भगवद्गीता 13.10 — ज्ञान के लक्षण (3): अनासक्ति और इष्ट-अनिष्ट में सम चित्त

असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु ।
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥ १३.१० ॥

पुत्र, स्त्री, घर आदि में आसक्ति और अत्यधिक ममता का अभाव, तथा प्रिय और अप्रिय परिस्थितियों के आने पर सदा चित्त की समता—यह भी ज्ञान का लक्षण है।

पदच्छेद

संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।

असक्तिः अनभिष्वङ्गः
पुत्र-दार-गृह-आदिषु ।
नित्यम् च सम-चित्तत्वम्
इष्ट-अनिष्ट-उपपत्तिषु ॥

शब्दार्थ

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संस्कृत शब्द अर्थ
असक्तिः आसक्ति का अभाव
अनभिष्वङ्गः अत्यधिक तादात्म्य या ममता का अभाव
पुत्रदारगृहादिषु पुत्र, पत्नी, घर आदि में
पंक्ति 2
संस्कृत शब्द अर्थ
नित्यम् सदा
च और
समचित्तत्वम् चित्त की समता
इष्टानिष्टोपपत्तिषु प्रिय और अप्रिय की प्राप्ति में
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संस्कृत शब्द अर्थ संस्कृत शब्द अर्थ
असक्तिः आसक्ति का अभाव नित्यम् सदा
अनभिष्वङ्गः अत्यधिक तादात्म्य या ममता का अभाव च और
पुत्रदारगृहादिषु पुत्र, पत्नी, घर आदि में समचित्तत्वम् चित्त की समता
इष्टानिष्टोपपत्तिषु प्रिय और अप्रिय की प्राप्ति में

विस्तृत विवरण

परिचय

इस श्लोक में भगवान गृहस्थ जीवन के बीच रहने वाले साधक के लिए तीन गुण बताते हैं — पुत्र, पत्नी और घर आदि में अनासक्ति, उनके सुख-दुःख में तादात्म्य का अभाव, और प्रिय-अप्रिय परिस्थितियों में सदा सम चित्त।

भावार्थ

संबंधों के बीच रहकर भी भीतर से मुक्त

यह श्लोक उन लोगों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जो परिवार और समाज के बीच रहते हुए आध्यात्मिक जीवन जीना चाहते हैं। भगवान यह नहीं कहते कि संबंधों को छोड़ दो। वे कहते हैं कि संबंधों में रहो, पर उनमें बँधो मत।

असक्तिः (आसक्ति का अभाव): किसी व्यक्ति या वस्तु से इतना चिपक जाना कि उसके बिना जीवन अधूरा लगे — यह आसक्ति है। असक्ति का अर्थ प्रेम का अभाव नहीं, बल्कि प्रेम में स्वामित्व का अभाव है। हम सबसे प्रेम करें, पर यह न मानें कि कोई हमारी संपत्ति है।

अनभिष्वङ्गः (तादात्म्य या गहरे लगाव का अभाव): 'अभिष्वंग' का अर्थ है किसी के सुख-दुःख को अपना ही सुख-दुःख मान लेना। इसका भाव यह नहीं कि हम संवेदनहीन हो जाएँ। हम सहायता करें, सेवा करें, पर इस प्रकार टूटकर न बिखरें कि अपना संतुलन खो बैठें।

पुत्रदारगृहादिषु (पुत्र, पत्नी, घर आदि में): भगवान उदाहरण के रूप में सबसे निकट के संबंध और वस्तुएँ चुनते हैं, क्योंकि आसक्ति सबसे अधिक वहीं होती है। 'आदि' शब्द में धन, पद, प्रतिष्ठा सबका समावेश है।

नित्यं च समचित्तत्वम् (सदा सम चित्त): जीवन में अनुकूल या प्रतिकूल जो भी घटे, उसमें मन का संतुलन बना रहे। न लाभ में अति-हर्ष और न हानि में अति-शोक।

इष्टानिष्टोपपत्तिषु (प्रिय-अप्रिय की प्राप्ति में): यहाँ 'नित्य' शब्द ध्यान देने योग्य है। समता कभी-कभी की घटना नहीं, बल्कि निरंतर अभ्यास है, जो हर परिस्थिति में परखी जाती है।

