भगवद्गीता 10.29 — नागों में अनन्त, जलचरों में वरुण, पितरों में अर्यमा, नियन्ताओं में यम
अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् ।
पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम् ॥ १०.२९ ॥
🔊 इस श्लोक का अर्थ सुनें
Current voice: —
Ready
Text-to-speech is not supported by this browser.
मैं नागों में अनन्त (शेषनाग) हूँ, जल-जन्तुओं के अधिपतियों में वरुण हूँ, पितरों में अर्यमा हूँ और नियमन करने वालों में यमराज हूँ।
पदच्छेद
संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।
शब्दार्थ
| पंक्ति 1 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| अनन्तः | शेषनाग |
| च | और |
| अस्मि | हूँ |
| नागानाम् | नागों में |
| वरुणः | वरुण |
| यादसाम् | जल-जन्तुओं के अधिपतियों में |
| अहम् | मैं |
| पंक्ति 2 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| पितॄणाम् | पितरों में |
| अर्यमा | अर्यमा |
| च | और |
| अस्मि | हूँ |
| यमः | यमराज |
| संयमताम् | नियमन करने वालों में |
| अहम् | मैं |
| पंक्ति 1 | पंक्ति 2 | ||
|---|---|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ | संस्कृत शब्द | अर्थ |
| अनन्तः | शेषनाग | पितॄणाम् | पितरों में |
| च | और | अर्यमा | अर्यमा |
| अस्मि | हूँ | च | और |
| नागानाम् | नागों में | अस्मि | हूँ |
| वरुणः | वरुण | यमः | यमराज |
| यादसाम् | जल-जन्तुओं के अधिपतियों में | संयमताम् | नियमन करने वालों में |
| अहम् | मैं | अहम् | मैं |
विस्तृत विवरण
परिचय
पिछले श्लोक में भगवान ने सर्पराज वासुकि में अपनी विभूति बताई थी. उसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए इस श्लोक में वे नागों, जल-देवताओं, पितरों और नियंत्रण करने वालों में अपनी उपस्थिति प्रकट करते हैं.
भावार्थ
नियंत्रण, मर्यादा और व्यवस्था में विभूति
इस श्लोक के चारों उदाहरण किसी न किसी रूप में व्यवस्था, धारण और मर्यादा से जुड़े हैं. इनमें शक्ति का वह रूप दिखता है जो सृष्टि को संतुलित रखता है.
अनन्तश्चास्मि नागानाम् — नागों में अनंत: अनंत, जिन्हें शेषनाग भी कहा जाता है, पुराणों में पृथ्वी को धारण करने वाले और भगवान की शैया माने गए हैं. उनका नाम ही असीमता का संकेत देता है. वे धारण करने की अपार सामर्थ्य के प्रतीक हैं.
वरुणो यादसामहम् — जलचरों में वरुण: वरुण जल के अधिपति देवता हैं. जल जीवन का आधार है और वरुण की उपस्थिति में जल की व्यवस्था, गहराई और मर्यादा का भाव है.
पितॄणामर्यमा चास्मि — पितरों में अर्यमा: अर्यमा को पितरों का प्रधान माना जाता है. पितरों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता भारतीय संस्कृति का अंग है. यह विभूति हमें अपनी परंपरा और पूर्वजों से जुड़े रहने की ओर संकेत करती है.
यमः संयमताम् — नियंत्रण करने वालों में यम: यम धर्मराज हैं, जो जीवों के कर्मों के अनुसार न्याय करते हैं. यहाँ भगवान बताते हैं कि न्याय और अनुशासन की जो शक्ति है, वह भी उन्हीं की विभूति है. यमराज का नाम सुनकर भय होता है, परंतु यहाँ उनका स्वरूप धर्म की मर्यादा बनाए रखने वाले का है, जो बताता है कि कर्म का नियम अटल है.
हमारे जीवन के लिए संदेश
धारण करने की क्षमता: अनंत की तरह जीवन में दूसरों का भार संभाल सकने की सामर्थ्य हमें परिपक्व बनाती है.
पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता: हमारा जीवन अनेक पीढ़ियों की साधना का फल है, इसलिए पितरों का स्मरण और सम्मान हमें जड़ों से जोड़ता है.
अनुशासन का महत्व: जीवन में संयम और न्याय की मर्यादा का पालन ही हमें और समाज को सुरक्षित रखता है.
नियंत्रण, मर्यादा और व्यवस्था में विभूति
इस श्लोक के चारों उदाहरण किसी न किसी रूप में व्यवस्था, धारण और मर्यादा से जुड़े हैं. इनमें शक्ति का वह रूप दिखता है जो सृष्टि को संतुलित रखता है.
अनन्तश्चास्मि नागानाम् — नागों में अनंत: अनंत, जिन्हें शेषनाग भी कहा जाता है, पुराणों में पृथ्वी को धारण करने वाले और भगवान की शैया माने गए हैं. उनका नाम ही असीमता का संकेत देता है. वे धारण करने की अपार सामर्थ्य के प्रतीक हैं.
वरुणो यादसामहम् — जलचरों में वरुण: वरुण जल के अधिपति देवता हैं. जल जीवन का आधार है और वरुण की उपस्थिति में जल की व्यवस्था, गहराई और मर्यादा का भाव है.
पितॄणामर्यमा चास्मि — पितरों में अर्यमा: अर्यमा को पितरों का प्रधान माना जाता है. पितरों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता भारतीय संस्कृति का अंग है. यह विभूति हमें अपनी परंपरा और पूर्वजों से जुड़े रहने की ओर संकेत करती है.
यमः संयमताम् — नियंत्रण करने वालों में यम: यम धर्मराज हैं, जो जीवों के कर्मों के अनुसार न्याय करते हैं. यहाँ भगवान बताते हैं कि न्याय और अनुशासन की जो शक्ति है, वह भी उन्हीं की विभूति है. यमराज का नाम सुनकर भय होता है, परंतु यहाँ उनका स्वरूप धर्म की मर्यादा बनाए रखने वाले का है, जो बताता है कि कर्म का नियम अटल है.
हमारे जीवन के लिए संदेश
धारण करने की क्षमता: अनंत की तरह जीवन में दूसरों का भार संभाल सकने की सामर्थ्य हमें परिपक्व बनाती है.
पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता: हमारा जीवन अनेक पीढ़ियों की साधना का फल है, इसलिए पितरों का स्मरण और सम्मान हमें जड़ों से जोड़ता है.
अनुशासन का महत्व: जीवन में संयम और न्याय की मर्यादा का पालन ही हमें और समाज को सुरक्षित रखता है.
आगे का विषय
भगवान ने नियंत्रण और मर्यादा से जुड़ी विभूतियाँ बताईं. अब वे दैत्यों में भक्त प्रह्लाद, समय, वनराज सिंह और पक्षियों में गरुड़ जैसे उदाहरणों से इस सूची को आगे बढ़ाते हैं.
इस श्लोक में छिपे संदेश
इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।
सूत्र
जो सबको धारण करता है, वही सच्चा आधार है।
जल की गहराई गम्भीरता और मर्यादा सिखाती है।
पितरों का सम्मान कृतज्ञता का संस्कार है।
नियमन के बिना जीवन बिखर जाता है; यम न्याय के आदर्श हैं।
जो स्वयं को संयमित करता है, वही दूसरों को दिशा दे सकता है।
हर नियम और व्यवस्था के पीछे ईश्वरीय शक्ति है।
मृत्यु का स्मरण जीवन को अनुशासन देता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
'अनन्त' कौन हैं?
'यादसाम्' का क्या अर्थ है?
'अर्यमा' कौन हैं?
यम को 'संयमताम्' में क्यों कहा गया?
इस श्लोक का एक वाक्य में व्यावहारिक संदेश क्या है?
संबंधित विषय खोजें
इस श्लोक से जुड़े विषयों पर और श्लोक: