शुद्धि का अर्थ केवल स्नान या बाहरी सफ़ाई नहीं, बल्कि मन, वाणी और व्यवहार की निर्मलता है। जब मन ईर्ष्या, लालच और क्रोध से भरा हो, तो बाहर से साफ़ दिखने वाला व्यक्ति भी भीतर से बेचैन रहता है। इसलिए गीता में शुद्धि जीवन के हर पहलू से जुड़ी साधना है, जो धीरे-धीरे चरित्र और शांति में बदलती है।
गीता 4.38 ज्ञान को सबसे बड़ा शुद्धिकारक कहती है, और गीता 4.31 के अनुसार यज्ञभाव से जीने वाला अंतःकरण की शुद्धि पाता है। गीता 18.5 सेवा, दान और संयम जैसे शुभ कर्मों को छोड़ने नहीं, निरंतर करने को कहती है, क्योंकि ये साधकों के अंतःकरण को शुद्ध करते हैं, और गीता 3.13 बाँटकर ग्रहण करने वाले को शुद्ध बताती है।
गीता 17.14 बड़ों का आदर, शुद्धता, सरलता, संयम और अहिंसा को शरीर का तप कहती है, और गीता 7.28 में पुण्यकर्मों से अंतःकरण शुद्ध होने पर मनुष्य द्वन्द्वमोह से मुक्त होकर दृढ़ निश्चय से भजन करता है। गीता 2.65 मन की निर्मल प्रसन्नता को दुःखों को क्षीण करने वाली और बुद्धि को स्थिर बनाने वाली बताती है, और गीता 9.31 में भक्त साधना में गिरने पर भी भक्ति में टिके रहने से भीतर परिवर्तन और शांति पाता है।