अनुशासन की कमी का मतलब है कि हम जो करना चाहते हैं और जो वास्तव में करते हैं, उनके बीच दूरी रहती है। देर से उठना, काम टालना, अनियमित खान-पान और बिखरी दिनचर्या इसके आम लक्षण हैं। इच्छा तो होती है, पर निरंतरता नहीं बन पाती, और धीरे-धीरे अपने ऊपर भरोसा भी घटने लगता है।
गीता 6.17 में संतुलित आहार-विहार, कर्म, निद्रा और जागरण को दुःख दूर करने वाले योग का आधार बताया गया है। गीता 6.16 कहती है कि भोजन या निद्रा में अति साधना में बाधा बनती है, यानी कठोरता नहीं, मध्यम मार्ग चाहिए। गीता 3.33 के अनुसार स्वभाव का प्रभाव प्रबल है, इसलिए उसे बलपूर्वक दबाने के बजाय विवेक और अभ्यास से सुधारना होगा।
गीता 6.28 में निरंतर योगाभ्यास के फल की बात है, और इसका व्यावहारिक अर्थ है कि छोटे दैनिक प्रयास समय के साथ गहरा बदलाव लाते हैं। गीता 18.5 सेवा, दान और संयम जैसे शुद्ध करने वाले कर्मों को छोड़ने नहीं, निरंतर करने की सलाह देती है। एक छोटी, नियमित दिनचर्या बनाएँ, अच्छी संगति चुनें और उसे रोज़ निभाएँ।