भगवद्गीता 7.28 — पाप के क्षय से द्वन्द्वमोह-मुक्त होकर दृढ़व्रत भजन
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥ ७.२८ ॥
🔊 इस श्लोक का अर्थ सुनें
Current voice: —
Ready
Text-to-speech is not supported by this browser.
परन्तु जिन पुण्य कर्म करने वाले मनुष्यों के पाप का अन्त हो गया है, वे द्वन्द्वरूप मोह से मुक्त होकर दृढ़ निश्चय के साथ मुझे भजते हैं।
पदच्छेद
संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।
शब्दार्थ
| पंक्ति 1 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| येषाम् | जिनका |
| तु | परन्तु |
| अन्तगतम् | समाप्त हो गया, क्षीण हो गया |
| पापम् | पाप |
| जनानाम् | मनुष्यों का |
| पुण्यकर्मणाम् | पुण्य कर्म करने वालों का |
| पंक्ति 2 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| ते | वे |
| द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ताः | द्वन्द्वमोह से मुक्त |
| भजन्ते | भजते हैं |
| माम् | मुझे |
| दृढव्रताः | दृढ़ निश्चय वाले |
| पंक्ति 1 | पंक्ति 2 | ||
|---|---|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ | संस्कृत शब्द | अर्थ |
| येषाम् | जिनका | ते | वे |
| तु | परन्तु | द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ताः | द्वन्द्वमोह से मुक्त |
| अन्तगतम् | समाप्त हो गया, क्षीण हो गया | भजन्ते | भजते हैं |
| पापम् | पाप | माम् | मुझे |
| जनानाम् | मनुष्यों का | दृढव्रताः | दृढ़ निश्चय वाले |
| पुण्यकर्मणाम् | पुण्य कर्म करने वालों का | ||
विस्तृत विवरण
परिचय
मोह का कारण बताने के बाद भगवान उसके समाधान की ओर बढ़ते हैं। इस श्लोक में वे बताते हैं कि किन लोगों का मोह कटता है और वे किस निष्ठा से भगवान का भजन करते हैं।
भावार्थ
श्लोक का भाव: पाप के अंत से मोह की मुक्ति
भगवान कहते हैं कि जिन पुण्यकर्मा लोगों के पापों का अंत हो चुका है, वे द्वंद्वरूपी मोह से मुक्त होकर दृढ़ निश्चय के साथ मेरा भजन करते हैं। यह श्लोक मोह से मुक्ति की प्रक्रिया का सूत्र देता है, जिसमें कर्मों की शुद्धि और दृढ़ संकल्प, दोनों आवश्यक हैं।
मुख्य शब्दों का मर्म
येषां त्वन्तगतं पापम् — जिनका पाप समाप्त हो गया: यहाँ 'पाप' का अर्थ केवल बाहरी बुरे कर्म नहीं, बल्कि वे सभी संस्कार और वासनाएँ हैं जो मन को मलिन करती हैं। जब निरंतर शुभ कर्मों, सेवा और साधना से ये संस्कार क्षीण होते हैं, तब मन निर्मल होने लगता है। यह प्रक्रिया धीमी हो सकती है, पर हर शुभ कर्म उसमें योगदान देता है।
पुण्यकर्मणाम् — पुण्य कर्म करने वाले: शुद्धि के लिए केवल बुरे कर्म छोड़ना पर्याप्त नहीं, शुभ कर्मों का निरंतर अभ्यास भी आवश्यक है। दान, सेवा, सत्य, अहिंसा, और यज्ञ भाव से किए गए कर्म चित्त को शुद्ध करते हैं। इसलिए भगवान साधना की पहली सीढ़ी के रूप में आचरण की शुद्धता को रखते हैं।
द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ताः — द्वंद्वों के मोह से मुक्त: जब चित्त शुद्ध होता है, तब इच्छा-द्वेष की पकड़ ढीली पड़ती है। साधक सुख-दुःख के उतार-चढ़ाव में स्थिर रहना सीखता है। यही मुक्ति का प्रथम लक्षण है।
