दिव्य ज्ञान का अर्थ केवल सूचना या शास्त्रीय जानकारी नहीं, बल्कि वह समझ है जो जीवन और दृष्टिकोण को भीतर से बदल दे। जानकारी हमें बताती है कि क्या है, पर दिव्य ज्ञान हमें अपने स्वरूप, परम सत्य और जीवन के उद्देश्य से जोड़ता है। इसीलिए बहुत जानने वाला भी बेचैन रह सकता है, और जिसने सत्य को सचमुच समझा हो, वह शांत रहता है।
गीता 4.38 ज्ञान को संसार का सर्वोच्च शुद्धिकारक कहती है, और गीता 4.37 में ज्ञानाग्नि संचित कर्मबंधनों और अज्ञानजनित बंधनों को नष्ट कर देती है। गीता 4.36 बताती है कि सच्चा ज्ञान अतीत की भूलों से ऊपर उठाकर मुक्ति की दिशा में ले जा सकता है, और गीता 5.16 के अनुसार जब अज्ञान नष्ट होता है, तब ज्ञान सूर्य के समान आत्मा और परम सत्य का प्रकाश प्रकट कर देता है।
ज्ञान पाने का मार्ग भी गीता में है। गीता 4.34 योग्य गुरु से विनम्रता, सेवा और जिज्ञासापूर्ण प्रश्नों द्वारा सीखने को कहती है, और गीता 4.39 में श्रद्धा, तत्परता और इन्द्रिय-संयम ज्ञान तथा परम शांति तक पहुँचाते हैं। गीता 11.8 बताती है कि परमात्मा का दर्शन सामान्य इन्द्रियों और बुद्धि से नहीं, भगवान् की दी हुई दिव्य दृष्टि की कृपा से होता है, और गीता 18.63 पूरी तरह विचारकर अपने विवेक से निर्णय लेने की स्वतंत्रता देती है।