अध्याय 16 दैवासुर सम्पद्विभाग योग

24 श्लोक

प्रत्येक मनुष्य के भीतर ऐसे गुण भी होते हैं जो उसे ऊँचा उठाते हैं और ऐसी प्रवृत्तियाँ भी जो उसे पतन की ओर ले जाती हैं। इस अध्याय में श्रीकृष्ण निर्भयता, करुणा, सत्यनिष्ठा और आत्मसंयम जैसे दैवी गुणों की तुलना अहंकार, क्रोध, लोभ और स्वार्थ जैसी आसुरी प्रवृत्तियों से करते हैं। इस अध्याय से हमें आत्मनिरीक्षण और चरित्र निर्माण का स्पष्ट मार्गदर्शन प्राप्त होता है। यह अध्याय सिखाता है कि सद्गुणों का विकास ही स्थायी सुख, सामंजस्य और आध्यात्मिक प्रगति का आधार है।

श्लोक सूची

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श्लोक 1 दैवी सम्पदा के प्रथम गुण: अभय, शुद्धि और ज्ञान में स्थिति श्रीभगवानुवाच । अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः । दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ॥ १६.१ ॥ भगवान् ने कहा—निर्भयता, अन्तःकरण की शुद्धि, ज्ञान और योग में दृढ़ स्थिति, दान, इन्द्रिय-संयम, यज्ञ, शास्त्रों का स्वाध्याय, तप और सरलता—ये दैवी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए मनुष्य के लक्षण हैं। इन गुणों की सूची आगे के श्लोकों में भी जारी रहती है। → श्लोक 2 अहिंसा, सत्य और करुणा: दैवी गुणों का विस्तार अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् । दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् ॥ १६.२ ॥ अहिंसा, सत्य, क्रोध का न होना, त्याग, मन की शान्ति, दूसरों की निन्दा न करना, सब प्राणियों पर दया, विषयों में लोलुपता का अभाव, कोमलता, बुरे कार्य में लज्जा और चंचलता का अभाव—ये दैवी सम्पदा के और गुण हैं। → श्लोक 3 तेज, क्षमा और धृति: दैवी सम्पदा की पूर्णता तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता । भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥ १६.३ ॥ हे अर्जुन! तेज, क्षमा, धैर्य, पवित्रता, किसी से वैर न रखना और अपने में अत्यधिक मान का भाव न होना—ये गुण दैवी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष में होते हैं। → श्लोक 4 आसुरी सम्पदा के लक्षण: दम्भ, दर्प और अज्ञान दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च । अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम् ॥ १६.४ ॥ हे अर्जुन! पाखण्ड, घमण्ड, अभिमान, क्रोध, कठोरता और अज्ञान—ये आसुरी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं। → श्लोक 5 दैवी सम्पदा मोक्ष देती है, आसुरी बन्धन दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता । मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव ॥ १६.५ ॥ दैवी सम्पदा मुक्ति के लिए और आसुरी सम्पदा बन्धन के लिए मानी गई है। हे अर्जुन! तू शोक मत कर, क्योंकि तू दैवी सम्पदा को प्राप्त होकर उत्पन्न हुआ है। → श्लोक 6 दो प्रकार के मनुष्य: दैवी और आसुरी द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च । दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु ॥ १६.६ ॥ हे अर्जुन! इस लोक में प्राणियों के स्वभाव के दो ही प्रकार हैं—दैवी और आसुरी। दैवी स्वभाव का वर्णन मैंने विस्तार से कर दिया है, अब तू आसुरी स्वभाव के विषय में मुझसे सुन। → श्लोक 7 आसुरी प्रवृत्ति: विवेक, शौच और सत्य का अभाव प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः । न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते ॥ १६.७ ॥ आसुरी स्वभाव वाले मनुष्य यह नहीं जानते कि क्या करना उचित है और किससे दूर रहना चाहिए। उनमें न पवित्रता होती है, न सदाचार और न सत्य। → श्लोक 8 आसुरी दृष्टि: जगत को ईश्वररहित और कामजन्य मानना असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् । अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम् ॥ १६.८ ॥ आसुरी स्वभाव वाले लोग कहते हैं कि यह जगत मिथ्या है, इसका कोई धर्म या आधार नहीं है और इसका कोई ईश्वर भी नहीं है। यह केवल स्त्री-पुरुष के परस्पर संयोग से उत्पन्न हुआ है; इसमें काम के सिवा और क्या कारण हो सकता है? → श्लोक 9 नष्टात्मा और अल्पबुद्धि लोगों का जगत पर प्रभाव एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः । प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः ॥ १६.९ ॥ इस मिथ्या दृष्टि का आश्रय लेकर, जिनका आत्मिक विवेक नष्ट हो गया है और जिनकी बुद्धि मन्द है, ऐसे क्रूर कर्म करने वाले, जगत के शत्रु लोग संसार के विनाश के लिए सामर्थ्यवान होकर प्रकट होते हैं। → श्लोक 10 अतृप्त काम, दम्भ और अशुद्ध आचरण काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः । मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः ॥ १६.१० ॥ कभी तृप्त न होने वाली कामना का आश्रय लेकर, दम्भ, मान और मद से युक्त लोग मोह के कारण अशुभ और मिथ्या आग्रहों को पकड़ लेते हैं और अपवित्र नियमों तथा आचरण के साथ कर्मों में प्रवृत्त होते हैं। → श्लोक 11 अपार चिन्ता और भोग को ही जीवन का परम लक्ष्य मानना चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः । कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः ॥ १६.११ ॥ आसुरी स्वभाव वाले लोग मृत्यु तक चलने वाली असीम चिन्ताओं का आश्रय लिए रहते हैं। वे काम और भोग को ही जीवन का परम लक्ष्य मानते हैं और निश्चय कर लेते हैं कि जीवन में बस इतना ही सुख है। → श्लोक 12 आशा के सैकड़ों पाश और अन्याय से धन-संग्रह आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः । ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान् ॥ १६.१२ ॥ सैकड़ों आशाओं के फन्दों में बँधे हुए, काम और क्रोध के परायण वे लोग विषय-भोग के लिए अन्यायपूर्वक धन-संग्रह करने की चेष्टा करते हैं। → श्लोक 13 'आज यह पाया, कल वह पाऊँगा': लोभ की मानसिकता इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् । इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम् ॥ १६.१३ ॥ आसुरी स्वभाव वाले सोचते हैं—'आज मैंने यह पा लिया है और अब इस मनोरथ को भी पूरा करूँगा। मेरे पास इतना धन है और आगे फिर और धन हो जाएगा।' → श्लोक 14 'मैं ईश्वर हूँ, मैं भोगी हूँ': अहंकार की पराकाष्ठा असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि । ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी ॥ १६.१४ ॥ आसुरी स्वभाव वाले सोचते हैं—'उस शत्रु को मैंने मार दिया और दूसरों को भी मार डालूँगा। मैं स्वामी हूँ, मैं भोगी हूँ, मैं सिद्ध, बलवान और सुखी हूँ।' → श्लोक 15 धन, कुल और यज्ञ का अभिमान: अज्ञान से मोहित मन आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया । यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥ १६.१५ ॥ 'मैं धनवान हूँ, बड़े कुल वाला हूँ, मेरे समान दूसरा कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा और आनन्द मनाऊँगा'—इस प्रकार अज्ञान से मोहित लोग सोचते रहते हैं। → श्लोक 16 विभ्रान्त चित्त और मोह-जाल: अपवित्र नरक का मार्ग अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः । प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ ॥ १६.१६ ॥ अनेक प्रकार की चिन्ताओं से भ्रमित हुए, मोह के जाल में लिपटे हुए और विषय-भोगों में अत्यन्त आसक्त लोग अपवित्र नरक में गिरते हैं। → श्लोक 17 आत्मप्रशंसा और दिखावे के यज्ञ: विधिहीन पूजन आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः । यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम् ॥ १६.१७ ॥ अपने को श्रेष्ठ मानने वाले, अकड़ वाले और धन तथा मान के मद से युक्त वे लोग पाखण्डपूर्वक, शास्त्रविधि का पालन किए बिना, केवल नाम के यज्ञ करते हैं। → श्लोक 18 अहंकार, बल और काम-क्रोध का आश्रय: ईश्वर-द्वेष अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः । मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ॥ १६.१८ ॥ अहंकार, बल, घमण्ड, काम और क्रोध का आश्रय लेने वाले, दूसरों में दोष देखने वाले वे लोग अपने तथा दूसरों के शरीरों में स्थित मुझ परमात्मा से द्वेष करते हैं। → श्लोक 19 क्रूर और द्वेषी लोगों का आसुरी योनियों में पतन तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान् । क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ॥ १६.१९ ॥ उन द्वेष करने वाले, क्रूर और अशुभ कर्म करने वाले नीच मनुष्यों को मैं संसार-चक्र में निरन्तर आसुरी योनियों में ही डालता रहता हूँ। → श्लोक 20 जन्म-जन्म में आसुरी योनि और परमात्मा से दूरी आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि । मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम् ॥ १६.२० ॥ हे अर्जुन! वे मूढ़ लोग प्रत्येक जन्म में आसुरी योनि को प्राप्त होते हैं और मुझे न पाकर उससे भी अधिक नीच गति को प्राप्त हो जाते हैं। → श्लोक 21 नरक के तीन द्वार: काम, क्रोध और लोभ त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः । कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥ १६.२१ ॥ काम, क्रोध और लोभ—ये तीन प्रकार के द्वार नरक की ओर ले जाने वाले और आत्मा का पतन करने वाले हैं। इसलिए इन तीनों का त्याग कर देना चाहिए। → श्लोक 22 तीनों तमोद्वारों से मुक्त होकर परम गति की ओर एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः । आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम् ॥ १६.२२ ॥ हे अर्जुन! जो मनुष्य इन तीनों अन्धकार-द्वारों (काम, क्रोध, लोभ) से मुक्त हो जाता है, वह अपने कल्याण का आचरण करता है और फिर परम गति को प्राप्त होता है। → श्लोक 23 शास्त्रविधि छोड़कर मनमानी करने वाले को सिद्धि क्यों नहीं मिलती यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः । न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥ १६.२३ ॥ जो मनुष्य शास्त्र की विधि को छोड़कर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि को प्राप्त करता है, न सुख को और न परम गति को। → श्लोक 24 कर्तव्य-अकर्तव्य के निर्णय में शास्त्र ही प्रमाण है तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ । ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥ १६.२४ ॥ इसलिए तेरे लिए कर्तव्य और अकर्तव्य का निर्णय करने में शास्त्र ही प्रमाण है। शास्त्र की विधि से कहे गए कर्म को जानकर तुझे इस लोक में कर्म करना चाहिए। →

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