शांतचित्तता एक ऐसा गुण है जो नियमित अभ्यास से बढ़ता है: बाहर की हलचल के बीच भी भीतर की स्थिरता बनाए रखना और आवेग में प्रतिक्रिया देने से पहले रुकना। जो शांत रहता है, वह कठिन माहौल में भी सोच-समझकर बोलता है और दूसरों को भी स्थिर करता है। गीता शांति को कृत्रिम चुप्पी नहीं, कामना, क्रोध और अहंकार के घटने से उपजी भीतर की निर्मल प्रसन्नता बताती है।
गीता 2.65 कहती है कि मन की निर्मल प्रसन्नता दुःखों को क्षीण करती है और बुद्धि को शीघ्र स्थिर बना देती है, इसलिए मन को शांत और निर्मल रखने की साधना करें। गीता 2.63 के अनुसार क्रोध विवेक को ढक देता है और विनाश तक ले जाता है, इसलिए क्रोध उठते ही प्रतिक्रिया देने से पहले रुकें, क्योंकि उसी क्षण विवेक और निर्णय-क्षमता सबसे अधिक संकट में होती है।
गीता 6.27 बताती है कि जब मन पूर्णतः शांत हो जाता है और रजोगुण क्षीण होता है, तब साधक परम श्रेष्ठ सुख का अनुभव करता है, और गीता 18.53 के अनुसार अहंकार, क्रोध और संग्रह की प्रवृत्ति छोड़कर ममता-रहित और शांत रहने वाला ब्रह्म-भाव के योग्य बनता है। गीता 12.15 में जो न दूसरों को उद्विग्न करता है, न स्वयं विचलित होता है, वह भगवान् को प्रिय है, और गीता 6.20 में नियमित ध्यान और आत्मचिंतन से भीतर की शांति और संतोष का अनुभव होता है।