संबंध पर भगवद्गीता

68 श्लोक, अर्थ और जीवन में उपयोग सहित

संबंध के बारे में भगवद्गीता क्या सिखाती है 68 श्लोक, अर्थ और व्यावहारिक मार्गदर्शन सहित।

रिश्ते जीवन का सबसे बड़ा सहारा भी हैं और सबसे बड़ी परीक्षा भी। माता-पिता, जीवनसाथी, मित्र और सहकर्मियों के साथ छोटी-छोटी बातें तनाव बन जाती हैं: अनकही अपेक्षाएँ, कठोर शब्द, पुराने गिले। जब हम अपनी बात मनवाने में लगे रहते हैं और दूसरे की स्थिति नहीं देखते, तब निकटता धीरे-धीरे दूरी में बदलने लगती है।

गीता 6.32 में श्रेष्ठ योगी वह है जो सबको अपने समान देखता है और उनके सुख-दुःख को अपना मानता है। गीता 6.29 और 6.9 समदृष्टि और निष्पक्ष भाव की बात करती हैं, यानी संबंध या व्यवहार के आधार पर पक्षपात न करना। गीता 2.63 बताती है कि क्रोध विवेक को ढककर विनाश तक ले जाता है, और गीता 5.23 काम-क्रोध के आवेग को सहने वाले को स्थायी सुख का अधिकारी बताती है।

गीता 16.2 अहिंसा, सत्य, दया, कोमलता और क्रोध से दूरी को दैवी स्वभाव का आचरण बताती है, जिसमें कठोरता और चुगली घटाने की सीख है। गीता 11.44 में भक्त अपनी भूलों के लिए क्षमा माँगता है, और निकट संबंधों में भी क्षमाशीलता का भाव रखना चाहिए। निर्णय से पहले पूछें कि सामने वाले की स्थिति में मुझसे कैसे व्यवहार की अपेक्षा होती, और प्रतिक्रिया देने से पहले रुकें।

इन श्लोकों से शुरू करें

सभी 68 श्लोक

13.3

क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ

सभी क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ मैं ही हूँ; क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का ज्ञान ही वास्तविक ज्ञान है

वास्तविक ज्ञान वह है जो क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का भेद तथा परमात्मा की सर्वव्यापकता दिखा दे।

गीता में कहाँ

संबंधित विषय

आधुनिक संदर्भ

जीवन-क्षेत्र

चुनौतियाँ

गुण

विषय

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गीता के अनुसार रिश्तों में सुधार कैसे करें?
समदृष्टि, संयमित वाणी और क्षमा से। गीता 6.32 के अनुसार सामने वाले की स्थिति में स्वयं को रखकर देखना करुणा का अभ्यास है, और गीता 16.2 कठोरता, चुगली और क्रोध घटाकर सत्य तथा दया अपनाने को कहती है। प्रतिक्रिया देने से पहले रुकना भी रिश्तों को बचाता है।
गीता 6.9 में निष्पक्ष भाव का रिश्तों में क्या महत्व है?
गीता 6.9 के अनुसार श्रेष्ठ योगी बाहरी व्यवहार या संबंधों के आधार पर पक्षपात नहीं करता, बल्कि सबके प्रति समदृष्टि और निष्पक्ष भाव रखता है। रिश्तों में इसका मतलब है लोगों के व्यवहार, पद या निकटता के आधार पर भेदभाव करने के बजाय न्यायपूर्ण और संतुलित दृष्टिकोण अपनाना।
गीता 16.2 में कोमल वाणी और दया की क्या भूमिका है?
गीता 16.2 में दैवी स्वभाव वाला व्यक्ति वाणी और व्यवहार में अहिंसा तथा सत्य रखता है, क्रोध से दूर रहता है, सब प्राणियों पर दया करता है और स्वभाव में कोमल व स्थिर होता है। रिश्तों में इसका अर्थ है व्यवहार में कठोरता और चुगली घटाना, सत्य बोलना और दूसरों के प्रति संवेदनशील रहना।
गीता 11.44 में क्षमा माँगने से रिश्तों के लिए क्या सीख मिलती है?
गीता 11.44 में भक्त पिता, मित्र और प्रिय के समान क्षमाशील ईश्वर से अपनी भूलों के लिए विनम्रता से क्षमा माँगता है। इसकी सीख है कि अपनी भूल स्वीकार करके सच्चे मन से क्षमा माँगना सीखें और अपने निकट संबंधों में भी क्षमाशीलता का भाव रखें। इससे रिश्तों की कड़वाहट घटती है।
गीता 5.23 के अनुसार भावनात्मक आवेग में क्या करें?
गीता 5.23 में जो साधक काम और क्रोध के तीव्र आवेग को सहकर नियंत्रित कर लेता है, वही स्थायी सुख का अधिकारी बनता है। इसलिए भावनात्मक प्रतिक्रिया के क्षण में तुरंत उत्तर देने के बजाय धैर्य और आत्मनियंत्रण का अभ्यास करें। थोड़ा रुकने से कही गई बात और रिश्ते दोनों बच सकते हैं।

एक्सप्लोरर में फ़िल्टर करें

भगवद्गीता खोजें

← जीवन-क्षेत्र