भगवद्गीता 1.30 — गाण्डीव का हाथ से गिरना और मन का भ्रमित होना
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते ।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥ १.३० ॥
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मेरे हाथ से गाण्डीव धनुष गिर रहा है, त्वचा में जलन हो रही है, मैं खड़ा रहने में भी समर्थ नहीं हूँ और मेरा मन मानो भ्रमित हो रहा है।
पदच्छेद
संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।
शब्दार्थ
| पंक्ति 1 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| गाण्डीवम् | गाण्डीव धनुष |
| स्रंसते | गिर रहा है |
| हस्तात् | हाथ से |
| त्वक् | त्वचा |
| च | और |
| एव | भी |
| परिदह्यते | जल रही है |
| पंक्ति 2 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| न | नहीं |
| च | और |
| शक्नोमि | समर्थ हूँ |
| अवस्थातुम् | खड़े रहने में |
| भ्रमति | घूम रहा है |
| इव | मानो |
| मे | मेरा |
| मनः | मन |
| पंक्ति 1 | पंक्ति 2 | ||
|---|---|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ | संस्कृत शब्द | अर्थ |
| गाण्डीवम् | गाण्डीव धनुष | न | नहीं |
| स्रंसते | गिर रहा है | च | और |
| हस्तात् | हाथ से | शक्नोमि | समर्थ हूँ |
| त्वक् | त्वचा | अवस्थातुम् | खड़े रहने में |
| च | और | भ्रमति | घूम रहा है |
| एव | भी | इव | मानो |
| परिदह्यते | जल रही है | मे | मेरा |
| मनः | मन | ||
विस्तृत विवरण
परिचय
अर्जुन की स्थिति और गंभीर हो जाती है। इस श्लोक में वह कहता है कि गांडीव धनुष उसके हाथ से फिसल रहा है, त्वचा जल रही है, वह खड़ा नहीं रह पा रहा और मन भ्रमित हो रहा है।
भावार्थ
गांडीव का हाथ से छूटना
अर्जुन कहता है, गाण्डीवं स्रंसते हस्तात् (गांडीव धनुष हाथ से गिर रहा है) और त्वक् च एव परिदह्यते (त्वचा भी जल रही है)। गांडीव अर्जुन की पहचान है, और उसका हाथ से छूटना केवल एक शारीरिक घटना नहीं, बल्कि उसके आत्मविश्वास के टूटने का प्रतीक है।
न च शक्नोमि अवस्थातुम्: 'मैं खड़ा भी नहीं रह सकता।' यह वाक्य उसकी असहायता की पराकाष्ठा दिखाता है। जो वीर सबसे बड़े संग्राम में भी अडिग रहता था, आज वह स्वयं को स्थिर नहीं रख पा रहा।
भ्रमतीव च मे मनः: 'मेरा मन चक्कर खा रहा है।' यहाँ विषाद केवल भावना नहीं रहा, बल्कि मानसिक भ्रम और दिशाहीनता में बदल चुका है।
शक्ति का स्रोत
अर्जुन के पास वही धनुष, वही रथ और वही कौशल है, पर उसका मन टूट गया है। यह दिखाता है कि बाहरी साधन तभी काम आते हैं जब भीतर का मन स्थिर हो।
हमारे जीवन के लिए संदेश
मन की स्थिरता सर्वोपरि: कौशल, साधन और अनुभव, सब तभी उपयोगी हैं जब मन शांत और स्थिर हो। इसलिए मन का अभ्यास सबसे महत्वपूर्ण साधना है।
संकट में सहायता लेना: जब हम स्वयं को सँभाल न पाएँ, तो किसी योग्य मार्गदर्शक का सहारा लेना बुद्धिमानी है। अर्जुन भी आगे श्रीकृष्ण की शरण लेता है।
गांडीव का हाथ से छूटना
अर्जुन कहता है, गाण्डीवं स्रंसते हस्तात् (गांडीव धनुष हाथ से गिर रहा है) और त्वक् च एव परिदह्यते (त्वचा भी जल रही है)। गांडीव अर्जुन की पहचान है, और उसका हाथ से छूटना केवल एक शारीरिक घटना नहीं, बल्कि उसके आत्मविश्वास के टूटने का प्रतीक है।
न च शक्नोमि अवस्थातुम्: 'मैं खड़ा भी नहीं रह सकता।' यह वाक्य उसकी असहायता की पराकाष्ठा दिखाता है। जो वीर सबसे बड़े संग्राम में भी अडिग रहता था, आज वह स्वयं को स्थिर नहीं रख पा रहा।
भ्रमतीव च मे मनः: 'मेरा मन चक्कर खा रहा है।' यहाँ विषाद केवल भावना नहीं रहा, बल्कि मानसिक भ्रम और दिशाहीनता में बदल चुका है।
शक्ति का स्रोत
अर्जुन के पास वही धनुष, वही रथ और वही कौशल है, पर उसका मन टूट गया है। यह दिखाता है कि बाहरी साधन तभी काम आते हैं जब भीतर का मन स्थिर हो।
हमारे जीवन के लिए संदेश
मन की स्थिरता सर्वोपरि: कौशल, साधन और अनुभव, सब तभी उपयोगी हैं जब मन शांत और स्थिर हो। इसलिए मन का अभ्यास सबसे महत्वपूर्ण साधना है।
संकट में सहायता लेना: जब हम स्वयं को सँभाल न पाएँ, तो किसी योग्य मार्गदर्शक का सहारा लेना बुद्धिमानी है। अर्जुन भी आगे श्रीकृष्ण की शरण लेता है।
आगे का विषय
अर्जुन के बाहरी और आंतरिक लक्षण अब स्पष्ट हो चुके हैं। अगले श्लोक में वह अपने मन में उठ रहे अशुभ संकेतों और युद्ध के परिणाम को लेकर अपनी पहली स्पष्ट शंका प्रकट करता है।
इस श्लोक में छिपे संदेश
इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।
सूत्र
जब कर्तव्य का शस्त्र हाथ से छूटे, तब समझो मन ने नियन्त्रण खो दिया।
भीतर की व्यथा शरीर में जलन बनकर प्रकट होती है।
भ्रमित मन के लिए खड़े रहना भी कठिन हो जाता है।
स्थिर मन के बिना बड़ी शक्ति भी निष्क्रिय हो जाती है।
संकट में नायक भी टूटता है; महत्त्व इसका है कि वह सहारा किससे लेता है।
आत्मबल बाहर के शस्त्र से अधिक भीतर की स्थिरता में बसता है।
अर्जुन की स्पष्ट स्वीकारोक्ति ही उसे उपदेश के योग्य बनाती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
गाण्डीव क्या है?
गाण्डीव का हाथ से गिरना क्या दर्शाता है?
'भ्रमतीव मे मनः' का क्या भाव है?
क्या अर्जुन की यह दशा सामान्य है?
इस श्लोक का एक वाक्य में व्यावहारिक संदेश क्या है?
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