ईर्ष्या पर भगवद्गीता

19 श्लोक, अर्थ और जीवन में उपयोग सहित

"ईर्ष्या" में सहायक भगवद्गीता के श्लोक 19 श्लोक, अर्थ, मूल शिक्षा और व्यावहारिक उपयोग सहित।

ईर्ष्या तब जागती है जब हम किसी की सफलता, सुंदरता या सुख को देखकर अपने में कमी महसूस करते हैं। सोशल मीडिया, दफ़्तर और रिश्तेदारी में तुलना के मौके हर दिन मिलते हैं। ईर्ष्या मन को कड़वा करती है, दूसरों की खुशी में शामिल होने से रोकती है और अपनी उपलब्धियों का आनंद भी छीन लेती है।

गीता 4.22 में कर्मयोगी सहज प्राप्त वस्तुओं में संतुष्ट रहता है, ईर्ष्या से रहित होता है और सफलता-असफलता में सम रहता है। गीता 3.32 बताती है कि ईर्ष्या और अहंकार के कारण सही मार्गदर्शन में दोष देखने वाला अपने ही कल्याण से वंचित रह जाता है। गीता 1.3 में दुर्योधन का 'आपके बुद्धिमान शिष्य' कहकर ताना कसना वाणी में छिपी ईर्ष्या और कूटनीति का संकेत है।

गीता 10.23 और 10.41 शक्ति, ऐश्वर्य और श्रेष्ठता को ईश्वर के तेज का अंश बताती हैं, इसलिए किसी की श्रेष्ठता को ईर्ष्या से नहीं, सम्मान और प्रेरणा से देखें। गीता 6.32 में सबको अपने समान देखने वाला श्रेष्ठ योगी है। तुलना के बजाय अपने प्रयासों पर ध्यान दें, दूसरों के सुझावों को खुले मन से परखें और अपनी बात में ताना नहीं, सम्मान रखें।

इन श्लोकों से शुरू करें

सभी 19 श्लोक

गीता में कहाँ

संबंधित विषय

चुनौतियाँ

जीवन-क्षेत्र

गुण

आधुनिक संदर्भ

विषय

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गीता के अनुसार ईर्ष्या को कैसे कम करें?
दूसरों से तुलना छोड़कर अपने प्रयासों पर ध्यान दें और जो सहज मिला है, उसमें संतोष विकसित करें। गीता 4.22 में ऐसा कर्मयोगी ईर्ष्या से रहित, सफलता-असफलता में सम और संतुष्ट रहता है। साथ ही दूसरों की श्रेष्ठता को प्रेरणा की दृष्टि से देखने का अभ्यास ईर्ष्या की जड़ ढीली करता है।
गीता 4.22 में ईर्ष्या से रहित होने का क्या अर्थ है?
गीता 4.22 में जो व्यक्ति सहज प्राप्त वस्तुओं में संतुष्ट रहता है और सफलता-असफलता में समान रहता है, वह ईर्ष्या से रहित है और कर्मों से बंधता नहीं। इसका अर्थ है दूसरों से तुलना के बजाय अपने कर्म पर ध्यान देकर संतोष और मानसिक संतुलन विकसित करना।
गीता 3.32 में दोष-दृष्टि के बारे में क्या कहा गया है?
गीता 3.32 बताती है कि ईर्ष्या और अहंकार के कारण सही मार्गदर्शन में भी दोष देखने वाला व्यक्ति अपने ही कल्याण से वंचित रह जाता है। इसलिए हर सुझाव को आलोचना की नज़र से देखने के बजाय उसमें निहित सत्य को खुले मन से परखें, क्योंकि दोष-दृष्टि सीखने का द्वार बंद कर देती है।
गीता 1.3 में दुर्योधन की वाणी से ईर्ष्या कैसे झलकती है?
गीता 1.3 में दुर्योधन 'आपके बुद्धिमान शिष्य' कहकर द्रोण को उलाहना देता है, जिसमें ताना, कूटनीति और ईर्ष्या छिपी है। इससे सीख मिलती है कि अपनी बात कहते समय देखें कि शब्दों के पीछे सम्मान है या ताना। मर्यादित संवाद ही संबंधों की रक्षा करता है।
गीता 10.23 के अनुसार किसी की श्रेष्ठता देखकर क्या करें?
गीता 10.23 में शक्ति, ऐश्वर्य, तेज और स्थिरता जैसे गुणों के श्रेष्ठ रूपों में भगवान् की विभूति बताई गई है। इसलिए किसी भी क्षेत्र की श्रेष्ठता को ईर्ष्या से नहीं, सम्मान और प्रेरणा की दृष्टि से देखें और उससे अपने प्रयास को बेहतर बनाने की सीख लें।

एक्सप्लोरर में फ़िल्टर करें

भगवद्गीता खोजें

← चुनौतियाँ