दृढव्रताः — दृढ़ निश्चय वाले: 'व्रत' का अर्थ है संकल्प। मुक्त होने के बाद साधक का भजन कभी-कभार का नहीं, दृढ़ और अटल हो जाता है। उसका निश्चय परिस्थितियों के साथ डगमगाता नहीं। यह दृढ़ता ही उसे परमात्मा के निकट बनाए रखती है।
गहरे भाव और आंतरिक संदेश
शुद्धि की प्रक्रिया: यह श्लोक बताता है कि आध्यात्मिक उन्नति कोई चमत्कार नहीं, बल्कि क्रमिक शुद्धि का परिणाम है। जैसे वस्त्र को बार-बार धोने से मैल हटता है, वैसे ही निरंतर पुण्य कर्मों से मन का मैल कटता है।
आचरण और भक्ति का संबंध: भक्ति केवल भावना नहीं, उसके लिए शुद्ध आचरण की भूमि चाहिए। जब आचरण निर्मल होता है, तब भक्ति सहज और स्थिर बनती है।
शुद्धि और भक्ति का क्रमिक संबंध
यहाँ एक सूक्ष्म क्रम दिखता है: पहले पुण्य कर्म, फिर पाप का क्षय, फिर मोह से मुक्ति, और अंत में दृढ़ भजन। यह क्रम बताता है कि साधना की नींव आचरण में है, और ऊँचाई भक्ति में। जो व्यक्ति सीधे ऊँचाई पर पहुँचना चाहता है पर नींव की उपेक्षा करता है, उसकी साधना डगमगाती रहती है।
निराश साधक के लिए आश्वासन: जो व्यक्ति अपने पुराने दोषों और भूलों के कारण स्वयं को अयोग्य समझता है, उसके लिए यह श्लोक आशा का संदेश है। पाप का अंत संभव है, और उसके बाद भक्ति का द्वार पूरी तरह खुल जाता है। अतीत की भूलें स्थायी बाधा नहीं, सुधार का अवसर हैं।
हमारे जीवन के लिए संदेश
रोज़ का एक शुभ कर्म: प्रतिदिन कम से कम एक छोटा सेवा या दयालुता का कार्य अपनाएँ। यह निरंतर अभ्यास समय के साथ हमारे स्वभाव को निर्मल बनाता है।
संकल्प की दृढ़ता: जो भी अच्छा नियम अपनाएँ, चाहे वह जप हो, ध्यान हो या सत्य बोलने का संकल्प, उसे परिस्थितियों के कारण न छोड़ें। दृढ़ता ही साधना को फलदायी बनाती है।
श्लोक का भाव: पाप के अंत से मोह की मुक्ति
भगवान कहते हैं कि जिन पुण्यकर्मा लोगों के पापों का अंत हो चुका है, वे द्वंद्वरूपी मोह से मुक्त होकर दृढ़ निश्चय के साथ मेरा भजन करते हैं। यह श्लोक मोह से मुक्ति की प्रक्रिया का सूत्र देता है, जिसमें कर्मों की शुद्धि और दृढ़ संकल्प, दोनों आवश्यक हैं।
मुख्य शब्दों का मर्म
येषां त्वन्तगतं पापम् — जिनका पाप समाप्त हो गया: यहाँ 'पाप' का अर्थ केवल बाहरी बुरे कर्म नहीं, बल्कि वे सभी संस्कार और वासनाएँ हैं जो मन को मलिन करती हैं। जब निरंतर शुभ कर्मों, सेवा और साधना से ये संस्कार क्षीण होते हैं, तब मन निर्मल होने लगता है। यह प्रक्रिया धीमी हो सकती है, पर हर शुभ कर्म उसमें योगदान देता है।
पुण्यकर्मणाम् — पुण्य कर्म करने वाले: शुद्धि के लिए केवल बुरे कर्म छोड़ना पर्याप्त नहीं, शुभ कर्मों का निरंतर अभ्यास भी आवश्यक है। दान, सेवा, सत्य, अहिंसा, और यज्ञ भाव से किए गए कर्म चित्त को शुद्ध करते हैं। इसलिए भगवान साधना की पहली सीढ़ी के रूप में आचरण की शुद्धता को रखते हैं।
