संतोष पर भगवद्गीता

20 श्लोक, अर्थ और जीवन में उपयोग सहित

संतोष पर भगवद्गीता के श्लोक 20 श्लोक, अर्थ और उपयोग सहित।

संतोष का अर्थ है जो मिला है उसमें पर्याप्तता का भाव, साथ ही आगे बढ़ने का उत्साह बनाए रखना। यह सुस्ती या हार मान लेना नहीं, बल्कि वह भीतरी तृप्ति है जो हमें हर उपलब्धि पर नई बेचैनी से बचाती है। जब संतोष नहीं होता, तब तुलना, ईर्ष्या और अधिक पाने की होड़ मन को थका देती है, इसलिए संतोष शांति की नींव है।

गीता 4.22 में सहज प्राप्त वस्तुओं में संतुष्ट, ईर्ष्या से रहित और सफलता-असफलता में सम रहने वाला कर्मयोगी कर्मों से नहीं बँधता, और गीता 12.14 में सदा संतुष्ट, संयमी और दृढ़ निश्चयी भक्त भगवान् को प्रिय है। गीता 12.19 निन्दा-स्तुति में सम और जो मिले उसमें संतुष्ट रहने वाले भक्त को स्थिर बुद्धि का बताती है, और गीता 2.55 में कामनाएँ छोड़कर आत्मा में संतुष्ट रहना स्थिरबुद्धि का लक्षण है।

गीता 13.10 परिवार और घर में अत्यधिक आसक्ति के अभाव और इष्ट-अनिष्ट में समचित्तता को ज्ञान का लक्षण बताती है, पर इसका अर्थ कर्तव्य छोड़ना नहीं है। गीता 1.32, 1.33 और 2.5 में अर्जुन राज्य और सुख की कामना को नकारते हैं और उपलब्धि को अपनों के साथ के संदर्भ में तौलते हैं, पर उनका त्याग मोह और विषाद से उपजा है, इसलिए जो भी पाना चाहते हैं, उसके पीछे का उद्देश्य और संबंधों का मूल्य जाँचें तथा भावना में लिए पलायन-निर्णय को विवेक से परखें।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

संतोष और उदासीनता में क्या अंतर है?
उदासीनता में कर्म के प्रति लापरवाही होती है, जबकि संतोष में कर्म के साथ भीतरी तृप्ति रहती है। गीता 4.22 में सहज प्राप्त में संतुष्ट कर्मयोगी कर्म करता भी है और ईर्ष्या तथा सफलता-असफलता के उतार-चढ़ाव से मुक्त रहता है। संतोष प्रयास को नहीं रोकता, केवल बेचैनी और तुलना को घटाता है।
तुलना हावी हो तो संतोष कैसे बढ़ाएँ?
गीता 4.22 के अनुसार दूसरों से तुलना करने के बजाय अपने प्रयासों पर ध्यान देकर संतोष और मानसिक संतुलन विकसित करना चाहिए। जो सहज प्राप्त है उसमें पर्याप्तता का भाव रखें, ईर्ष्या से बचें और सफलता-असफलता में समान रहने का अभ्यास करें। समत्व और संतोष कर्मयोगी की पहचान हैं।
क्या संतोष का अर्थ सब कुछ जैसा है वैसा स्वीकार लेना है?
नहीं। गीता 12.14 में संतुष्ट भक्त संयम और दृढ़ निश्चय से भी युक्त है, यानी उसका संतोष लक्ष्य के प्रति अटल निश्चय के साथ चलता है। इसलिए जो मिला है उसमें संतोष रखें, अपने मन-इन्द्रियों पर नियंत्रण बढ़ाएँ और जीवन के लक्ष्य के प्रति निश्चय को डगमगाने न दें।
गीता 1.33 में उपलब्धि के मूल्य और अपनों के साथ का क्या संबंध है?
गीता 1.33 में अर्जुन को लगता है कि जिन अपनों के सुख के लिए राज्य चाहिए, वही सामने मारे जाने को खड़े हैं, तो राज्य का मूल्य शून्य है। इसमें संबंधों को साधन-साध्य के संतुलन से तौलने की प्रवृत्ति दिखती है। जो भी हम पाना चाहते हैं, उसके पीछे के उद्देश्य और संबंधों के मूल्य पर विचार करना चाहिए।
गीता 2.5 के अनुसार भावना और कर्तव्य का संतुलन कैसे रखें?
गीता 2.5 में अर्जुन का तर्क करुणा और नैतिक संवेदना से उपजा है, पर उसमें कर्तव्य से पलायन और मोह का मिश्रण भी है। सफलता की कीमत पर संबंधों की हानि सोचते समय अपने निर्णय में करुणा और कर्तव्य दोनों को परखें। भावना में लिया गया पलायन-निर्णय सदैव विवेक नहीं होता।

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