जो सबको अपने समान देखता है वही श्रेष्ठ योगी है
श्रेष्ठ योगी वही है जो आत्मौपम्य भाव से सभी प्राणियों को अपने समान देखता है और उनके सुख-दुःख को अपना ही सुख-दुःख मानता है।
जीवन में उपयोग: निर्णय लेते समय स्वयं से पूछें—यदि मैं सामने वाले की स्थिति में होता, तो मेरे साथ कैसा व्यवहार अपेक्षित होता? यही समदृष्टि और करुणा का अभ्यास है।