भगवद्गीता 10.5 — अहिंसा, समता, तप, दान आदि सभी भावों का कारण भगवान्
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः ।
भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥ १०.५ ॥
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अहिंसा, समता, सन्तोष, तप, दान, यश और अपयश—प्राणियों के ये अनेक प्रकार के भाव मुझसे ही उत्पन्न होते हैं।
पदच्छेद
संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।
शब्दार्थ
| पंक्ति 1 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| अहिंसा | किसी को कष्ट न देना |
| समता | सुख-दुःख में समभाव |
| तुष्टिः | सन्तोष |
| तपः | तप, संयमपूर्ण साधना |
| दानम् | दान |
| यशः | यश, कीर्ति |
| अयशः | अपयश |
| पंक्ति 2 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| भवन्ति | उत्पन्न होते हैं |
| भावाः | भाव |
| भूतानाम् | प्राणियों के |
| मत्तः | मुझसे |
| एव | ही |
| पृथग्विधाः | अनेक प्रकार के |
| पंक्ति 1 | पंक्ति 2 | ||
|---|---|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ | संस्कृत शब्द | अर्थ |
| अहिंसा | किसी को कष्ट न देना | भवन्ति | उत्पन्न होते हैं |
| समता | सुख-दुःख में समभाव | भावाः | भाव |
| तुष्टिः | सन्तोष | भूतानाम् | प्राणियों के |
| तपः | तप, संयमपूर्ण साधना | मत्तः | मुझसे |
| दानम् | दान | एव | ही |
| यशः | यश, कीर्ति | पृथग्विधाः | अनेक प्रकार के |
| अयशः | अपयश | ||
विस्तृत विवरण
परिचय
श्लोक चार से आरंभ हुई भावों की सूची इस श्लोक में पूर्ण होती है. श्रीकृष्ण अहिंसा, समता, तप और दान जैसे गुणों के साथ यश-अपयश का भी उल्लेख करते हैं और अंत में स्पष्ट घोषणा करते हैं कि सब भाव उन्हीं से उत्पन्न होते हैं.
भावार्थ
भावों की सूची का दूसरा भाग
पिछले श्लोक में कही गई बात यहाँ पूरी होती है. भगवान कुछ और भावों को गिनाते हैं और फिर उस वाक्य का निष्कर्ष देते हैं जो चौथे श्लोक से शुरू हुआ था.
अहिंसा: केवल शारीरिक हिंसा से बचना ही नहीं, बल्कि वाणी और विचार से भी किसी को कष्ट न पहुँचाना.
समता: सफलता-असफलता, मान-अपमान और अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों में मन का संतुलित रहना.
तुष्टिः — संतोष: जो प्राप्त है उसमें शांति और प्रसन्नता का अनुभव करना. यह आलस्य नहीं, बल्कि लोभ और तुलना से मुक्त मन की अवस्था है.
तपः — आत्मसंयम की साधना: शरीर, वाणी और मन को अनुशासित करके आंतरिक शक्ति बढ़ाना.
दानम्: अपने साधनों में से निःस्वार्थ भाव से दूसरों के हित के लिए देना.
यशोऽयशः — कीर्ति और अपकीर्ति: यहाँ भी भगवान अनुकूल और प्रतिकूल दोनों का उल्लेख करते हैं. अच्छे या बुरे नाम का मिलना भी कर्म और परिस्थितियों के विधान के अंतर्गत है.
भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः — सब भाव मुझसे ही: श्लोक का सार यही है कि प्राणियों में पाए जाने वाले ये अनेक प्रकार के भाव परमात्मा से ही उत्पन्न होते हैं. वे सबके मूल स्रोत हैं, चाहे भाव सात्त्विक हों या अन्य.
हमारे दैनिक जीवन के लिए संदेश
गुणों का अभ्यास: अहिंसा, संतोष, तप और दान जैसे गुण केवल सुनने के लिए नहीं, दैनिक व्यवहार में उतारने के लिए हैं. छोटे-छोटे कार्यों में इनका अभ्यास हमारे चरित्र को गढ़ता है.
यश-अपयश में स्थिरता: प्रशंसा मिलने पर फूलना और आलोचना होने पर टूट जाना, दोनों ही असंतुलन हैं. जो यह समझ लेता है कि दोनों जीवन की धारा के अंग हैं, वह भीतर से स्थिर रहता है.
