भगवद्गीता 18.4 — त्याग के विषय में भगवान् का निश्चय: त्रिविध त्याग
निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम ।
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः संप्रकीर्तितः ॥ १८.४ ॥
🔊 इस श्लोक का अर्थ सुनें
Current voice: —
Ready
Text-to-speech is not supported by this browser.
हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन! उस त्याग के विषय में मेरा निश्चय सुनो। हे पुरुषश्रेष्ठ! त्याग तीन प्रकार का कहा गया है।
पदच्छेद
संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।
शब्दार्थ
| पंक्ति 1 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| निश्चयम् | निश्चित सिद्धान्त |
| शृणु | सुनो |
| मे | मुझसे |
| तत्र | वहाँ, उस विषय में |
| त्यागे | त्याग के विषय में |
| भरतसत्तम | हे भरतश्रेष्ठ |
| पंक्ति 2 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| त्यागः | त्याग |
| हि | निश्चय ही |
| पुरुषव्याघ्र | हे पुरुषों में सिंह के समान |
| त्रिविधः | तीन प्रकार का |
| सम्प्रकीर्तितः | कहा गया है |
| पंक्ति 1 | पंक्ति 2 | ||
|---|---|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ | संस्कृत शब्द | अर्थ |
| निश्चयम् | निश्चित सिद्धान्त | त्यागः | त्याग |
| शृणु | सुनो | हि | निश्चय ही |
| मे | मुझसे | पुरुषव्याघ्र | हे पुरुषों में सिंह के समान |
| तत्र | वहाँ, उस विषय में | त्रिविधः | तीन प्रकार का |
| त्यागे | त्याग के विषय में | सम्प्रकीर्तितः | कहा गया है |
| भरतसत्तम | हे भरतश्रेष्ठ | ||
विस्तृत विवरण
परिचय
इस श्लोक में श्रीकृष्ण मतभेदों के बीच अपना निश्चित सिद्धांत प्रस्तुत करने की घोषणा करते हैं और बताते हैं कि त्याग तीन प्रकार का होता है।
भावार्थ
निश्चय सुनने का आह्वान
श्रीकृष्ण अर्जुन को भरतसत्तम और पुरुषव्याघ्र कहकर संबोधित करते हैं। ये संबोधन अर्जुन के गौरव का स्मरण कराते हैं और संकेत देते हैं कि जो वीर रण में अडिग रहता है, उसे ज्ञान के विषय में भी दृढ़ निश्चय करना चाहिए। वे कहते हैं कि इस त्याग के विषय में मेरा निश्चय सुनो। यह मात्र एक मत नहीं, परम गुरु का सुविचारित निर्णय है।
त्याग के तीन प्रकार
श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि त्याग त्रिविध है। गीता में सत्त्व, रज और तम तीनों गुणों का विस्तार से वर्णन हुआ है, और यहाँ वही सिद्धांत त्याग पर लागू होता है। अर्थात त्याग का मूल्य इस बात से नहीं तय होता कि कुछ छोड़ा गया या नहीं, बल्कि इस बात से तय होता है कि किस भाव से छोड़ा गया।
गुणों के आधार पर परीक्षा
यही दृष्टि हमारे जीवन में भी काम आती है। एक ही बाहरी कृत्य, जैसे किसी काम से हट जाना, तीन अलग-अलग भावों से हो सकता है। कोई आलस्य और भ्रम से छोड़ता है, कोई कष्ट के भय से छोड़ता है, और कोई कर्तव्य समझकर आसक्ति त्यागता है। बाहर से तीनों एक जैसे दिखते हैं, पर भीतर की अवस्था में आकाश-पाताल का अंतर है।
संबोधनों की शिक्षा
श्रीकृष्ण अर्जुन को भरतवंश का श्रेष्ठ और पुरुषों में सिंह कहकर पुकारते हैं। इसके पीछे एक सूक्ष्म संकेत है कि जिस वीर ने इतने बड़े युद्ध के लिए स्वयं को तैयार किया, उसे अब अपने मन के संकोच से भी ऊपर उठना है। जब गुरु शिष्य को उसकी श्रेष्ठता का स्मरण कराते हैं, तब शिष्य में आत्मविश्वास जागता है और वह गूढ़ बात को ग्रहण करने के योग्य बनता है।
निश्चय का महत्त्व
गीता के इस अध्याय में बार-बार निश्चय, मति और बुद्धि शब्द आते हैं। उलझन का समाधान अंततः निश्चयात्मक बुद्धि से ही होता है। जब तक मन में संशय है, तब तक कर्म भी डगमगाता है। इसलिए श्रीकृष्ण पहले सिद्धांत को निश्चित रूप में रखते हैं और फिर उसके भेद बताते हैं।