द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ताः — द्वंद्वों के मोह से मुक्त: जब चित्त शुद्ध होता है, तब इच्छा-द्वेष की पकड़ ढीली पड़ती है। साधक सुख-दुःख के उतार-चढ़ाव में स्थिर रहना सीखता है। यही मुक्ति का प्रथम लक्षण है।
दृढव्रताः — दृढ़ निश्चय वाले: 'व्रत' का अर्थ है संकल्प। मुक्त होने के बाद साधक का भजन कभी-कभार का नहीं, दृढ़ और अटल हो जाता है। उसका निश्चय परिस्थितियों के साथ डगमगाता नहीं। यह दृढ़ता ही उसे परमात्मा के निकट बनाए रखती है।
गहरे भाव और आंतरिक संदेश
शुद्धि की प्रक्रिया: यह श्लोक बताता है कि आध्यात्मिक उन्नति कोई चमत्कार नहीं, बल्कि क्रमिक शुद्धि का परिणाम है। जैसे वस्त्र को बार-बार धोने से मैल हटता है, वैसे ही निरंतर पुण्य कर्मों से मन का मैल कटता है।
आचरण और भक्ति का संबंध: भक्ति केवल भावना नहीं, उसके लिए शुद्ध आचरण की भूमि चाहिए। जब आचरण निर्मल होता है, तब भक्ति सहज और स्थिर बनती है।
शुद्धि और भक्ति का क्रमिक संबंध
यहाँ एक सूक्ष्म क्रम दिखता है: पहले पुण्य कर्म, फिर पाप का क्षय, फिर मोह से मुक्ति, और अंत में दृढ़ भजन। यह क्रम बताता है कि साधना की नींव आचरण में है, और ऊँचाई भक्ति में। जो व्यक्ति सीधे ऊँचाई पर पहुँचना चाहता है पर नींव की उपेक्षा करता है, उसकी साधना डगमगाती रहती है।
निराश साधक के लिए आश्वासन: जो व्यक्ति अपने पुराने दोषों और भूलों के कारण स्वयं को अयोग्य समझता है, उसके लिए यह श्लोक आशा का संदेश है। पाप का अंत संभव है, और उसके बाद भक्ति का द्वार पूरी तरह खुल जाता है। अतीत की भूलें स्थायी बाधा नहीं, सुधार का अवसर हैं।
हमारे जीवन के लिए संदेश
रोज़ का एक शुभ कर्म: प्रतिदिन कम से कम एक छोटा सेवा या दयालुता का कार्य अपनाएँ। यह निरंतर अभ्यास समय के साथ हमारे स्वभाव को निर्मल बनाता है।
संकल्प की दृढ़ता: जो भी अच्छा नियम अपनाएँ, चाहे वह जप हो, ध्यान हो या सत्य बोलने का संकल्प, उसे परिस्थितियों के कारण न छोड़ें। दृढ़ता ही साधना को फलदायी बनाती है।
आगे का विषय
भगवान ने बताया कि पुण्य और दृढ़ संकल्प वाले साधक मोह से मुक्त होकर उनका भजन करते हैं। अब वे यह स्पष्ट करते हैं कि ऐसे साधक भजन के फलस्वरूप किस गहरे ज्ञान को प्राप्त करते हैं।
इस श्लोक में छिपे संदेश
इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।
सूत्र
निरन्तर शुभ कर्म धीरे-धीरे चित्त को निर्मल करते हैं।
जब पुराना दोष कर्म और पश्चात्ताप से क्षीण होता है, तब भक्ति का मार्ग सरल होता है।
शुद्ध मन ही द्वन्द्वों के भ्रम से बाहर निकल पाता है।
संकल्प में डगमगाहट न होना ही भजन को स्थिर बनाता है।
पहले आचरण की शुद्धि, फिर भाव की गहराई, फिर बोध की स्पष्टता।
छोटे-छोटे नियम भी निरन्तरता से बड़ा फल देते हैं।
कोई भी व्यक्ति सच्चे संकल्प और शुभ कर्म से मोह के पार जा सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
'अन्तगतं पापम्' का क्या अर्थ है?
'दृढव्रताः' किसे कहते हैं?
क्या पाप के बाद भक्ति सम्भव है?
पुण्य कर्म और भजन में क्या सम्बन्ध है?
इस श्लोक का व्यावहारिक सन्देश एक वाक्य में क्या है?
संबंधित विषय खोजें
इस श्लोक से जुड़े विषयों पर और श्लोक: