भगवद्गीता 2.44 — भोग-ऐश्वर्य में आसक्त मन में निश्चयात्मक बुद्धि समाधि में नहीं टिकती
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् ।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥ २.४४ ॥
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उस वाणी से जिनका चित्त हर लिया गया है और जो भोग तथा ऐश्वर्य में अत्यन्त आसक्त हैं, उनकी निश्चयात्मक बुद्धि समाधि (परमात्मा में स्थिरता) में स्थित नहीं होती।
पदच्छेद
संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।
शब्दार्थ
| पंक्ति 1 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| भोगैश्वर्यप्रसक्तानाम् | भोग और ऐश्वर्य में आसक्त लोगों की |
| तया | उस (वाणी) से |
| अपहृतचेतसाम् | जिनका चित्त हर लिया गया है |
| पंक्ति 2 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| व्यवसायात्मिका बुद्धिः | निश्चयात्मक बुद्धि |
| समाधौ | समाधि में, परमात्मा में स्थिरता में |
| न विधीयते | नहीं होती |
| पंक्ति 1 | पंक्ति 2 | ||
|---|---|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ | संस्कृत शब्द | अर्थ |
| भोगैश्वर्यप्रसक्तानाम् | भोग और ऐश्वर्य में आसक्त लोगों की | व्यवसायात्मिका बुद्धिः | निश्चयात्मक बुद्धि |
| तया | उस (वाणी) से | समाधौ | समाधि में, परमात्मा में स्थिरता में |
| अपहृतचेतसाम् | जिनका चित्त हर लिया गया है | न विधीयते | नहीं होती |
विस्तृत विवरण
परिचय
इस श्लोक में श्रीकृष्ण भोग और ऐश्वर्य में आसक्त लोगों के बारे में निष्कर्ष देते हैं। जिनका चित्त उन्हीं भोगों से हर लिया गया है, उनमें निश्चयात्मक बुद्धि समाधि में स्थिर नहीं हो पाती।
भावार्थ
आसक्ति का परिणाम
श्लोक 42 और 43 में कामनाओं से भरे, पुष्पित वाणी वाले लोगों का वर्णन था। इस श्लोक में उसके परिणाम को स्पष्ट किया गया है। यह तीन श्लोकों की बात का निष्कर्ष है।
भोगैश्वर्यप्रसक्तानाम् — भोग और ऐश्वर्य में अत्यंत आसक्त: ‘प्रसक्त’ का अर्थ है गहराई से जुड़ा हुआ। जब व्यक्ति सुख-सुविधा और अधिकार में इतना डूब जाता है कि वही उसका जीवन-लक्ष्य बन जाए, तब उसकी दृष्टि संकुचित हो जाती है।
तयापहृतचेतसाम् — उसी से जिनका चित्त हर लिया गया है: ‘अपहृत’ शब्द बहुत सटीक है। जैसे चोर कुछ चुरा ले जाता है, वैसे ही भोग की इच्छा व्यक्ति की चेतना को चुपचाप हर लेती है। वह स्वयं नहीं जान पाता कि उसकी सोचने और चुनने की स्वतंत्रता कब सीमित हो गई।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः — निश्चयात्मक बुद्धि: यह वही स्थिर और एकाग्र बुद्धि है जिसकी चर्चा श्लोक 41 में थी। वह तब तक स्थापित नहीं हो सकती जब तक मन इच्छाओं में भटकता रहे।
समाधौ न विधीयते — समाधि में स्थिर नहीं होती: ‘समाधि’ का अर्थ यहाँ केवल ध्यान की अवस्था ही नहीं, बल्कि चित्त की पूर्ण स्थिरता और परमात्मा में एकाग्रता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि भोग में आसक्त चित्त उस गहराई तक नहीं पहुँच सकता।
तीन श्लोकों का सार
श्लोक 42 से 44 मिलकर यह बताते हैं कि आकर्षक वाणी, कामना से प्रेरित कर्म और भोग की आसक्ति मिलकर व्यक्ति को उसके वास्तविक लक्ष्य से दूर रखते हैं। यही कारण है कि वह निश्चयात्मक बुद्धि और आंतरिक शांति नहीं पा पाता।
हमारे जीवन के लिए संदेश