हमारे जीवन के लिए संदेश
हम अपने त्याग, अपनी आदतों, अपने निर्णयों की ईमानदारी से जाँच कर सकते हैं। हमने कोई काम क्यों छोड़ा? क्या हम थक गए, डर गए, या सचमुच विवेक से आगे बढ़े? यह आत्म-निरीक्षण ही आध्यात्मिक प्रगति की पहली सीढ़ी है।
निश्चय सुनने का आह्वान
श्रीकृष्ण अर्जुन को भरतसत्तम और पुरुषव्याघ्र कहकर संबोधित करते हैं। ये संबोधन अर्जुन के गौरव का स्मरण कराते हैं और संकेत देते हैं कि जो वीर रण में अडिग रहता है, उसे ज्ञान के विषय में भी दृढ़ निश्चय करना चाहिए। वे कहते हैं कि इस त्याग के विषय में मेरा निश्चय सुनो। यह मात्र एक मत नहीं, परम गुरु का सुविचारित निर्णय है।
त्याग के तीन प्रकार
श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि त्याग त्रिविध है। गीता में सत्त्व, रज और तम तीनों गुणों का विस्तार से वर्णन हुआ है, और यहाँ वही सिद्धांत त्याग पर लागू होता है। अर्थात त्याग का मूल्य इस बात से नहीं तय होता कि कुछ छोड़ा गया या नहीं, बल्कि इस बात से तय होता है कि किस भाव से छोड़ा गया।
गुणों के आधार पर परीक्षा
यही दृष्टि हमारे जीवन में भी काम आती है। एक ही बाहरी कृत्य, जैसे किसी काम से हट जाना, तीन अलग-अलग भावों से हो सकता है। कोई आलस्य और भ्रम से छोड़ता है, कोई कष्ट के भय से छोड़ता है, और कोई कर्तव्य समझकर आसक्ति त्यागता है। बाहर से तीनों एक जैसे दिखते हैं, पर भीतर की अवस्था में आकाश-पाताल का अंतर है।
संबोधनों की शिक्षा
श्रीकृष्ण अर्जुन को भरतवंश का श्रेष्ठ और पुरुषों में सिंह कहकर पुकारते हैं। इसके पीछे एक सूक्ष्म संकेत है कि जिस वीर ने इतने बड़े युद्ध के लिए स्वयं को तैयार किया, उसे अब अपने मन के संकोच से भी ऊपर उठना है। जब गुरु शिष्य को उसकी श्रेष्ठता का स्मरण कराते हैं, तब शिष्य में आत्मविश्वास जागता है और वह गूढ़ बात को ग्रहण करने के योग्य बनता है।
निश्चय का महत्त्व
गीता के इस अध्याय में बार-बार निश्चय, मति और बुद्धि शब्द आते हैं। उलझन का समाधान अंततः निश्चयात्मक बुद्धि से ही होता है। जब तक मन में संशय है, तब तक कर्म भी डगमगाता है। इसलिए श्रीकृष्ण पहले सिद्धांत को निश्चित रूप में रखते हैं और फिर उसके भेद बताते हैं।
हमारे जीवन के लिए संदेश
हम अपने त्याग, अपनी आदतों, अपने निर्णयों की ईमानदारी से जाँच कर सकते हैं। हमने कोई काम क्यों छोड़ा? क्या हम थक गए, डर गए, या सचमुच विवेक से आगे बढ़े? यह आत्म-निरीक्षण ही आध्यात्मिक प्रगति की पहली सीढ़ी है।
आगे का विषय
त्याग के तीन भेद बताने की प्रतिज्ञा हो चुकी है, परंतु उनसे पहले श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि कौन से कर्म किसी भी स्थिति में छोड़ने योग्य नहीं हैं।
इस श्लोक में छिपे संदेश
इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।
सूत्र
ध्यान से सुनना समझ की पहली सीढ़ी है।
स्पष्ट सिद्धान्त मन के संशय को शान्त करता है।
त्याग का मूल्य उसके बाहरी रूप से नहीं, भीतरी भाव से तय होता है।
एक ही कर्म भिन्न भावों के कारण भिन्न फल देता है।
अपने निर्णयों के पीछे का गुण पहचानना ही आत्म-ज्ञान है।
वर्गीकरण का उद्देश्य निर्णय की स्पष्टता है, श्रेष्ठता का अभिमान नहीं।
सच्चा शिष्य गुरु के निश्चय को सुनने के लिए पहले स्वयं को शान्त करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
'निश्चयं शृणु' से भगवान् क्या संकेत देते हैं?
त्याग के तीन प्रकार कौन-से हैं?
'भरतसत्तम' और 'पुरुषव्याघ्र' सम्बोधन क्यों?
त्याग को तीन प्रकार का क्यों कहा गया?
इस श्लोक का एक वाक्य में व्यावहारिक संदेश क्या है?
संबंधित विषय खोजें
इस श्लोक से जुड़े विषयों पर और श्लोक: