भगवद्गीता 18.49 — अनासक्त, जितात्मा और निःस्पृह को संन्यास से नैष्कर्म्य-सिद्धि
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः ।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति ॥ १८.४९ ॥
🔊 इस श्लोक का अर्थ सुनें
Current voice: —
Ready
Text-to-speech is not supported by this browser.
जिसकी बुद्धि सब जगह अनासक्त है, जिसने मन को जीत लिया है और जो इच्छाओं से रहित है, वह संन्यास के द्वारा कर्मबन्धन से मुक्ति रूप परम नैष्कर्म्य-सिद्धि को प्राप्त करता है।
पदच्छेद
संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।
शब्दार्थ
| पंक्ति 1 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| असक्तबुद्धिः | जिसकी बुद्धि कहीं आसक्त नहीं |
| सर्वत्र | सब जगह |
| जितात्मा | मन को जीतने वाला |
| विगतस्पृहः | इच्छाओं से रहित |
| पंक्ति 2 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| नैष्कर्म्यसिद्धिम् | कर्म-बन्धन से मुक्ति की सिद्धि |
| परमाम् | परम, सर्वोच्च |
| संन्यासेन | संन्यास (आन्तरिक त्याग) से |
| अधिगच्छति | प्राप्त करता है |
| पंक्ति 1 | पंक्ति 2 | ||
|---|---|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ | संस्कृत शब्द | अर्थ |
| असक्तबुद्धिः | जिसकी बुद्धि कहीं आसक्त नहीं | नैष्कर्म्यसिद्धिम् | कर्म-बन्धन से मुक्ति की सिद्धि |
| सर्वत्र | सब जगह | परमाम् | परम, सर्वोच्च |
| जितात्मा | मन को जीतने वाला | संन्यासेन | संन्यास (आन्तरिक त्याग) से |
| विगतस्पृहः | इच्छाओं से रहित | अधिगच्छति | प्राप्त करता है |
विस्तृत विवरण
परिचय
इस श्लोक में श्रीकृष्ण नैष्कर्म्य सिद्धि की परिभाषा देते हैं, जो सर्वत्र आसक्ति-रहित बुद्धि वाले, जितेंद्रिय और स्पृहा-रहित पुरुष को संन्यास के द्वारा प्राप्त होती है।
भावार्थ
नैष्कर्म्य सिद्धि: कर्म से परे की अवस्था
अब तक श्रीकृष्ण ने कर्म को बनाए रखने का उपदेश दिया। यहाँ वे उसकी चरम अवस्था की ओर संकेत करते हैं, जिसे नैष्कर्म्य सिद्धि कहा गया है। नैष्कर्म्य का अर्थ कर्म का न करना नहीं, बल्कि वह अवस्था है जिसमें कर्म करते हुए भी कर्ता का बंधन नहीं रहता। यह परम सिद्धि है।
तीन योग्यताएँ
असक्तबुद्धिः सर्वत्र (Unattached in intellect everywhere): जिसकी बुद्धि किसी भी वस्तु, व्यक्ति या परिणाम में आसक्त नहीं। वह सब कुछ करता है, पर कहीं चिपकता नहीं।
जितात्मा (One who has conquered the self): जिसने अपने मन और इंद्रियों को वश में कर लिया है। जो बाहर के संसार को नहीं, भीतर के संसार को जीतता है।
विगतस्पृहः (Free from craving): जिसकी इच्छाओं की तृष्णा शांत हो गई है। उसके भीतर कुछ पाने की बेचैनी नहीं रहती।
संन्यासेन (संन्यास के द्वारा)
यह सिद्धि संन्यास से प्राप्त होती है। यहाँ संन्यास का वही अर्थ है जो इस अध्याय के आरंभ में स्पष्ट किया गया, यानी कर्म का त्याग नहीं, बल्कि कर्तापन, आसक्ति और फलेच्छा का त्याग। इस प्रकार कर्मयोग और संन्यास दो विरोधी मार्ग नहीं, बल्कि एक ही यात्रा के दो पड़ाव हैं।
अध्याय की धारा का संगम
इस श्लोक में पूरे अध्याय के सूत्र जुड़ते हैं। श्लोक 2 में फलत्याग को संन्यास कहा गया, श्लोक 6 में आसक्ति और फल छोड़कर कर्म करने की बात हुई, और श्लोक 46 में कर्म को पूजा बनाने का मार्ग बताया गया। इन सबका परिणाम यह है कि व्यक्ति कर्म करते हुए भी भीतर से सर्वथा मुक्त हो जाता है।
हमारे दैनिक जीवन के लिए संदेश
यह परम अवस्था रातों-रात नहीं आती, पर इसके संकेत हमारे जीवन में आरंभ से देखे जा सकते हैं। जब हम किसी काम को करके परिणाम की चिंता से मुक्त हो जाते हैं, जब हम इच्छाओं के पीछे भागना कम करते हैं और जब हमारा मन अधिक शांत और स्थिर होता है, तब हम इस मार्ग पर बढ़ रहे होते हैं। छोटी-छोटी मुक्तियाँ ही बड़ी मुक्ति की तैयारी हैं।
नैष्कर्म्य सिद्धि: कर्म से परे की अवस्था
अब तक श्रीकृष्ण ने कर्म को बनाए रखने का उपदेश दिया। यहाँ वे उसकी चरम अवस्था की ओर संकेत करते हैं, जिसे नैष्कर्म्य सिद्धि कहा गया है। नैष्कर्म्य का अर्थ कर्म का न करना नहीं, बल्कि वह अवस्था है जिसमें कर्म करते हुए भी कर्ता का बंधन नहीं रहता। यह परम सिद्धि है।
तीन योग्यताएँ
असक्तबुद्धिः सर्वत्र (Unattached in intellect everywhere): जिसकी बुद्धि किसी भी वस्तु, व्यक्ति या परिणाम में आसक्त नहीं। वह सब कुछ करता है, पर कहीं चिपकता नहीं।
जितात्मा (One who has conquered the self): जिसने अपने मन और इंद्रियों को वश में कर लिया है। जो बाहर के संसार को नहीं, भीतर के संसार को जीतता है।
विगतस्पृहः (Free from craving): जिसकी इच्छाओं की तृष्णा शांत हो गई है। उसके भीतर कुछ पाने की बेचैनी नहीं रहती।
संन्यासेन (संन्यास के द्वारा)
यह सिद्धि संन्यास से प्राप्त होती है। यहाँ संन्यास का वही अर्थ है जो इस अध्याय के आरंभ में स्पष्ट किया गया, यानी कर्म का त्याग नहीं, बल्कि कर्तापन, आसक्ति और फलेच्छा का त्याग। इस प्रकार कर्मयोग और संन्यास दो विरोधी मार्ग नहीं, बल्कि एक ही यात्रा के दो पड़ाव हैं।
अध्याय की धारा का संगम
इस श्लोक में पूरे अध्याय के सूत्र जुड़ते हैं। श्लोक 2 में फलत्याग को संन्यास कहा गया, श्लोक 6 में आसक्ति और फल छोड़कर कर्म करने की बात हुई, और श्लोक 46 में कर्म को पूजा बनाने का मार्ग बताया गया। इन सबका परिणाम यह है कि व्यक्ति कर्म करते हुए भी भीतर से सर्वथा मुक्त हो जाता है।
हमारे दैनिक जीवन के लिए संदेश
यह परम अवस्था रातों-रात नहीं आती, पर इसके संकेत हमारे जीवन में आरंभ से देखे जा सकते हैं। जब हम किसी काम को करके परिणाम की चिंता से मुक्त हो जाते हैं, जब हम इच्छाओं के पीछे भागना कम करते हैं और जब हमारा मन अधिक शांत और स्थिर होता है, तब हम इस मार्ग पर बढ़ रहे होते हैं। छोटी-छोटी मुक्तियाँ ही बड़ी मुक्ति की तैयारी हैं।
आगे का विषय
नैष्कर्म्य सिद्धि की महिमा स्पष्ट हुई। अब श्रीकृष्ण संक्षेप में बताते हैं कि इस सिद्धि को पाया हुआ साधक ब्रह्म को कैसे प्राप्त करता है, जो ज्ञान की परम निष्ठा है।
इस श्लोक में छिपे संदेश
इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।
सूत्र
कहीं भी बुद्धि का न चिपकना ही सच्ची स्वतन्त्रता है।
जिसने मन को जीता, उसने संसार की सबसे कठिन विजय पाई।
इच्छाओं की पकड़ छूटते ही कर्म का बन्धन छूटने लगता है।
संन्यास वस्त्र का नहीं, भाव का त्याग है।
कर्म के बीच भी कर्मबन्धन से मुक्त रहना ही नैष्कर्म्य-सिद्धि है।
सबसे बड़ी सिद्धि बाहरी उपलब्धियों से नहीं, आन्तरिक मुक्ति से मापी जाती है।
कर्मयोग और संन्यास का फल यहाँ एक ही निष्कर्ष तक पहुँचता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
'नैष्कर्म्यसिद्धि' का क्या अर्थ है?
'असक्तबुद्धिः' का क्या भाव है?
यहाँ 'संन्यास' का अर्थ क्या है?
'जितात्मा' और 'विगतस्पृहः' में क्या अन्तर है?
इस श्लोक का एक वाक्य में व्यावहारिक संदेश क्या है?
संबंधित विषय खोजें
इस श्लोक से जुड़े विषयों पर और श्लोक: