करुणा पर भगवद्गीता

28 श्लोक, अर्थ और जीवन में उपयोग सहित

करुणा पर भगवद्गीता के श्लोक 28 श्लोक, अर्थ और उपयोग सहित।

करुणा दूसरों के दुःख को महसूस कर उसे घटाने की इच्छा है। यह केवल भावुकता नहीं, बल्कि वह संवेदनशीलता है जो कर्म में बदलती है: किसी की मदद करना, कठोर शब्द रोकना और सामने वाले की स्थिति समझना। पर करुणा भी विवेक के बिना भ्रमित हो सकती है, इसलिए गीता करुणा और कर्तव्य के संतुलन की बात करती है।

गीता 16.2 अहिंसा, सत्य और सब प्राणियों पर दया को दैवी स्वभाव का आचरण बताती है, और गीता 12.13 में भक्त किसी से द्वेष नहीं करता, सबके प्रति मित्रभाव और करुणा रखता है, ममता तथा अहंकार से मुक्त रहता है और क्षमा करता है। गीता 13.29 कहती है कि सबमें समान ईश्वर को देखने वाला दूसरों को कष्ट पहुँचाकर स्वयं को हानि नहीं पहुँचाता।

गीता 1.28, 1.29 और 1.30 में अर्जुन के अंग शिथिल होते हैं, शरीर काँपता है और गाण्डीव गिरता है, जो मन के द्वंद्व और विषाद के संकेत हैं। गीता 1.35 में अर्जुन की अहिंसा-भावना ऊँची लगती है, पर वह कर्तव्य और धर्म के संदर्भ को देखे बिना भावनात्मक आवेग में की गई घोषणा है, इसलिए करुणा को परिस्थिति और धर्म के संदर्भ में विवेक से परखना चाहिए। गीता 1.47 में विषाद चरम पर पहुँचकर मार्गदर्शन की आवश्यकता बनता है।

इन श्लोकों से शुरू करें

सभी 28 श्लोक

गीता में कहाँ

संबंधित विषय

गुण

जीवन-क्षेत्र

आधुनिक संदर्भ

चुनौतियाँ

विषय

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गीता के अनुसार करुणा कैसे विकसित करें?
द्वेष की जगह मित्रता, अहंकार की जगह विनम्रता और प्रतिशोध की जगह क्षमा अपनाकर। गीता 12.13 में भक्त का सबके प्रति मित्रभाव और करुणा रखना भक्ति का स्वाभाविक फल बताया गया है, और गीता 16.2 में व्यवहार में कठोरता, चुगली और क्रोध घटाकर सत्य बोलना तथा सब प्राणियों के प्रति संवेदनशील रहना सिखाया गया है।
गीता 1.35 में भावनात्मक घोषणा को विवेक से परखने का क्या अर्थ है?
गीता 1.35 में अर्जुन की अहिंसा और त्याग की भावना ऊँची लगती है, पर वह कर्तव्य और धर्मयुद्ध के संदर्भ को देखे बिना भावनात्मक आवेग में की गई घोषणा है। इसकी सीख है कि मूल्य और अहिंसा की भावना महत्वपूर्ण है, पर उसे परिस्थिति, कर्तव्य और धर्म के संदर्भ में विवेक से परखना चाहिए।
गीता 1.30 में अर्जुन का गाण्डीव गिरना मन की अस्थिरता के बारे में क्या दिखाता है?
गीता 1.30 में महान धनुर्धर अर्जुन की शक्ति मानसिक विषाद के आगे टूट जाती है, जो दिखाता है कि भीतरी अस्थिरता सबसे बड़े सामर्थ्य को भी निष्क्रिय कर सकती है। इसलिए कितनी भी योग्यता हो, मन की अस्थिरता उसे निष्प्रभावी कर सकती है, और दूसरों के दुःख को सँभालने के लिए भी मानसिक स्थिरता का अभ्यास ज़रूरी है।
करुणा और मोह में क्या अंतर है?
करुणा दूसरों के कल्याण की ओर देखती है, जबकि मोह अपनी पकड़ और भावनात्मक आवेग की ओर। गीता 1.35 में अर्जुन की अहिंसा भावनात्मक आवेग में की गई घोषणा है, जिसे विवेक की कसौटी पर परखना आवश्यक है, जबकि गीता 12.13 में करुणा ममता और अहंकार से मुक्त, द्वेषरहित और क्षमाशील रूप में दिखती है।
करुणा के साथ कर्तव्य का संतुलन कैसे रखें?
गीता 1.35 की सीख है कि मूल्य और अहिंसा की भावना महत्वपूर्ण है, पर उसे परिस्थिति, कर्तव्य और धर्म के संदर्भ में विवेक से परखना चाहिए। गीता 1.47 में विषाद के चरम पर कर्म से विमुख हो जाना समाधान नहीं, बल्कि योग्य मार्गदर्शन की शरण लेना पहला कदम है। करुणा कर्तव्य से भागने का कारण न बने।

एक्सप्लोरर में फ़िल्टर करें

भगवद्गीता खोजें

← विषय