संबंध हमारे जीवन का ताना-बाना हैं: परिवार, मित्र, सहकर्मी और समाज के लोग हमें बनाते भी हैं और परखते भी हैं। जिन रिश्तों में विश्वास और सम्मान होता है, वे कठिन समय में सहारा बनते हैं, और जिनमें अहंकार, उपेक्षा या कटुता होती है, वे धीरे-धीरे बोझ लगने लगते हैं। रिश्तों की गुणवत्ता अक्सर इस पर निर्भर करती है कि हम दूसरों को किस दृष्टि से देखते हैं।
गीता 6.31 और 13.28 सबमें एक ही परमात्म-तत्त्व को देखने की दृष्टि देती हैं, जिससे संबंध अधिक करुणामय, सम्मानपूर्ण और निष्पक्ष बनते हैं। गीता 12.13 में भक्त किसी से द्वेष नहीं करता, सबके प्रति मित्रभाव और करुणा रखता है, ममता तथा अहंकार से मुक्त रहता है और दूसरों को क्षमा करता है। गीता 4.11 के अनुसार जैसा भाव हम रखते हैं, वैसे ही अनुभव और परिणाम मिलते हैं।
गीता 18.64 में भगवान् अर्जुन से कहते हैं कि वे उन्हें अत्यंत प्रिय हैं, इसलिए हित का उपदेश दे रहे हैं, यानी सच्चे हितैषी की बात स्नेह और विश्वास से सुननी चाहिए। गीता 4.3 बताती है कि गहरा ज्ञान उन्हें मिलता है जिनमें श्रद्धा, भक्ति और सच्चा संबंध होता है, और गीता 9.29 कहती है कि भगवान् सबके प्रति सम हैं, पर भक्ति से जुड़ने वाले को उनकी निकटता का विशेष अनुभव होता है। अपने व्यवहार में द्वेष की जगह मित्रता और प्रतिशोध की जगह क्षमा रखें।