भगवद्गीता 16.13 — 'आज यह पाया, कल वह पाऊँगा': लोभ की मानसिकता
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् ।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम् ॥ १६.१३ ॥
🔊 इस श्लोक का अर्थ सुनें
Current voice: —
Ready
Text-to-speech is not supported by this browser.
आसुरी स्वभाव वाले सोचते हैं—'आज मैंने यह पा लिया है और अब इस मनोरथ को भी पूरा करूँगा। मेरे पास इतना धन है और आगे फिर और धन हो जाएगा।'
पदच्छेद
संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।
शब्दार्थ
| पंक्ति 1 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| इदम् | यह |
| अद्य | आज |
| मया | मेरे द्वारा |
| लब्धम् | प्राप्त किया गया |
| इमम् | इस |
| प्राप्स्ये | प्राप्त करूँगा |
| मनोरथम् | मनचाही इच्छा |
| पंक्ति 2 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| इदम् अस्ति | यह (धन) मेरे पास है |
| इदम् अपि | यह भी |
| मे भविष्यति | मेरा हो जाएगा |
| पुनः धनम् | फिर और धन |
| पंक्ति 1 | पंक्ति 2 | ||
|---|---|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ | संस्कृत शब्द | अर्थ |
| इदम् | यह | इदम् अस्ति | यह (धन) मेरे पास है |
| अद्य | आज | इदम् अपि | यह भी |
| मया | मेरे द्वारा | मे भविष्यति | मेरा हो जाएगा |
| लब्धम् | प्राप्त किया गया | पुनः धनम् | फिर और धन |
| इमम् | इस | ||
| प्राप्स्ये | प्राप्त करूँगा | ||
| मनोरथम् | मनचाही इच्छा | ||
विस्तृत विवरण
परिचय
यह श्लोक आसुरी मन की भीतरी आवाज़ को खोलता है। भगवान श्रीकृष्ण ऐसे व्यक्ति के विचारों को उसी की भाषा में प्रस्तुत करते हैं, जिनमें पाने, और पाने तथा संग्रह की अंतहीन लालसा झलकती है।
भावार्थ
मन का आत्मालाप
अगले कुछ श्लोकों में भगवान आसुरी प्रवृत्ति वाले व्यक्ति के सोचने के ढंग को उसी की भाषा में सामने रखते हैं। इससे हम उस मनोदशा को भीतर से पहचान पाते हैं।
इदमद्य मया लब्धम्: आज मैंने यह पा लिया। यहाँ उपलब्धि का भाव गर्व में बदल जाता है और 'मैंने' का अहंकार प्रबल दिखता है।
इमं प्राप्स्ये मनोरथम्: अब मैं इस और इच्छा को भी पाऊँगा। एक इच्छा पूरी होते ही अगली तैयार है। संतोष का कोई ठहराव नहीं।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्: मेरे पास यह है और आगे यह भी होगा, और धन और बढ़ेगा। यहाँ संग्रह ही सुरक्षा का एकमात्र आधार दिखाई देता है।
इस सोच की विशेषता
ध्यान देने की बात है कि इस पूरे विचार में 'मेरा' और 'मैं' बार-बार आते हैं, जबकि ईश्वर, कर्तव्य या दूसरों का कहीं उल्लेख नहीं है। जो कुछ मिला है उसे अपनी ही उपलब्धि मानना और भविष्य को भी अपनी योजना की जागीर समझना अहंकार की पहचान है।
हमारे जीवन के लिए संदेश
हम भी कई बार इसी तरह सोचते हैं कि जब यह मिल जाएगा तब शांति होगी। लेकिन हर नई उपलब्धि के साथ अगला लक्ष्य जुड़ जाता है।
अभ्यास: जो कुछ आज आपके पास है, उसके लिए कृतज्ञता का भाव रखना सीखें। कृतज्ञता 'और चाहिए' की दौड़ को धीमा करती है।
मन का आत्मालाप
अगले कुछ श्लोकों में भगवान आसुरी प्रवृत्ति वाले व्यक्ति के सोचने के ढंग को उसी की भाषा में सामने रखते हैं। इससे हम उस मनोदशा को भीतर से पहचान पाते हैं।
इदमद्य मया लब्धम्: आज मैंने यह पा लिया। यहाँ उपलब्धि का भाव गर्व में बदल जाता है और 'मैंने' का अहंकार प्रबल दिखता है।
इमं प्राप्स्ये मनोरथम्: अब मैं इस और इच्छा को भी पाऊँगा। एक इच्छा पूरी होते ही अगली तैयार है। संतोष का कोई ठहराव नहीं।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्: मेरे पास यह है और आगे यह भी होगा, और धन और बढ़ेगा। यहाँ संग्रह ही सुरक्षा का एकमात्र आधार दिखाई देता है।
इस सोच की विशेषता
ध्यान देने की बात है कि इस पूरे विचार में 'मेरा' और 'मैं' बार-बार आते हैं, जबकि ईश्वर, कर्तव्य या दूसरों का कहीं उल्लेख नहीं है। जो कुछ मिला है उसे अपनी ही उपलब्धि मानना और भविष्य को भी अपनी योजना की जागीर समझना अहंकार की पहचान है।
हमारे जीवन के लिए संदेश
हम भी कई बार इसी तरह सोचते हैं कि जब यह मिल जाएगा तब शांति होगी। लेकिन हर नई उपलब्धि के साथ अगला लक्ष्य जुड़ जाता है।
अभ्यास: जो कुछ आज आपके पास है, उसके लिए कृतज्ञता का भाव रखना सीखें। कृतज्ञता 'और चाहिए' की दौड़ को धीमा करती है।
आगे का विषय
यह लालसा जब बाधित होती है, तो उसका रूप बदल जाता है। अगले श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि अहंकार से भरे इन लोगों की सोच में शत्रुता और अपने ऐश्वर्य का दर्प किस प्रकार झलकता है।
इस श्लोक में छिपे संदेश
इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।
सूत्र
जितना मिलता है, लोभ उतना ही माँगता है।
मनोरथ पूरे होते ही नए मनोरथ जन्म ले लेते हैं।
'मैंने पाया' का भाव उपलब्धि को भी बोझ बना देता है।
आवश्यकता से अधिक संग्रह मन को भारी करता है।
जो मिला उसके प्रति कृतज्ञता ही सच्ची समृद्धि है।
धन का सुख क्षणिक है, मन की शान्ति स्थायी।
सन्तोषी के लिए 'आज' ही पूर्ण होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस श्लोक में किस मानसिकता का वर्णन है?
'मनोरथ' का क्या अर्थ है?
क्या भविष्य की योजना बनाना गलत है?
इस वृत्ति का परिणाम क्या होता है?
इस श्लोक का एक वाक्य में व्यावहारिक संदेश क्या है?
संबंधित विषय खोजें
इस श्लोक से जुड़े विषयों पर और श्लोक: