आत्मसंयम का अर्थ है अपनी इच्छाओं, भावनाओं और आदतों का इस तरह स्वामी बनना कि वे हमें न चलाएँ, बल्कि हम उन्हें दिशा दें। यह कठोर दमन नहीं, बल्कि जागरूक चुनाव है: क्या खाना, कब बोलना, कहाँ ध्यान देना और कब रुकना। जब संयम नहीं होता, तो छोटी-छोटी इच्छाएँ बड़े पछतावों में बदल जाती हैं।
गीता 6.5 और 6.6 के अनुसार मन उत्थान का सबसे बड़ा सहयोगी भी है और पतन का कारण भी, इसलिए आत्मनिरीक्षण, अनुशासन और साधना से उसे अपना मित्र बनाएँ। गीता 2.58 की कछुए की उपमा आवश्यकता पड़ने पर इन्द्रियों और ध्यान को समेट लेने की क्षमता सिखाती है, और गीता 2.62 कहती है कि विषय-चिंतन से आसक्ति, कामना और क्रोध बनते हैं, इसलिए आरंभ में ही सजग रहना सरल है।
गीता 2.63 बताती है कि क्रोध विवेक को ढककर पतन तक ले जाता है, और गीता 16.21 काम, क्रोध और लोभ को पतन के तीन द्वार कहती है। गीता 5.23 में काम-क्रोध के आवेग को सहने वाला स्थायी सुख का अधिकारी बनता है, और गीता 2.71 के अनुसार कामना, ममता और अहंकार छूटने पर शांति मिलती है। भावनात्मक प्रतिक्रिया के क्षण में रुकने का अभ्यास करें।