स्थिरता वह गुण है जो परिस्थितियों के बदलने पर भी हमारे भीतर के संतुलन को बनाए रखता है। जीवन में अचानक समस्याएँ, अनिश्चितता और भावनात्मक उतार-चढ़ाव आते रहते हैं, पर जिनमें स्थिरता होती है, वे उनसे बह नहीं जाते और सही निर्णय ले पाते हैं। यह गुण अभ्यास, संयम और भीतर के स्थिर केंद्र से जुड़ाव से विकसित होता है, और गीता इसे अलग-अलग रूपों में समझाती है।
गीता 6.19 में योग से संयमित मन की स्थिरता वायु-रहित स्थान में जलते दीपक की लौ जैसी है, और गीता 5.20 के अनुसार जिसकी बुद्धि स्थिर है और जो प्रिय-अप्रिय परिस्थितियों से विचलित नहीं होता, वह ब्रह्म में स्थित रहता है। गीता 6.21 और 6.22 बताती हैं कि इन्द्रियों से परे आत्मानुभूति का सुख और परम लाभ बाहरी दुःखों से विचलित नहीं होने देता।
गीता 2.24 में आत्मा अच्छेद्य, अदाह्य, स्थिर और सनातन बताई गई है, इसलिए जीवन की अस्थिरता के बीच अपने भीतर के स्थिर और अपरिवर्तनीय केन्द्र से जुड़ने का अभ्यास करें। गीता 2.70 में कामनाओं के आने-जाने से समुद्र की भाँति विचलित न होने वाला शांति पाता है, गीता 2.72 में ब्राह्मी स्थिति मोह और मृत्यु-भय से मुक्त करती है, और गीता 7.30 बताती है कि जीवनभर का स्मरण-अभ्यास ही अंतिम क्षण में भी स्थिर चित्त देता है।