हमारे दैनिक जीवन के लिए संदेश (Love without Bondage)

अपेक्षाओं पर ध्यान: अधिकांश पारिवारिक कष्ट अपेक्षाओं से उपजते हैं। जब हम प्रियजनों को स्वतंत्र आत्मा के रूप में देखते हैं, तब हमारा प्रेम सहज और बोझमुक्त हो जाता है।

सेवा और संतुलन: माता-पिता, जीवनसाथी या संतान की देखभाल पूरे मन से करें, पर परिणामों को अपने नियंत्रण से बाहर मानें। यही कर्मयोग की भावना है।

समता का अभ्यास: दिन में एक बार स्वयं से पूछिए कि आज जो कुछ अप्रिय हुआ, उसमें मेरा मन कितना शांत रहा। धीरे-धीरे यह अभ्यास हमारे स्वभाव का भाग बन जाता है।

आगे का विषय

अनासक्ति और समता से साधक का मन संसार में रहकर भी शांत रहता है। परंतु केवल अनासक्ति पर्याप्त नहीं, उसे किसी ऊँचे लक्ष्य से भी जुड़ना है। अगले श्लोक में भगवान उस अनन्य भक्ति और एकांत-सेवन की बात करते हैं जो मन को परमात्मा में स्थिर करती है।

इस श्लोक में छिपे संदेश

इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।

पारिवारिक
कर्तव्य सहित अनासक्ति स्नेह और विवेक
मनोवैज्ञानिक
समचित्तता भावनात्मक स्थिरता
कर्मयोग
सम भाव से कर्तव्य
आध्यात्मिक
अनासक्ति मुक्ति की ओर
ज्ञानयोग
समत्व विवेक
साधना-दृष्टि
वैराग्य का अभ्यास
नैतिक
अधिकार-भाव से मुक्ति
सामाजिक
सम्बन्धों में संतुलन
व्यावहारिक
हानि-लाभ में शान्ति
नेतृत्व
संकट में स्थिर नेतृत्व
प्रबन्धन
सुख-दुःख में निर्णय की गुणवत्ता
भक्ति-दृष्टि
सब कुछ भगवान् का
मानवता
निःस्वार्थ प्रेम
दार्शनिक
संयोग-वियोग की अनित्यता

सूत्र

प्रेम बँधन नहीं बनता जब उसमें अधिकार का आग्रह घट जाता है।

जो प्रियजन में खो नहीं जाता, वही उन्हें सच्चा सहारा दे पाता है।

कर्तव्य निभाओ, पर स्वयं को सम्बन्धों के नाम से मत मिटा दो।

जिसका मन अनुकूल-प्रतिकूल में संतुलित है, वही वास्तव में शक्तिशाली है।

प्रिय की प्राप्ति में उछलना भी असन्तुलन है।

अप्रिय के आने पर टूट जाना भी असन्तुलन है।

परिस्थितियाँ बदलें, तब भी चित्त का केन्द्र न हिले—यही ज्ञान की कसौटी है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या परिवार में अनासक्ति का अर्थ उदासीनता है?
नहीं। इसका अर्थ है प्रेम और कर्तव्य निभाते हुए ममता, अधिकार-भाव और भय में न उलझना।
'अनभिष्वङ्ग' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है किसी व्यक्ति या वस्तु के सुख-दुःख को अपना सुख-दुःख मानकर उसमें पूरी तरह लिप्त न होना।
'समचित्तत्व' कैसे विकसित होता है?
विवेक, साक्षी भाव और परिस्थितियों की अनित्यता को समझने से धीरे-धीरे चित्त में समता आती है।
क्या सुख की घटना में भी सम रहना आवश्यक है?
हाँ। सुख में उन्मत्त और दुःख में विचलित होना, दोनों चित्त को अस्थिर करते हैं। समता दोनों में संतुलन देती है।
इस श्लोक का एक वाक्य में व्यावहारिक संदेश क्या है?
सम्बन्ध निभाओ, पर उनमें खोओ नहीं; अनुकूल-प्रतिकूल दोनों में मन को सम रखो।

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