अध्याय 2 सांख्य योग

72 श्लोक

यह अध्याय भगवद्गीता की मूल शिक्षाओं का आधार प्रस्तुत करता है। भगवान श्रीकृष्ण आत्मा की नित्यता, शरीर की नश्वरता और समत्वभाव से कर्म करने का महत्व समझाते हैं। इस अध्याय से हमें यह समझने को मिलता है कि आसक्ति, इच्छा और भय किस प्रकार दुःख का कारण बनते हैं तथा संतुलित दृष्टि और स्थिर बुद्धि जीवन में शांति और प्रभावी कर्म का मार्ग प्रशस्त करती है। यह अध्याय चिंता, अस्थिरता और भ्रम को दूर कर उद्देश्यपूर्ण जीवन जीने की दिशा प्रदान करता है।

श्लोक सूची

किसी भी श्लोक पर क्लिक करके संस्कृत पाठ, शब्दार्थ और विस्तृत व्याख्या देखें।

श्लोक 1 करुणा और विषाद में डूबे अर्जुन को भगवान् का पहला उत्तर सञ्जय उवाच । तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् । विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥ २.१ ॥ सञ्जय ने कहा—इस प्रकार करुणा से अभिभूत, आँसुओं से भरे व्याकुल नेत्रों वाले और विषाद करते हुए अर्जुन से मधुसूदन भगवान् श्रीकृष्ण ने यह वचन कहा। → श्लोक 2 असमय का मोह: अनार्य, अस्वर्ग्य और अकीर्तिकर श्रीभगवानुवाच । कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् । अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ॥ २.२ ॥ भगवान् ने कहा—हे अर्जुन! इस विषम और संकट के समय तुझे यह मोह (मन की मलिनता) कहाँ से आ गया? यह न श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरित है, न उत्थान या स्वर्ग देने वाला है और न कीर्ति बढ़ाने वाला। → श्लोक 3 हृदय की तुच्छ दुर्बलता त्यागकर उठो क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते । क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ॥ २.३ ॥ हे पार्थ! कायरता को प्राप्त मत हो, यह तुझे शोभा नहीं देती। हे परन्तप! हृदय की इस तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर युद्ध के लिए खड़ा हो जा। → श्लोक 4 पूज्य भीष्म और द्रोण पर बाण कैसे चलाऊँ? अर्जुन उवाच । कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन । इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ॥ २.४ ॥ अर्जुन ने कहा—हे मधुसूदन! मैं युद्ध में भीष्म और द्रोण के विरुद्ध बाणों से कैसे लड़ूँगा? हे अरिसूदन! वे दोनों तो पूजा के योग्य हैं। → श्लोक 5 गुरुजनों की हत्या से मिला सुख रक्त से सना है गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके । हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ॥ २.५ ॥ इन महानुभाव गुरुजनों को मारे बिना इस लोक में भिक्षा का अन्न खाना भी मेरे लिए श्रेष्ठ है। क्योंकि इन अर्थ और भोग चाहने वाले गुरुजनों को मारकर तो मैं यहीं रक्त से सने हुए भोगों को ही भोगूँगा। → श्लोक 6 जय या पराजय—किसमें श्रेय है, यह भी स्पष्ट नहीं न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः । यानेव हत्वा न जिजीविषामस्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥ २.६ ॥ हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए कौन-सा श्रेष्ठ है—हमारा उन्हें जीतना या उनका हमें जीतना। जिन्हें मारकर हम जीना भी नहीं चाहेंगे, वही धृतराष्ट्र के पुत्र हमारे सामने युद्ध के लिए खड़े हैं। → श्लोक 7 शिष्यभाव से शरणागति: मुझे निश्चित श्रेय बताइए कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः । यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥ २.७ ॥ दीनता के दोष से मेरा स्वभाव दब गया है और धर्म के विषय में मेरा चित्त मोहित है। इसलिए मैं आपसे पूछता हूँ कि जो निश्चित रूप से मेरे लिए कल्याणकारी हो, वह मुझे बताइए। मैं आपका शिष्य हूँ और आपकी शरण में आया हूँ, मुझे उपदेश दीजिए। → श्लोक 8 राज्य और देवत्व भी इन्द्रियों को सुखाने वाले शोक को नहीं मिटा सकते न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद् यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् । अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥ २.८ ॥ पृथ्वी पर शत्रुरहित, समृद्ध राज्य और देवताओं का आधिपत्य पाकर भी मैं ऐसा कोई उपाय नहीं देखता जो मेरी इन्द्रियों को सुखा देने वाले इस शोक को दूर कर सके। → श्लोक 9 'मैं युद्ध नहीं करूँगा'—अर्जुन का मौन सञ्जय उवाच । एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप । न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ॥ २.९ ॥ सञ्जय ने कहा—हे परन्तप (धृतराष्ट्र)! इस प्रकार हृषीकेश श्रीकृष्ण से कहकर निद्रा को जीतने वाले अर्जुन 'मैं युद्ध नहीं करूँगा' ऐसा गोविन्द से कहकर चुप हो गए। → श्लोक 10 दोनों सेनाओं के बीच मुस्कुराते भगवान् का उपदेश-आरम्भ तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत । सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः ॥ २.१० ॥ हे भारत! दोनों सेनाओं के बीच विषाद करते हुए उस अर्जुन से हृषीकेश श्रीकृष्ण ने मानो मुस्कुराते हुए ये वचन कहे। → श्लोक 11 पण्डित न जीवितों के लिए शोक करते हैं, न मृतकों के लिए श्रीभगवानुवाच । अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे । गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥ २.११ ॥ भगवान् ने कहा—तू उनके लिए शोक करता है जो शोक करने योग्य नहीं हैं, और बातें पण्डितों जैसी करता है। परन्तु ज्ञानी पुरुष न तो मरे हुओं के लिए शोक करते हैं और न जीवित लोगों के लिए। → श्लोक 12 आत्मा की नित्यता: हम सब पहले भी थे, आगे भी रहेंगे न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः । न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ॥ २.१२ ॥ ऐसा कभी नहीं था कि मैं नहीं था, या तू नहीं था, या ये राजा लोग नहीं थे; और ऐसा भी नहीं है कि इसके बाद हम सब नहीं रहेंगे। अर्थात् आत्मा के रूप में हम सब पहले भी थे और आगे भी रहेंगे। → श्लोक 13 देह बदलती है, आत्मा नहीं: धीर पुरुष मोहित नहीं होता देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा । तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥ २.१३ ॥ जैसे इस शरीर में देहधारी आत्मा बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था को प्राप्त होती है, वैसे ही वह दूसरे शरीर को भी प्राप्त होती है। धीर पुरुष इस विषय में मोहित नहीं होता। → श्लोक 14 सुख-दुःख आते-जाते हैं: उन्हें सहन करना सीखो मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः । आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥ २.१४ ॥ हे कुन्तीपुत्र! इन्द्रियों का विषयों से संयोग सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख देने वाला है। ये आने-जाने वाले और अनित्य हैं, इसलिए हे भारत! तू इन्हें सहन कर। → श्लोक 15 सुख-दुःख में सम धीर पुरुष अमृतत्व का अधिकारी है यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ । समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ २.१५ ॥ हे पुरुषश्रेष्ठ! ये इन्द्रिय-विषयों के संयोग जिस धीर पुरुष को व्यथित नहीं करते और जिसके लिए सुख-दुःख समान हैं, वही अमृतत्व (मोक्ष) के योग्य होता है। → श्लोक 16 असत् की सत्ता नहीं, सत् का अभाव नहीं: तत्त्वदर्शियों का निष्कर्ष नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः । उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥ २.१६ ॥ असत् (अनित्य वस्तु) की स्थायी सत्ता नहीं होती और सत् (नित्य आत्मतत्त्व) का कभी अभाव नहीं होता। तत्त्वदर्शी ज्ञानियों ने इन दोनों के स्वरूप का निष्कर्ष इसी प्रकार देखा है। → श्लोक 17 जिससे यह सब व्याप्त है, उस अविनाशी का नाश कोई नहीं कर सकता अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् । विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ॥ २.१७ ॥ तू उसे अविनाशी जान, जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है। इस अविनाशी तत्त्व का नाश कोई भी नहीं कर सकता। → श्लोक 18 शरीर नाशवान् है, आत्मा नित्य: इसलिए युद्ध कर अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः । अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ॥ २.१८ ॥ नित्य, नाशरहित और अप्रमेय शरीरधारी आत्मा के ये सभी शरीर नाशवान् कहे गए हैं। इसलिए हे भारत! तू (शोक छोड़कर) युद्ध कर। → श्लोक 19 न कोई मारता है, न कोई मरता है: आत्मा अकर्ता है य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् । उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥ २.१९ ॥ जो इस आत्मा को मारने वाला मानता है और जो इसे मारा गया मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते। क्योंकि यह आत्मा न किसी को मारती है और न स्वयं मारी जाती है। → श्लोक 20 आत्मा अजन्मा, नित्य और शाश्वत है: शरीर के नाश से नष्ट नहीं होती न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः । अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ २.२० ॥ यह आत्मा न कभी जन्म लेती है और न कभी मरती है, और न यह होकर फिर न होने वाली है। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है। शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारी जाती। → श्लोक 21 जो आत्मा को अविनाशी जानता है, वह किसे मारता या मरवाता है? वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् । कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥ २.२१ ॥ हे पार्थ! जो पुरुष इस आत्मा को नाशरहित, नित्य, अजन्मा और अव्यय जानता है, वह कैसे किसी को मरवाएगा और कैसे किसी को मारेगा? → श्लोक 22 जैसे पुराने वस्त्र बदले जाते हैं, वैसे आत्मा शरीर बदलती है वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि । तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥ २.२२ ॥ जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्र धारण करता है, वैसे ही देहधारी आत्मा पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होती है। → श्लोक 23 न शस्त्र काटते, न अग्नि जलाती, न जल भिगोता, न वायु सुखाती नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः । न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥ २.२३ ॥ इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती, जल भिगो नहीं सकता और वायु सुखा नहीं सकती। → श्लोक 24 आत्मा अच्छेद्य, अदाह्य, अक्लेद्य, अशोष्य, नित्य और सनातन है अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च । नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥ २.२४ ॥ यह आत्मा काटी नहीं जा सकती, जलाई नहीं जा सकती, भिगोई नहीं जा सकती और सुखाई भी नहीं जा सकती। यह नित्य, सर्वव्यापी, स्थिर, अचल और सनातन है। → श्लोक 25 आत्मा अव्यक्त, अचिन्त्य और अविकारी है: इसलिए शोक उचित नहीं अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते । तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ॥ २.२५ ॥ यह आत्मा अव्यक्त (इन्द्रियों से दिखाई न देने वाली), अचिन्त्य (मन-बुद्धि की सीमा से परे) और अविकारी कही जाती है। इसलिए इसे इस प्रकार जानकर तुझे शोक करना उचित नहीं है। → श्लोक 26 आत्मा को नित्य जन्मने-मरने वाला मानो, तब भी शोक उचित नहीं अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् । तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ॥ २.२६ ॥ और यदि तू इस आत्मा को सदा जन्म लेने वाला या सदा मरने वाला मानता है, तो भी हे महाबाहो! तुझे इस प्रकार शोक करना उचित नहीं है। → श्लोक 27 जन्म लेने वाले की मृत्यु निश्चित है: अपरिहार्य पर शोक नहीं जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च । तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ २.२७ ॥ जन्मे हुए की मृत्यु निश्चित है और मरे हुए का जन्म भी निश्चित है। इसलिए जो अपरिहार्य (टाला न जा सकने वाला) विषय है, उसके लिए तुझे शोक करना उचित नहीं। → श्लोक 28 प्राणी आरम्भ में अव्यक्त, मध्य में व्यक्त, अन्त में फिर अव्यक्त हैं अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत । अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥ २.२८ ॥ हे भारत! सभी प्राणी आरम्भ में अप्रकट थे, बीच में प्रकट होते हैं और अन्त में फिर अप्रकट हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में विलाप करने का क्या कारण है? → श्लोक 29 आत्मा आश्चर्य है: देखने, कहने, सुनने पर भी कोई विरला ही जानता है आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः । आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥ २.२९ ॥ कोई इस आत्मा को आश्चर्य की भाँति देखता है, कोई वैसे ही आश्चर्य से इसका वर्णन करता है, और कोई इसे आश्चर्य से सुनता है। परन्तु सुनकर भी कोई इसे वास्तव में नहीं जान पाता। → श्लोक 30 सबके देह में स्थित आत्मा अवध्य है: इसलिए किसी के लिए शोक नहीं देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत । तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ २.३० ॥ हे भारत! सबके शरीर में स्थित यह आत्मा सदा अवध्य है, उसका वध नहीं हो सकता। इसलिए तुझे किसी भी प्राणी के लिए शोक करना उचित नहीं है। → श्लोक 31 स्वधर्म को देखकर भी विचलित मत हो: धर्मयुक्त युद्ध क्षत्रिय के लिए श्रेष्ठ है स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि । धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥ २.३१ ॥ अपने स्वधर्म को देखकर भी तुझे विचलित नहीं होना चाहिए, क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर कल्याणकारी कोई दूसरा कर्तव्य नहीं है। → श्लोक 32 स्वयं आया खुला स्वर्गद्वार: भाग्यवान क्षत्रियों को ही ऐसा युद्ध मिलता है यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् । सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥ २.३२ ॥ हे पार्थ! अपने आप प्राप्त हुआ यह युद्ध मानो स्वर्ग का खुला द्वार है। ऐसे धर्मयुक्त युद्ध को भाग्यशाली क्षत्रिय ही प्राप्त करते हैं। → श्लोक 33 धर्मयुक्त युद्ध न करने पर स्वधर्म और कीर्ति खोकर पाप मिलेगा अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्ग्रामं न करिष्यसि । ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥ २.३३ ॥ और यदि तू इस धर्मयुक्त युद्ध को नहीं करेगा, तो अपने स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होगा। → श्लोक 34 सम्मानित व्यक्ति के लिए अपकीर्ति मृत्यु से भी बढ़कर है अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् । सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ॥ २.३४ ॥ सब लोग तेरी सदा रहने वाली अपकीर्ति की चर्चा करेंगे। और सम्मानित व्यक्ति के लिए अपकीर्ति मृत्यु से भी बढ़कर कष्टदायक होती है। → श्लोक 35 महारथी तुझे भय से युद्ध छोड़ने वाला समझेंगे भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः । येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ॥ २.३५ ॥ महारथी लोग तुझे भय के कारण युद्ध से हटा हुआ मानेंगे। और जिनकी दृष्टि में तू अत्यन्त सम्मानित रहा है, उन्हीं की दृष्टि में तू तुच्छता को प्राप्त होगा। → श्लोक 36 शत्रु निन्दा करेंगे: इससे अधिक दुःखदायी और क्या होगा? अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः । निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ॥ २.३६ ॥ तेरे शत्रु तेरी सामर्थ्य की निन्दा करते हुए बहुत से न कहने योग्य वचन कहेंगे। उससे अधिक दुःखदायी और क्या होगा? → श्लोक 37 मरकर स्वर्ग, जीतकर पृथ्वी: दृढ़ निश्चय करके युद्ध के लिए उठो हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् । तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ॥ २.३७ ॥ यदि तू युद्ध में मारा गया तो स्वर्ग को प्राप्त करेगा और यदि जीत गया तो पृथ्वी का राज्य भोगेगा। इसलिए हे कुन्तीपुत्र! युद्ध के लिए दृढ़ निश्चय करके उठ खड़ा हो। → श्लोक 38 सुख-दुःख, लाभ-हानि और जय-पराजय में सम होकर युद्ध करो सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ । ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥ २.३८ ॥ सुख-दुःख, लाभ-हानि और जय-पराजय को समान समझकर तू युद्ध के लिए तैयार हो जा। इस प्रकार (समभाव से कर्तव्य करने पर) तुझे पाप नहीं लगेगा। → श्लोक 39 सांख्य का ज्ञान कहा; अब कर्मयोग की बुद्धि सुनो जिससे कर्मबन्धन छूटता है एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु । बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ॥ २.३९ ॥ हे पार्थ! यह सांख्य (ज्ञान) के विषय में बुद्धि मैंने तुझे कही। अब कर्मयोग के विषय में इसे सुन, जिस बुद्धि से युक्त होकर तू कर्मों के बन्धन को छोड़ देगा। → श्लोक 40 कर्मयोग में आरम्भ का नाश नहीं: थोड़ा साधन भी महान् भय से बचाता है नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते । स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥ २.४० ॥ इस कर्मयोग में आरम्भ का नाश नहीं होता और कोई विपरीत फल भी नहीं होता। इस धर्म का थोड़ा सा भी अनुष्ठान महान् भय से रक्षा कर लेता है। → श्लोक 41 योगबुद्धि एक और निश्चयात्मक है; अनिश्चयी की बुद्धियाँ अनेक और अनन्त व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन । बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥ २.४१ ॥ हे कुरुनन्दन! इस कर्मयोग में निश्चयात्मक बुद्धि एक ही होती है। परन्तु जिनका निश्चय दृढ़ नहीं है, उन लोगों की बुद्धियाँ अनेक शाखाओं वाली और अनन्त होती हैं। → श्लोक 42 पुष्पित वाणी: वेदवाद में रमे अविवेकी केवल भोग को ही सब कुछ मानते हैं यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः । वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ॥ २.४२ ॥ हे पार्थ! जो अविवेकी लोग वेदों के शब्दों में ही रमे रहते हैं और 'इसके सिवा कुछ नहीं है' ऐसा कहते हैं, वे इस फूलों जैसी सजी हुई (आकर्षक) वाणी को कहते हैं। → श्लोक 43 कामना से भरे, स्वर्ग-परायण लोग: कर्मकाण्ड की भोग-ऐश्वर्य वाली वाणी कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् । क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ॥ २.४३ ॥ (श्लोक 42 की वाणी) कामनाओं में डूबे, स्वर्ग को ही श्रेष्ठ मानने वाले लोग उस वाणी को कहते हैं जो जन्म और कर्मफल देने वाली है तथा भोग और ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए अनेक विशेष क्रियाओं का वर्णन करती है। → श्लोक 44 भोग-ऐश्वर्य में आसक्त मन में निश्चयात्मक बुद्धि समाधि में नहीं टिकती भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् । व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥ २.४४ ॥ उस वाणी से जिनका चित्त हर लिया गया है और जो भोग तथा ऐश्वर्य में अत्यन्त आसक्त हैं, उनकी निश्चयात्मक बुद्धि समाधि (परमात्मा में स्थिरता) में स्थित नहीं होती। → श्लोक 45 तीनों गुणों से ऊपर उठो: निर्द्वन्द्व, सत्त्वस्थ और आत्मवान् बनो त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन । निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥ २.४५ ॥ हे अर्जुन! वेद (कर्मकाण्ड भाग) तीनों गुणों के विषयों का वर्णन करने वाले हैं, तू तीनों गुणों से ऊपर उठ जा। तू द्वन्द्वों से रहित, सदा सत्त्व में स्थित, योग-क्षेम की चिन्ता से मुक्त और आत्मवान् हो जा। → श्लोक 46 जैसे सब ओर जल भरे होने पर छोटे जलाशय का प्रयोजन नहीं, वैसे ज्ञानी का वेदों से यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके । तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥ २.४६ ॥ सब ओर से जल से परिपूर्ण महाजलाशय मिल जाने पर छोटे कूप-जलाशय में जितना प्रयोजन रह जाता है, उतना ही प्रयोजन तत्त्व को जानने वाले ब्रह्मज्ञानी का सम्पूर्ण वेदों के (सकाम) कर्मकाण्ड में रहता है। → श्लोक 47 कर्म में ही तेरा अधिकार है, फल में कभी नहीं कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥ २.४७ ॥ तेरा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों में कभी नहीं। तू कर्मफल का हेतु (उसी के लिए कर्म करने वाला) मत बन और तेरी आसक्ति कर्म न करने में भी न हो। → श्लोक 48 आसक्ति छोड़कर, सिद्धि-असिद्धि में सम होकर कर्म करो: समता ही योग है योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय । सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥ २.४८ ॥ हे धनञ्जय! आसक्ति को त्यागकर, सफलता और असफलता में समान भाव रखते हुए, योग में स्थित होकर कर्मों को कर। यही समता 'योग' कही जाती है। → श्लोक 49 फल के हेतु वाले कर्म तुच्छ हैं: बुद्धियोग की शरण लो दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय । बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥ २.४९ ॥ हे धनञ्जय! सकाम कर्म समबुद्धि रूप योग से बहुत ही निम्न है। इसलिए तू समबुद्धि का आश्रय ले, क्योंकि फल की इच्छा से कर्म करने वाले दीन (संकुचित) होते हैं। → श्लोक 50 योग कर्मों में कुशलता है: समबुद्धि पुण्य-पाप दोनों से परे ले जाती है बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते । तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥ २.५० ॥ समबुद्धि से युक्त पुरुष इसी जीवन में पुण्य और पाप दोनों के बन्धन को छोड़ देता है। इसलिए तू योग के लिए प्रयत्न कर, क्योंकि कर्मों में कुशलता ही योग है। → श्लोक 51 फलत्यागी बुद्धियुक्त ज्ञानी जन्म-बन्धन से मुक्त होकर निर्दोष पद पाते हैं कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः । जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥ २.५१ ॥ समबुद्धि से युक्त ज्ञानी लोग कर्म से उत्पन्न होने वाले फल का त्याग करके जन्म के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं और निर्दोष (दुःखरहित) परमपद को प्राप्त होते हैं। → श्लोक 52 जब बुद्धि मोह के दलदल को पार करेगी, तब वैराग्य उत्पन्न होगा यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति । तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥ २.५२ ॥ जब तेरी बुद्धि मोह रूपी दलदल को पार कर जाएगी, तब तू सुने हुए और सुनने योग्य सभी भोग-सम्बन्धी बातों के प्रति वैराग्य को प्राप्त होगा। → श्लोक 53 जब बुद्धि शास्त्र-सुनने की उलझन से हटकर समाधि में अचल होगी, तब योग प्राप्त होगा श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला । समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥ २.५३ ॥ अनेक प्रकार की बातें सुनने से विचलित हुई तेरी बुद्धि जब परमात्मा में निश्चल और अचल रूप से स्थिर हो जाएगी, तब तू योग (समत्व-योग) को प्राप्त करेगा। → श्लोक 54 स्थितप्रज्ञ की पहचान: उसकी भाषा, बैठना और चलना कैसा होता है? अर्जुन उवाच । स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव । स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ॥ २.५४ ॥ अर्जुन ने कहा—हे केशव! समाधि में स्थित स्थिर बुद्धि वाले पुरुष के क्या लक्षण होते हैं? वह स्थितप्रज्ञ कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है? → श्लोक 55 मन की सब कामनाएँ त्यागकर आत्मा में ही तृप्त: यही स्थितप्रज्ञ है श्रीभगवानुवाच । प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् । आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥ २.