराम बना पाना, आवेग में तुरंत प्रतिक्रिया न देना और दीर्घकालिक लाभ के लिए तात्कालिक सुख को टाल पाना। जब यह गुण कमज़ोर होता है, तब खान-पान, समय, खर्च और वाणी, सब बिखरने लगते हैं। गीता आत्मसंयम को मन के प्रशिक्षण और सजग निगरानी की साधना के रूप में सिखाती है।

गीता 6.5 और 6.6 के अनुसार मन उत्थान का सबसे बड़ा सहारा भी है और पतन का कारण भी, इसलिए परिस्थितियों को दोष देने के बजाय नियमित आत्मनिरीक्षण, अनुशासन और साधना से मन को अपना मित्र बनाएँ। गीता 6.36 कहती है कि प्रतिभा से अधिक आत्मसंयम, नियमित अभ्यास और निरंतर प्रयास किसी भी महान लक्ष्य की कुंजी हैं, और गीता 2.58 की कछुए की उपमा आवश्यकता पड़ने पर ध्यान को समेट लेने का अभ्यास सिखाती है।

गीता 2.62 बताती है कि पतन की प्रक्रिया विषय-चिंतन से शुरू होती है, इसलिए किसी भी आकर्षण या लगाव के प्रारंभिक चिंतन पर ही सजग रहें। गीता 5.23 में काम-क्रोध के आवेग को सहने वाला स्थायी सुख का अधिकारी बनता है, गीता 5.22 क्षणिक सुख के आकर्षण में दीर्घकालिक कल्याण का त्याग न करने को कहती है, और गीता 16.21 काम, क्रोध और लोभ को पतन के तीन द्वार बताती है, जिन्हें पहचानकर उन पर नियंत्रण का अभ्यास करना चाहिए।

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4.29

ध्यान साधना

प्राणायाम रूप यज्ञ

नियंत्रित श्वास आंतरिक संतुलन और एकाग्रता का द्वार है।

6.4

ध्यानयोग

योगारूढ़ की पहचान

आसक्ति और संकल्पों का त्याग ही योगारूढ़ होने की पहचान है।

गीता में कहाँ

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आधुनिक संदर्भ

गुण

चुनौतियाँ

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गीता 6.36 के अनुसार आत्मसंयम की आदत बनाने में छोटे नियम क्यों उपयोगी हैं?
गीता 6.36 के अनुसार किसी भी महान लक्ष्य की प्राप्ति प्रतिभा से अधिक आत्मसंयम, नियमित अभ्यास और निरंतर प्रयास पर निर्भर करती है। इसलिए एक साथ बहुत कुछ बदलने के बजाय छोटे, नियमित नियम चुनें और उन्हें रोज़ निभाएँ। छोटे-छोटे संयम दोहराने से ही बड़ा आत्मसंयम बनता है।
आत्मसंयम की परीक्षा के क्षण कौन-से होते हैं?
गीता 5.23 के अनुसार काम और क्रोध के तीव्र आवेग के क्षण वास्तविक परीक्षा हैं, जब तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय धैर्य और आत्मनियंत्रण का अभ्यास करना होता है। गीता 2.62 के अनुसार उससे पहले का चरण, यानी विषय-चिंतन, भी महत्वपूर्ण है, इसलिए आरंभिक चिंतन पर सजग रहना ही सबसे सरल रोकथाम है।
आत्मसंयम और आत्मदंड में क्या अंतर है?
आत्मसंयम मन को प्रशिक्षित करके उसे मित्र बनाना है, जबकि आत्मदंड स्वयं को कोसना या दबाना है। गीता 6.5 के अनुसार विवेक और आत्मसंयम से वही मन सर्वोत्तम मित्र बन जाता है, और गीता 6.6 में संयमित मन उन्नति का सबसे बड़ा सहयोगी है। इसलिए गलती पर स्वयं को कोसने के बजाय शांति से अभ्यास पर लौटें।
क्या आत्मसंयम जन्मजात गुण है या अभ्यास से आता है?
गीता 6.36 के अनुसार जिसका मन असंयमित है उसके लिए योग कठिन है, पर आत्मसंयमी और निरंतर प्रयत्न करने वाला साधक उचित साधनों से उसे अवश्य पा सकता है। यानी आत्मसंयम अभ्यास से विकसित होता है। निरंतर प्रयास से असंभव भी संभव हो जाता है।
क्षणिक सुख और दीर्घकालिक कल्याण में चुनाव कैसे करें?
गीता 5.22 के अनुसार इन्द्रियसुख आरम्भ और अन्त वाले होते हैं, इसलिए क्षणिक सुख के आकर्षण में दीर्घकालिक कल्याण का त्याग न करें और संयमित जीवनशैली अपनाएँ। गीता 16.21 के काम, क्रोध और लोभ के तीन द्वारों को पहचानकर उन पर नियंत्रण रखना इस चुनाव को सरल बनाता है।

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