अध्याय 18 मोक्ष संन्यास योग

78 श्लोक

गीता का अंतिम अध्याय उसके सम्पूर्ण संदेश का सार प्रस्तुत करता है। श्रीकृष्ण ज्ञान, कर्म, भक्ति, त्याग, कर्तव्य और आत्मसमर्पण जैसे सभी प्रमुख विषयों को एक सूत्र में पिरोते हैं। इस अध्याय से हमें यह सीखने को मिलता है कि संसार में रहते हुए भी आंतरिक रूप से स्वतंत्र कैसे रहा जाए, अपने स्वभाव और कर्तव्य को कैसे पहचाना जाए, और अपने जीवन को उच्चतम उद्देश्य के साथ कैसे जोड़ा जाए। यह अध्याय दर्शाता है कि ज्ञान, निःस्वार्थ कर्म, प्रेमपूर्ण भक्ति और पूर्ण समर्पण अंततः मनुष्य को शांति, संतोष और मोक्ष की ओर ले जाते हैं।

श्लोक सूची

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श्लोक 1 संन्यास और त्याग का तत्त्व क्या है? अर्जुन उवाच । संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् । त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥ १८.१ ॥ अर्जुन ने कहा—हे महाबाहो! हे हृषीकेश! हे केशिनिषूदन! मैं संन्यास और त्याग के वास्तविक स्वरूप को अलग-अलग जानना चाहता हूँ। → श्लोक 2 काम्य कर्मों का त्याग संन्यास, फलत्याग ही त्याग श्रीभगवानुवाच । काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः । सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥ १८.२ ॥ भगवान् ने कहा—ज्ञानीजन कामना से प्रेरित कर्मों के त्याग को संन्यास समझते हैं, और विवेकशील पुरुष सभी कर्मों के फल की आसक्ति के त्याग को त्याग कहते हैं। → श्लोक 3 कर्म त्याज्य है या अनुष्ठेय? मतभेद त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः । यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ॥ १८.३ ॥ कुछ विद्वान् कहते हैं कि कर्म दोषयुक्त है, इसलिए उसे त्याग देना चाहिए; जबकि अन्य विद्वान् कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप रूप कर्मों का त्याग नहीं करना चाहिए। → श्लोक 4 त्याग के विषय में भगवान् का निश्चय: त्रिविध त्याग निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम । त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः संप्रकीर्तितः ॥ १८.४ ॥ हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन! उस त्याग के विषय में मेरा निश्चय सुनो। हे पुरुषश्रेष्ठ! त्याग तीन प्रकार का कहा गया है। → श्लोक 5 यज्ञ, दान और तप त्याज्य नहीं, कर्तव्य हैं यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् । यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥ १८.५ ॥ यज्ञ, दान और तप रूप कर्म त्यागने योग्य नहीं हैं, बल्कि अवश्य करने योग्य हैं; क्योंकि यज्ञ, दान और तप विचारशील साधकों को भी पवित्र करने वाले हैं। → श्लोक 6 आसक्ति और फल छोड़कर कर्म करना ही उत्तम मत एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च । कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ॥ १८.६ ॥ हे पार्थ! इन यज्ञ, दान, तप आदि कर्मों को भी आसक्ति और फलों की कामना छोड़कर करना चाहिए—यह मेरा निश्चित और सर्वश्रेष्ठ मत है। → श्लोक 7 नियत कर्म का मोहवश त्याग तामस है नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते । मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः ॥ १८.७ ॥ नियत कर्म, अर्थात् अपने कर्तव्य रूप कर्म का त्याग उचित नहीं है। मोह के कारण उसे छोड़ देना तामस त्याग कहा गया है। → श्लोक 8 दुःख मानकर किया गया कर्म-त्याग राजस है दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् । स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ॥ १८.८ ॥ जो कर्म को केवल दुःखदायक मानकर शरीर के कष्ट के भय से छोड़ देता है, वह राजस त्याग करके भी त्याग का वास्तविक फल प्राप्त नहीं करता। → श्लोक 9 कर्तव्य मानकर, आसक्ति-फल छोड़कर किया कर्म: सात्त्विक त्याग कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन । सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ॥ १८.९ ॥ हे अर्जुन! जो नियत कर्म 'करना कर्तव्य है' ऐसा समझकर आसक्ति और फल का त्याग करते हुए किया जाता है, वही सात्त्विक त्याग माना गया है। → श्लोक 10 सात्त्विक त्यागी: न द्वेष, न राग, संशय-रहित न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते । त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥ १८.१० ॥ जो सात्त्विक त्यागी है, वह अप्रिय कर्म से द्वेष नहीं करता और प्रिय या शुभ कर्म में आसक्त नहीं होता। वह सत्त्वगुण से युक्त, विवेकी और संशय-रहित होता है। → श्लोक 11 देहधारी कर्म नहीं छोड़ सकता; फल-त्यागी ही त्यागी है न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः । यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥ १८.११ ॥ देह धारण करने वाले मनुष्य के लिए सम्पूर्ण कर्मों का पूर्ण त्याग सम्भव नहीं है। इसलिए जो कर्मफल की आसक्ति का त्याग करता है, वही वास्तव में त्यागी कहा जाता है। → श्लोक 12 त्रिविध कर्मफल: अत्यागी को मिलता है, संन्यासी को नहीं अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् । भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित् ॥ १८.१२ ॥ कर्म का फल तीन प्रकार का होता है—अप्रिय, प्रिय और मिश्रित। यह फल मरने के बाद उन्हें मिलता है जिन्होंने फलासक्ति का त्याग नहीं किया; किन्तु त्यागी संन्यासियों को कभी नहीं मिलता। → श्लोक 13 सब कर्मों की सिद्धि के पाँच कारण पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे । साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् ॥ १८.१३ ॥ हे महाबाहो! सम्पूर्ण कर्मों की सिद्धि के ये पाँच कारण, जो कर्मों का अन्त बताने वाले साङ्ख्य-सिद्धान्त में कहे गए हैं, उन्हें तुम मुझसे भली प्रकार समझो। → श्लोक 14 अधिष्ठान, कर्ता, करण, चेष्टा और दैव अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् । विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ॥ १८.१४ ॥ कर्म की सिद्धि के पाँच कारण हैं—अधिष्ठान (शरीर या आधार), कर्ता, अनेक प्रकार के करण (इन्द्रियाँ और साधन), अनेक प्रकार की चेष्टाएँ और पाँचवाँ दैव। → श्लोक 15 शरीर, वाणी और मन से किए सभी कर्मों के पाँच हेतु शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः । न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ॥ १८.१५ ॥ मनुष्य शरीर, वाणी और मन से जो भी कर्म आरम्भ करता है—चाहे वह उचित हो या अनुचित—उसके ये पाँच ही कारण होते हैं। → श्लोक 16 केवल स्वयं को कर्ता मानना दुर्बुद्धि है तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः । पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः ॥ १८.१६ ॥ ऐसी स्थिति में भी, जो अशुद्ध बुद्धि के कारण केवल आत्मा को ही कर्ता मानता है, वह दुर्बुद्धि पुरुष वास्तविकता को नहीं देखता। → श्लोक 17 अहंकार-रहित और अलिप्त बुद्धि कर्म से नहीं बँधती यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते । हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥ १८.१७ ॥ जिसके भीतर 'मैं कर्ता हूँ' का भाव नहीं है और जिसकी बुद्धि कर्मफल में लिप्त नहीं होती, वह इन सब लोगों को मारकर भी वास्तव में न मारता है और न कर्म से बँधता है। → श्लोक 18 कर्म की प्रेरणा और कर्म का संग्रह: ज्ञान, ज्ञेय, परिज्ञाता ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना । करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः ॥ १८.१८ ॥ ज्ञान, ज्ञेय और परिज्ञाता—ये तीन कर्म की प्रेरणा हैं; और करण, कर्म तथा कर्ता—ये तीन कर्म के आश्रय या संग्रह हैं। → श्लोक 19 गुणभेद से ज्ञान, कर्म और कर्ता के तीन प्रकार ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः । प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि ॥ १८.१९ ॥ गुणों का विवेचन करने वाले शास्त्र में ज्ञान, कर्म और कर्ता गुणों के भेद से तीन-तीन प्रकार के कहे गए हैं। उन्हें भी तुम यथार्थ रूप से सुनो। → श्लोक 20 सात्त्विक ज्ञान: सबमें एक अविनाशी भाव का दर्शन सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते । अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ॥ १८.२० ॥ जिस ज्ञान से मनुष्य अलग-अलग दिखने वाले सब प्राणियों में एक अविनाशी और अखण्ड परमात्म-तत्त्व को देखता है, उस ज्ञान को सात्त्विक जानो। → श्लोक 21 राजस ज्ञान: सब प्राणियों में भिन्न-भिन्न भाव देखना पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान् । वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ॥ १८.२१ ॥ जो ज्ञान सब प्राणियों में भेद-दृष्टि से अलग-अलग प्रकार के अनेक भावों को अलग-अलग जानता है, उस ज्ञान को राजस जानो। → श्लोक 22 तामस ज्ञान: एक में पूर्ण-सा आसक्त, अतर्कसंगत और तुच्छ यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम् । अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ॥ १८.२२ ॥ जो ज्ञान किसी एक ही कार्य या वस्तु में ऐसे लगा रहता है मानो वही सम्पूर्ण हो, जो बिना युक्ति का, यथार्थ तत्त्व से रहित और तुच्छ है, वह तामस ज्ञान कहा गया है। → श्लोक 23 सात्त्विक कर्म: नियत, आसक्ति-रहित, राग-द्वेष और फलेच्छा से मुक्त नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम् । अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते ॥ १८.२३ ॥ जो कर्म कर्तव्य रूप में नियत है, आसक्ति से रहित है, राग-द्वेष के बिना और फल की इच्छा न रखने वाले व्यक्ति द्वारा किया गया है, वह सात्त्विक कर्म कहा जाता है। → श्लोक 24 राजस कर्म: कामना, अहंकार और बहुत परिश्रम से युक्त यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः । क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ॥ १८.२४ ॥ जो कर्म भोग की कामना वाले व्यक्ति द्वारा, अहंकार के साथ और बहुत परिश्रम से किया जाता है, वह राजस कर्म कहा गया है। → श्लोक 25 तामस कर्म: परिणाम, हानि और सामर्थ्य को देखे बिना, मोह से आरम्भ अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम् । मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ॥ १८.२५ ॥ जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और अपने सामर्थ्य का विचार किए बिना केवल मोह या अज्ञान से आरम्भ किया जाता है, वह तामस कर्म कहा जाता है। → श्लोक 26 सात्त्विक कर्ता: अनासक्त, निरहंकारी, धैर्य-उत्साह से युक्त मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः । सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥ १८.२६ ॥ जो कर्ता आसक्ति से मुक्त है, अहंकार के वचन नहीं बोलता, धैर्य और उत्साह से युक्त है तथा सफलता और असफलता में विकार-रहित रहता है, वह सात्त्विक कर्ता कहा जाता है। → श्लोक 27 राजस कर्ता: रागी, फलेच्छुक, लोभी, अशुद्ध और हर्ष-शोक से युक्त रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः । हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ॥ १८.२७ ॥ जो कर्ता आसक्त, कर्मफल की इच्छा वाला, लोभी, दूसरों को पीड़ा देने के स्वभाव वाला, अशुद्ध और हर्ष-शोक से युक्त है, वह राजस कर्ता कहा गया है। → श्लोक 28 तामस कर्ता: अयुक्त, हठी, आलसी, विषादी और दीर्घसूत्री अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः । विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ॥ १८.२८ ॥ जो कर्ता अनुशासनहीन, संस्कारहीन, जड़-अहंकारी, धूर्त, दूसरों की हानि करने वाला, आलसी, सदा खिन्न और काम को टालने वाला है, वह तामस कर्ता कहा जाता है। → श्लोक 29 गुणों के अनुसार बुद्धि और धृति के तीन भेद बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु । प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय ॥ १८.२९ ॥ हे धनञ्जय! अब तुम बुद्धि और धृति के गुणों के अनुसार तीन-तीन भेद, जो मैं पूर्ण रूप से और अलग-अलग कहने जा रहा हूँ, उन्हें सुनो। → श्लोक 30 सात्त्विक बुद्धि: प्रवृत्ति-निवृत्ति, कार्य-अकार्य, भय-अभय और बन्ध-मोक्ष का विवेक प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये । बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ १८.३० ॥ हे पार्थ! जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्ति, करने योग्य और न करने योग्य, भय और अभय तथा बन्धन और मोक्ष को यथार्थ रूप में जानती है, वह सात्त्विक बुद्धि है। → श्लोक 31 राजस बुद्धि: धर्म-अधर्म और कार्य-अकार्य का अयथार्थ बोध यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च । अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ॥ १८.३१ ॥ हे पार्थ! जिस बुद्धि से मनुष्य धर्म और अधर्म तथा करने योग्य और न करने योग्य कर्म को यथार्थ रूप में नहीं जानता, वह राजस बुद्धि है। → श्लोक 32 तामस बुद्धि: अधर्म को धर्म मानना और सबको विपरीत देखना अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता । सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥ १८.३२ ॥ हे पार्थ! जो बुद्धि अज्ञान के अन्धकार से ढँकी हुई अधर्म को धर्म मानती है और सभी विषयों को उलटा समझती है, वह तामस बुद्धि है। → श्लोक 33 सात्त्विक धृति: योग से मन, प्राण और इन्द्रियों को धारण करना धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः । योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ १८.३३ ॥ हे पार्थ! जिस अविचल धृति के द्वारा मनुष्य योग-साधना से मन, प्राण और इन्द्रियों की क्रियाओं को धारण करता है, वह सात्त्विक धृति है। → श्लोक 34 राजस धृति: धर्म, काम और अर्थ को फलाकांक्षा से धारण करना यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन । प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी ॥ १८.३४ ॥ हे अर्जुन! जिस धृति से मनुष्य आसक्ति और फल की कामना के साथ धर्म, काम और अर्थ को धारण करता है, वह राजस धृति है। → श्लोक 35 तामस धृति: स्वप्न, भय, शोक, विषाद और मद को न छोड़ना यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च । न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी ॥ १८.३५ ॥ हे पार्थ! जिस धृति के कारण दुर्बुद्धि मनुष्य निद्रा-आलस्य, भय, शोक, विषाद और मद को नहीं छोड़ता, वह तामस धृति है। → श्लोक 36 सुख के तीन भेद: अभ्यास से रमने वाला और दुःख का अन्त करने वाला सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ । अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति ॥ १८.३६ ॥ हे भरतश्रेष्ठ! अब तुम मुझसे तीन प्रकार के सुख को सुनो, जिसमें साधक अभ्यास से रमता है और जिससे वह दुःख के अन्त को प्राप्त करता है। → श्लोक 37 सात्त्विक सुख: आरम्भ में विष-सा, परिणाम में अमृत-सा यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् । तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥ १८.३७ ॥ जो सुख आरम्भ में विष के समान कठिन लगता है, पर परिणाम में अमृत के समान होता है और आत्मा-विषयक बुद्धि की निर्मलता से उत्पन्न होता है, वह सात्त्विक सुख कहा गया है। → श्लोक 38 राजस सुख: आरम्भ में अमृत-सा, परिणाम में विष-सा विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् । परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥ १८.३८ ॥ जो सुख इन्द्रियों और विषयों के संयोग से उत्पन्न होता है, आरम्भ में अमृत-सा लगता है, पर परिणाम में विष के समान होता है, वह राजस सुख माना गया है। → श्लोक 39 तामस सुख: आरम्भ से अन्त तक मोह में डालने वाला यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः । निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ॥ १८.३९ ॥ जो सुख आरम्भ में भी और परिणाम में भी आत्मा को मोह में डालने वाला है और जो नींद, आलस्य तथा प्रमाद से उत्पन्न होता है, वह तामस सुख कहा गया है। → श्लोक 40 प्रकृति के तीन गुणों से मुक्त कोई भी सत्ता नहीं न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः । सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः ॥ १८.४० ॥ पृथ्वी पर, स्वर्ग में अथवा देवताओं में भी ऐसा कोई प्राणी या वस्तु नहीं है जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीन गुणों से मुक्त हो। → श्लोक 41 स्वभाव से उत्पन्न गुणों के अनुसार कर्मों का विभाजन ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप । कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः ॥ १८.४१ ॥ हे परन्तप! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के कर्म उनके स्वभाव से उत्पन्न गुणों के आधार पर विभाजित किए गए हैं। → श्लोक 42 ब्राह्मण के स्वभावज कर्म: शम, दम, तप, शौच आदि शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च । ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥ १८.४२ ॥ मन का शान्त रहना, इन्द्रिय-संयम, तप, पवित्रता, क्षमा, सरलता, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिकता—ये ब्राह्मण के स्वभाव से उत्पन्न कर्म हैं। → श्लोक 43 क्षत्रिय के स्वभावज कर्म: शौर्य, तेज, धृति, दक्षता शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् । दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥ १८.४३ ॥ शूरवीरता, तेज, धैर्य, दक्षता, युद्ध में पीछे न हटना, दान और शासन-सामर्थ्य का भाव—ये क्षत्रिय के स्वभाव से उत्पन्न कर्म हैं। → श्लोक 44 वैश्य और शूद्र के स्वभावज कर्म: कृषि, वाणिज्य और सेवा कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् । परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥ १८.४४ ॥ खेती, गोपालन और व्यापार वैश्य के स्वभावज कर्म हैं, तथा सेवा-रूप कर्म शूद्र का स्वभावज कर्म है। → श्लोक 45 अपने-अपने कर्म में निष्ठा से संसिद्धि की प्राप्ति स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः । स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु ॥ १८.४५ ॥ अपने-अपने स्वाभाविक कर्म में निष्ठा से लगा हुआ मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त करता है। अपने कर्म में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार सिद्धि पाता है, वह तुम सुनो। → श्लोक 46 स्वकर्म से परमात्मा की आराधना करके सिद्धि यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् । स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥ १८.४६ ॥ जिस परमात्मा से सब प्राणियों की प्रवृत्ति होती है और जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है, अपने स्वाभाविक कर्म के द्वारा उसकी आराधना करके मनुष्य सिद्धि प्राप्त करता है। → श्लोक 47 गुणहीन दीखता स्वधर्म भी परधर्म से श्रेष्ठ है श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् । स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥ १८.४७ ॥ भली-भाँति आचरण किए गए परधर्म की अपेक्षा अपना धर्म, भले ही वह गुण-रहित-सा दिखे, श्रेष्ठ है; क्योंकि स्वभाव के अनुसार निर्धारित कर्म करने वाला पाप को प्राप्त नहीं होता। → श्लोक 48 सहज कर्म दोषयुक्त दीखने पर भी न छोड़ें सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् । सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥ १८.४८ ॥ हे कौन्तेय! अपने सहज कर्म को दोषयुक्त होने पर भी नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि सभी कर्म किसी न किसी दोष से वैसे ही ढँके रहते हैं, जैसे अग्नि धुएँ से। → श्लोक 49 अनासक्त, जितात्मा और निःस्पृह को संन्यास से नैष्कर्म्य-सिद्धि असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः । नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति ॥ १८.४९ ॥ जिसकी बुद्धि सब जगह अनासक्त है, जिसने मन को जीत लिया है और जो इच्छाओं से रहित है, वह संन्यास के द्वारा कर्मबन्धन से मुक्ति रूप परम नैष्कर्म्य-सिद्धि को प्राप्त करता है। → श्लोक 50 सिद्धि पाकर ब्रह्म को प्राप्त करने की ज्ञान-निष्ठा सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे । समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा ॥ १८.५० ॥ हे कौन्तेय! सिद्धि को प्राप्त हुआ साधक जिस प्रकार ब्रह्म को पाता है और जो ज्ञान की परम निष्ठा है, उसे मैं संक्षेप में कहता हूँ, तुम मुझसे समझो। → श्लोक 51 विशुद्ध बुद्धि, धृति और राग-द्वेष-त्याग से ब्रह्म-निष्ठा की तैयारी बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च । शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥ १८.५१ ॥ जो विशुद्ध बुद्धि से युक्त है, धृति के द्वारा स्वयं को नियन्त्रित करता है, शब्द आदि विषयों का त्याग करता है और राग-द्वेष को छोड़ देता है, वह ब्रह्म-निष्ठा के योग्य बनता है। → श्लोक 52 एकान्त, मित-आहार, संयम और ध्यान-वैराग्य से साधना विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः । ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥ १८.५२ ॥ जो साधक एकान्त का सेवन करता है, हल्का और मित आहार लेता है, वाणी, शरीर और मन को संयमित रखता है, सदा ध्यान-योग में तत्पर रहता है और वैराग्य का आश्रय लेता है, वह ब्रह्म-निष्ठा की ओर बढ़ता है। → श्लोक 53 अहंकार आदि छोड़कर निर्मम और शान्त साधक ब्रह्म-भाव के योग्य अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् । विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ १८.५३ ॥ जो साधक अहंकार, हठपूर्ण बल, घमण्ड, कामना, क्रोध और संग्रह-वृत्ति को छोड़कर ममता-रहित और शान्त हो जाता है, वह ब्रह्म-भाव की प्राप्ति के योग्य बनता है। → श्लोक 54 ब्रह्मभूत प्रसन्नात्मा: न शोक, न आकांक्षा, समभाव और पराभक्ति ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति । समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥ १८.५४ ॥ ब्रह्म-भाव में स्थित, प्रसन्न चित्त वाला साधक न किसी बात का शोक करता है, न कुछ चाहता है। वह सब प्राणियों में सम रहकर मेरी परा भक्ति को प्राप्त करता है। → श्लोक 55 भक्ति से परमात्मा का तत्त्व जानकर उसमें प्रवेश भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः । ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ॥ १८.५५ ॥ भक्ति के द्वारा मनुष्य मुझे यथार्थ रूप से जानता है कि मैं कितना व्यापक और कैसा हूँ। इस प्रकार मुझे तत्त्व से जानकर वह तत्काल मुझमें प्रवेश कर जाता है। → श्लोक 56 सब कर्म करते हुए भी भगवत्-आश्रय से शाश्वत पद की प्राप्ति सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः । मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ॥ १८.५६ ॥ मेरा आश्रय लेने वाला भक्त सदा सभी कर्म करते हुए भी मेरी कृपा से शाश्वत और अविनाशी परमपद को प्राप्त करता है। → श्लोक 57 चित्त से सब कर्म अर्पित करके बुद्धियोग का आश्रय चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः । बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव ॥ १८.५७ ॥ विवेकपूर्वक सब कर्मों को मुझे अर्पित करके, मुझे ही परम लक्ष्य मानकर, बुद्धियोग का आश्रय लेते हुए तुम निरन्तर मुझमें चित्त लगाने वाले बनो। → श्लोक 58 भगवत्-कृपा से सब संकट पार, अहंकार से विनाश की चेतावनी मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि । अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि ॥ १८.५८ ॥ यदि तुम मुझमें चित्त लगाओगे तो मेरी कृपा से सब संकटों को पार कर जाओगे; किन्तु यदि अहंकार के कारण मेरी बात नहीं सुनोगे तो पतन को प्राप्त होगे। → श्लोक 59 अहंकार से 'युद्ध नहीं करूँगा' का निश्चय मिथ्या है यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे । मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥ १८.५९ ॥ यदि तुम अहंकार का आश्रय लेकर यह मानते हो कि 'मैं युद्ध नहीं करूँगा', तो तुम्हारा यह निश्चय मिथ्या है; क्योंकि तुम्हारा स्वभाव तुम्हें उसी कर्म में लगा देगा। → श्लोक 60 स्वभावजन्य कर्म से बँधा मनुष्य मोहवश न चाहकर भी वही करेगा स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा । कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत् ॥ १८.६० ॥ हे कौन्तेय! तुम अपने स्वभाव से उत्पन्न कर्म से बँधे हुए हो। जिसे तुम मोहवश नहीं करना चाहते, उसे भी तुम विवश होकर करोगे। → श्लोक 61 ईश्वर सब प्राणियों के हृदय में स्थित हैं ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति । भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥ १८.६१ ॥ हे अर्जुन! ईश्वर सब प्राणियों के हृदय में स्थित है और अपनी माया से यन्त्र पर चढ़े हुए के समान सभी प्राणियों को घुमाता, अर्थात् संचालित करता रहता है। → श्लोक 62 सर्वभाव से ईश्वर की शरण: परम शान्ति और शाश्वत धाम तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत । तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥ १८.६२ ॥ हे भारत! तुम सब प्रकार से उसी ईश्वर की शरण में जाओ। उसकी कृपा से तुम परम शान्ति और शाश्वत धाम को प्राप्त करोगे। → श्लोक 63 गुह्य से भी गुह्यतर ज्ञान: विचारकर जैसा चाहो वैसा करो इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया । विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥ १८.६३ ॥ इस प्रकार मैंने तुम्हें गोपनीय से भी अधिक गोपनीय ज्ञान कह दिया है। अब इसे पूर्ण रूप से विचार करके जैसा तुम चाहो, वैसा करो। → श्लोक 64 सर्वगुह्यतम परम वचन: प्रिय होने के कारण हित की बात सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः । इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥ १८.६४ ॥ सब गोपनीय बातों में भी सबसे अधिक गोपनीय मेरा परम वचन तुम फिर से सुनो। तुम मुझे अत्यन्त प्रिय हो, इसलिए मैं तुम्हारे हित की बात कहूँगा। → श्लोक 65 मन्मना भव: मुझमें मन, भक्ति, पूजन और नमन मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥ १८.६५ ॥ तुम मुझमें मन लगाने वाले बनो, मेरे भक्त बनो, मेरा पूजन करो और मुझे नमस्कार करो। ऐसा करने से तुम मुझे ही प्राप्त करोगे; यह मैं तुमसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ, क्योंकि तुम मुझे प्रिय हो। → श्लोक 66 सब धर्मों का आश्रय छोड़कर एक भगवान् की शरण: शोक मत करो सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ १८.६६ ॥ सब धर्मों के आश्रय को छोड़कर, केवल मुझ एक की शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सब पापों से मुक्त कर दूँगा; तुम शोक मत करो। → श्लोक 67 यह गीता-ज्ञान किन्हें न कहा जाए: पात्रता का विवेक इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन । न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥ १८.६७ ॥ यह गीता-ज्ञान तुम्हें किसी ऐसे व्यक्ति से कभी नहीं कहना चाहिए जो संयम-तप से रहित हो, जो भक्ति न रखता हो, जो सुनना न चाहता हो, और जो मुझमें दोष-दृष्टि रखता हो। → श्लोक 68 परम गुह्य को भक्तों में कहने वाला निःसन्देह भगवान् को पाता है य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति । भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ॥ १८.६८ ॥ जो मनुष्य इस परम गोपनीय गीता-उपदेश को मेरे भक्तों में कहेगा, वह मुझमें परम भक्ति करके निःसन्देह मुझे ही प्राप्त होगा। → श्लोक 69 गीता-ज्ञान साझा करने वाला भगवान् का सबसे प्रिय सेवक न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः । भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥ १८.६९ ॥ उससे बढ़कर मनुष्यों में कोई मेरा अधिक प्रिय कार्य करने वाला नहीं है, और न पृथ्वी पर उससे अधिक मेरा प्रिय कोई दूसरा होगा। → श्लोक 70 गीता-संवाद का अध्ययन ज्ञानयज्ञ है अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः । ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ॥ १८.७० ॥ जो मनुष्य हम दोनों के इस धर्ममय संवाद का अध्ययन करेगा, उसके द्वारा ज्ञान-यज्ञ से मैं पूजित होऊँगा—ऐसा मेरा मत है। → श्लोक 71 श्रद्धा और निन्दा-रहित श्रवण से भी शुभ लोकों की प्राप्ति श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः । सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ॥ १८.७१ ॥ जो मनुष्य श्रद्धावान् और दोष-दृष्टि से रहित होकर केवल इसे सुनता भी है, वह भी पापों से मुक्त होकर पुण्यकर्मियों के शुभ लोकों को प्राप्त करता है। → श्लोक 72 क्या तुमने एकाग्र चित्त से सुना? क्या अज्ञान-मोह नष्ट हुआ? कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा । कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय ॥ १८.७२ ॥ हे पार्थ! क्या तुमने इसे एकाग्र चित्त से सुना? हे धनञ्जय! क्या तुम्हारा अज्ञान से उत्पन्न मोह नष्ट हो गया? → श्लोक 73 अर्जुन का मोह नष्ट: स्मृति प्राप्त, संशय-मुक्त, आज्ञा-पालन का संकल्प अर्जुन उवाच । नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत । स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ॥ १८.७३ ॥ अर्जुन ने कहा—हे अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है और मुझे अपनी स्मृति प्राप्त हो गई है। अब मैं संशय-रहित होकर स्थित हूँ और आपके वचन के अनुसार कर्म करूँगा। → श्लोक 74 सञ्जय: वासुदेव और अर्जुन का अद्भुत, रोमाञ्चकारी संवाद सञ्जय उवाच । इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः । संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् ॥ १८.७४ ॥ सञ्जय ने कहा—इस प्रकार मैंने वासुदेव श्रीकृष्ण और महात्मा अर्जुन का यह अद्भुत और रोमाञ्चकारी संवाद सुना। → श्लोक 75 व्यास की कृपा से योगेश्वर कृष्ण से साक्षात् परम गुह्य योग सुना व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम् । योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम् ॥ १८.७५ ॥ मैंने व्यासजी की कृपा से यह परम गोपनीय योग-उपदेश स्वयं योगेश्वर श्रीकृष्ण के मुख से प्रत्यक्ष कहते हुए सुना। → श्लोक 76 केशव-अर्जुन के पुण्य संवाद का बार-बार स्मरण और हर्ष राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् । केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः ॥ १८.७६ ॥ हे राजन्! केशव और अर्जुन के इस अद्भुत और पवित्र संवाद को बार-बार स्मरण करके मैं बार-बार हर्षित होता हूँ। → श्लोक 77 हरि के अत्यद्भुत रूप का स्मरण: महान् विस्मय और बार-बार हर्ष तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः । विस्मयो मे महान् राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः ॥ १८.७७ ॥ हे राजन्! श्रीहरि के उस अत्यन्त अद्भुत रूप को बार-बार स्मरण करके मुझे महान् विस्मय होता है और मैं बार-बार हर्षित होता हूँ। → श्लोक 78 जहाँ योगेश्वर कृष्ण और धनुर्धर अर्जुन, वहाँ श्री, विजय, विभूति और नीति यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥ १८.७८ ॥ जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धारी अर्जुन हैं, वहाँ श्री, विजय, ऐश्वर्य और अटल नीति है; ऐसा मेरा मत है। →

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