५५ ॥ भगवान् ने कहा—हे पार्थ! जब मनुष्य मन में स्थित सब कामनाओं को पूरी तरह त्याग देता है और अपने आप में ही अपने द्वारा सन्तुष्ट रहता है, तब वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है। → श्लोक 56 दुःख में उद्विग्न नहीं, सुख में निःस्पृह: राग, भय और क्रोध से मुक्त मुनि दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः । वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥ २.५६ ॥ जिसका मन दुःखों में उद्विग्न नहीं होता, सुखों में जिसकी स्पृहा नहीं रहती, तथा जो राग, भय और क्रोध से मुक्त हो गया है, ऐसा स्थिर बुद्धि वाला पुरुष मुनि कहलाता है। → श्लोक 57 शुभ-अशुभ पाकर जो न अभिनन्दन करता है, न द्वेष: उसकी प्रज्ञा स्थिर है यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् । नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ २.५७ ॥ जो पुरुष सर्वत्र आसक्ति से रहित है और उन-उन शुभ या अशुभ वस्तुओं या परिस्थितियों को पाकर न अत्यधिक प्रसन्न होता है, न द्वेष करता है, उसकी प्रज्ञा स्थिर होती है। → श्लोक 58 कछुए की तरह इन्द्रियों को विषयों से समेट लेने वाले की प्रज्ञा स्थिर है यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ २.५८ ॥ जैसे कछुआ सब ओर से अपने अंगों को समेट लेता है, वैसे ही जब यह साधक इन्द्रियों को इन्द्रिय-विषयों से सब प्रकार से समेट लेता है, तब उसकी प्रज्ञा स्थिर हो जाती है। → श्लोक 59 विषय छूटते हैं पर रस नहीं: परम को देखने पर ही रस भी निवृत्त होता है विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः । रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥ २.५९ ॥ इन्द्रियों को विषय न देने वाले देहधारी के विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, पर उनमें रस (आसक्ति) बना रहता है। इस स्थितप्रज्ञ का वह रस भी परमात्मा का साक्षात्कार होने पर निवृत्त हो जाता है। → श्लोक 60 प्रयत्नशील विवेकी पुरुष का मन भी प्रबल इन्द्रियाँ बलपूर्वक हर लेती हैं यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः । इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥ २.६० ॥ हे कौन्तेय! प्रयत्न करने वाले विवेकी पुरुष के भी मन को ये मथ डालने वाली प्रबल इन्द्रियाँ बलपूर्वक हर लेती हैं। → श्लोक 61 इन्द्रियों को वश में करके मत्परायण होकर बैठो: यही स्थिर प्रज्ञा का आधार है तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः । वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ २.६१ ॥ उन सब इन्द्रियों को संयम में रखकर साधक योगयुक्त होकर मुझमें परायण होकर स्थित रहे। क्योंकि जिसकी इन्द्रियाँ वश में होती हैं, उसकी प्रज्ञा स्थिर होती है। → श्लोक 62 विषयों का चिन्तन आसक्ति से कामना और क्रोध तक ले जाता है ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते । सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥ २.६२ ॥ विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है। आसक्ति से कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने पर क्रोध उत्पन्न होता है। → श्लोक 63 क्रोध से मोह, मोह से स्मृति-भ्रम, फिर बुद्धिनाश और सर्वनाश क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः । स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥ २.६३ ॥ क्रोध से सम्मोह (विवेकहीनता) उत्पन्न होता है, सम्मोह से स्मृति में भ्रम होता है, स्मृति के भ्रम से बुद्धि का नाश होता है और बुद्धि के नाश से मनुष्य अपने श्रेयस्कर पथ से गिरकर नष्ट हो जाता है। → श्लोक 64 राग-द्वेष से मुक्त संयमी विषयों में विचरते हुए भी प्रसन्नता पाता है रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् । आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥ २.६४ ॥ परन्तु जिसका अन्तःकरण अपने वश में है, वह राग-द्वेष से रहित और अपने वश में की हुई इन्द्रियों से विषयों में विचरण करता हुआ भी प्रसन्नता (मन की निर्मलता और शान्ति) को प्राप्त होता है। → श्लोक 65 प्रसन्नता में सब दुःख नष्ट होते हैं और बुद्धि शीघ्र स्थिर हो जाती है प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते । प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥ २.६५ ॥ मन की प्रसन्नता प्राप्त होने पर इस साधक के सब दुःखों का नाश हो जाता है। ऐसे प्रसन्न चित्त वाले पुरुष की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से हटकर परमात्मा में स्थिर हो जाती है। → श्लोक 66 अयुक्त को न बुद्धि, न भावना, न शान्ति: अशान्त को सुख कहाँ? नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना । न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ॥ २.६६ ॥ जिसका मन और इन्द्रियाँ संयमित नहीं हैं, उसमें निश्चयात्मक बुद्धि नहीं होती और उसमें भावना (ध्यान-निष्ठा) भी नहीं होती। भावना-रहित को शान्ति नहीं मिलती और अशान्त को सुख कहाँ से मिलेगा? → श्लोक 67 विषयों में विचरती इन्द्रियों के पीछे चलता मन प्रज्ञा को हर लेता है इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते । तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥ २.६७ ॥ विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों में से जिस एक इन्द्रिय के पीछे मन चल पड़ता है, वह एक इन्द्रिय ही इस पुरुष की प्रज्ञा को वैसे हर लेती है जैसे जल में वायु नाव को बहा ले जाती है। → श्लोक 68 जिसकी इन्द्रियाँ विषयों से पूर्णतः निगृहीत हैं, उसकी प्रज्ञा स्थिर है तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ २.६८ ॥ इसलिए हे महाबाहो! जिस पुरुष की इन्द्रियाँ इन्द्रिय-विषयों से सब प्रकार से वश में की हुई हैं, उसी की प्रज्ञा स्थिर है। → श्लोक 69 जो सब प्राणियों की रात है, उसमें संयमी जागता है या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी । यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥ २.६९ ॥ जो सब प्राणियों के लिए रात्रि है (अर्थात् आत्मतत्त्व जिसे वे नहीं जानते), उसमें संयमी योगी जागता है। और जिसमें सब प्राणी जागते हैं (अर्थात् भोग-विषयों में लगे रहते हैं), वह तत्त्व को देखने वाले मुनि के लिए रात्रि है। → श्लोक 70 जैसे नदियाँ समुद्र में समा जाती हैं, वैसे ही कामनाएँ शान्त पुरुष में आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् । तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥ २.७० ॥ जैसे सब ओर से भरे जाते हुए अचल समुद्र में नदियों का जल प्रवेश करता है, उसे विचलित किए बिना, वैसे ही जिस पुरुष में सब भोग-कामनाएँ प्रवेश करती हैं और उसे विचलित नहीं करतीं, वही शान्ति पाता है, भोगों की कामना करने वाला नहीं। → श्लोक 71 सब कामनाएँ त्यागकर निःस्पृह, निर्मम और निरहंकार पुरुष शान्ति पाता है विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः । निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति ॥ २.७१ ॥ जो पुरुष सब कामनाओं को त्यागकर स्पृहा-रहित, ममता-रहित और अहंकार-रहित होकर विचरता है, वह शान्ति को प्राप्त होता है। → श्लोक 72 यह ब्राह्मी स्थिति है: इसे पाकर मनुष्य मोहित नहीं होता और अन्तकाल में ब्रह्मनिर्वाण पाता है एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति । स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥ २.७२ ॥ हे पार्थ! यह ब्रह्म में स्थित होने की अवस्था है। इसे प्राप्त करके मनुष्य फिर मोहित नहीं होता। अन्तकाल में भी इस अवस्था में स्थित होकर वह ब्रह्मनिर्वाण (परम शान्ति) को प्राप्त होता है। →

इस अध्याय के विषय


← सभी अध्यायों पर वापस जाएं