सब कुछ ईश्वर से जुड़ा है: जब हम अपने गुणों और परिस्थितियों को ईश्वर के विधान से जोड़कर देखते हैं, तो हमारे भीतर कृतज्ञता और स्वीकार का भाव बढ़ता है.
भावों की सूची का दूसरा भाग
पिछले श्लोक में कही गई बात यहाँ पूरी होती है. भगवान कुछ और भावों को गिनाते हैं और फिर उस वाक्य का निष्कर्ष देते हैं जो चौथे श्लोक से शुरू हुआ था.
अहिंसा: केवल शारीरिक हिंसा से बचना ही नहीं, बल्कि वाणी और विचार से भी किसी को कष्ट न पहुँचाना.
समता: सफलता-असफलता, मान-अपमान और अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों में मन का संतुलित रहना.
तुष्टिः — संतोष: जो प्राप्त है उसमें शांति और प्रसन्नता का अनुभव करना. यह आलस्य नहीं, बल्कि लोभ और तुलना से मुक्त मन की अवस्था है.
तपः — आत्मसंयम की साधना: शरीर, वाणी और मन को अनुशासित करके आंतरिक शक्ति बढ़ाना.
दानम्: अपने साधनों में से निःस्वार्थ भाव से दूसरों के हित के लिए देना.
यशोऽयशः — कीर्ति और अपकीर्ति: यहाँ भी भगवान अनुकूल और प्रतिकूल दोनों का उल्लेख करते हैं. अच्छे या बुरे नाम का मिलना भी कर्म और परिस्थितियों के विधान के अंतर्गत है.
भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः — सब भाव मुझसे ही: श्लोक का सार यही है कि प्राणियों में पाए जाने वाले ये अनेक प्रकार के भाव परमात्मा से ही उत्पन्न होते हैं. वे सबके मूल स्रोत हैं, चाहे भाव सात्त्विक हों या अन्य.
हमारे दैनिक जीवन के लिए संदेश
गुणों का अभ्यास: अहिंसा, संतोष, तप और दान जैसे गुण केवल सुनने के लिए नहीं, दैनिक व्यवहार में उतारने के लिए हैं. छोटे-छोटे कार्यों में इनका अभ्यास हमारे चरित्र को गढ़ता है.
यश-अपयश में स्थिरता: प्रशंसा मिलने पर फूलना और आलोचना होने पर टूट जाना, दोनों ही असंतुलन हैं. जो यह समझ लेता है कि दोनों जीवन की धारा के अंग हैं, वह भीतर से स्थिर रहता है.
सब कुछ ईश्वर से जुड़ा है: जब हम अपने गुणों और परिस्थितियों को ईश्वर के विधान से जोड़कर देखते हैं, तो हमारे भीतर कृतज्ञता और स्वीकार का भाव बढ़ता है.
आगे का विषय
भगवान ने भावों की सूची पूरी करके बताया कि वे सब उन्हीं से उत्पन्न होते हैं. अब वे सृष्टि की उस परंपरा की ओर ध्यान दिलाते हैं जिसमें महर्षियों और मनुओं के माध्यम से यह संसार आगे बढ़ा, और बताते हैं कि वे भी भगवान के ही संकल्प से उत्पन्न हुए.
इस श्लोक में छिपे संदेश
इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।
सूत्र
दूसरों को कष्ट न देना सबसे पहला धर्म है।
सुख-दुःख में सम रहना मन की परिपक्वता है।
जिसे संतोष मिला, उसे भीतर का धन मिला।
संयम के अभ्यास से जीवन में शक्ति और स्पष्टता आती है।
देना केवल वस्तु का नहीं, भावना का भी विस्तार है।
कीर्ति या निन्दा से बँध जाना भी एक आसक्ति है।
अच्छे गुण का अभिमान त्यागें; वह भी परमात्मा की ही देन है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
'समता' का क्या अर्थ है?
'तुष्टिः' और आलस्य में क्या अन्तर है?
यश और अपयश भी भगवान् से कैसे?
'पृथग्विधाः' शब्द क्या संकेत देता है?
इस श्लोक का एक वाक्य में व्यावहारिक संदेश क्या है?
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