आसक्ति का सूक्ष्म बंधन: जब हम किसी सुविधा, पद या वस्तु से अत्यधिक जुड़ जाते हैं, तब धीरे-धीरे हमारा ध्यान और ऊर्जा उसी में सीमित रह जाती है। इसका अहसास अक्सर देर से होता है।
आंतरिक शांति की शर्त: गहरी एकाग्रता और शांति के लिए मन का भोग की दौड़ से कुछ हद तक मुक्त होना आवश्यक है।
आसक्ति का परिणाम
श्लोक 42 और 43 में कामनाओं से भरे, पुष्पित वाणी वाले लोगों का वर्णन था। इस श्लोक में उसके परिणाम को स्पष्ट किया गया है। यह तीन श्लोकों की बात का निष्कर्ष है।
भोगैश्वर्यप्रसक्तानाम् — भोग और ऐश्वर्य में अत्यंत आसक्त: ‘प्रसक्त’ का अर्थ है गहराई से जुड़ा हुआ। जब व्यक्ति सुख-सुविधा और अधिकार में इतना डूब जाता है कि वही उसका जीवन-लक्ष्य बन जाए, तब उसकी दृष्टि संकुचित हो जाती है।
तयापहृतचेतसाम् — उसी से जिनका चित्त हर लिया गया है: ‘अपहृत’ शब्द बहुत सटीक है। जैसे चोर कुछ चुरा ले जाता है, वैसे ही भोग की इच्छा व्यक्ति की चेतना को चुपचाप हर लेती है। वह स्वयं नहीं जान पाता कि उसकी सोचने और चुनने की स्वतंत्रता कब सीमित हो गई।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः — निश्चयात्मक बुद्धि: यह वही स्थिर और एकाग्र बुद्धि है जिसकी चर्चा श्लोक 41 में थी। वह तब तक स्थापित नहीं हो सकती जब तक मन इच्छाओं में भटकता रहे।
समाधौ न विधीयते — समाधि में स्थिर नहीं होती: ‘समाधि’ का अर्थ यहाँ केवल ध्यान की अवस्था ही नहीं, बल्कि चित्त की पूर्ण स्थिरता और परमात्मा में एकाग्रता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि भोग में आसक्त चित्त उस गहराई तक नहीं पहुँच सकता।
तीन श्लोकों का सार
श्लोक 42 से 44 मिलकर यह बताते हैं कि आकर्षक वाणी, कामना से प्रेरित कर्म और भोग की आसक्ति मिलकर व्यक्ति को उसके वास्तविक लक्ष्य से दूर रखते हैं। यही कारण है कि वह निश्चयात्मक बुद्धि और आंतरिक शांति नहीं पा पाता।
हमारे जीवन के लिए संदेश
आसक्ति का सूक्ष्म बंधन: जब हम किसी सुविधा, पद या वस्तु से अत्यधिक जुड़ जाते हैं, तब धीरे-धीरे हमारा ध्यान और ऊर्जा उसी में सीमित रह जाती है। इसका अहसास अक्सर देर से होता है।
आंतरिक शांति की शर्त: गहरी एकाग्रता और शांति के लिए मन का भोग की दौड़ से कुछ हद तक मुक्त होना आवश्यक है।
आगे का विषय
भोग में आसक्त चित्त की सीमा बताने के बाद श्रीकृष्ण अर्जुन को स्पष्ट मार्ग देते हैं। अगले श्लोक में वे वेदों के विषय और तीन गुणों से ऊपर उठने का सीधा आह्वान करते हैं।
इस श्लोक में छिपे संदेश
इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।
सूत्र
जिसका चित्त भोग में बँधा है, उसका मन परमार्थ में नहीं टिकता।
लुभावनी वाणी चित्त को दिशा से भटका देती है।
समाधि वही पाता है जिसकी बुद्धि निश्चयपूर्वक एक लक्ष्य पर स्थिर हो।
ऐश्वर्य की चाह मन के भीतर की शान्ति को कम करती है।
भोग की इच्छाएँ एकाग्रता को सबसे पहले तोड़ती हैं।
संयम साधना की पहली शर्त है।
चित्त की रक्षा ही साधक की सबसे बड़ी सावधानी है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
'अपहृतचेतसाम्' का क्या अर्थ है?
'समाधि' से क्या अभिप्राय है?
भोग-ऐश्वर्य में आसक्ति समाधि में बाधक क्यों है?
क्या भोग का पूर्ण त्याग आवश्यक है?
इस श्लोक का एक वाक्य में व्यावहारिक संदेश क्या है?
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