भगवद्गीता 10.11 — ज्ञानदीप से अज्ञान-अन्धकार का नाश
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः ।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥ १०.११ ॥
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उन भक्तों पर कृपा करने के लिए ही मैं उनके हृदय में स्थित होकर प्रकाशमान ज्ञान-दीपक से अज्ञान से उत्पन्न अन्धकार को नष्ट कर देता हूँ।
पदच्छेद
संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।
शब्दार्थ
| पंक्ति 1 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| तेषाम् | उन भक्तों पर |
| एव | ही |
| अनुकम्पार्थम् | दया करने के लिए |
| अहम् | मैं |
| अज्ञानजम् | अज्ञान से उत्पन्न |
| तमः | अन्धकार |
| पंक्ति 2 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| नाशयामि | नष्ट कर देता हूँ |
| आत्मभावस्थः | उनके हृदय में स्थित होकर |
| ज्ञानदीपेन | ज्ञान के दीपक से |
| भास्वता | प्रकाशमान |
| पंक्ति 1 | पंक्ति 2 | ||
|---|---|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ | संस्कृत शब्द | अर्थ |
| तेषाम् | उन भक्तों पर | नाशयामि | नष्ट कर देता हूँ |
| एव | ही | आत्मभावस्थः | उनके हृदय में स्थित होकर |
| अनुकम्पार्थम् | दया करने के लिए | ज्ञानदीपेन | ज्ञान के दीपक से |
| अहम् | मैं | भास्वता | प्रकाशमान |
| अज्ञानजम् | अज्ञान से उत्पन्न | ||
| तमः | अन्धकार | ||
विस्तृत विवरण
परिचय
पिछले श्लोक में बुद्धियोग का वरदान बताया गया था. इस श्लोक में भगवान उसी कृपा को और स्पष्ट करते हैं और बताते हैं कि वे भक्तों के हृदय में स्थित होकर ज्ञान के दीपक से अज्ञान का अंधकार नष्ट कर देते हैं.
भावार्थ
ज्ञान के दीपक से अंधकार का नाश
यह श्लोक भगवान की करुणा का अत्यंत सुंदर चित्र प्रस्तुत करता है. अज्ञान को अंधकार और ज्ञान को दीपक कहकर भगवान एक सरल उपमा से गहरी बात समझाते हैं.
तेषामेवानुकम्पार्थम् — उन पर करुणा करने के लिए: भगवान का यह कार्य किसी आवश्यकता से नहीं, केवल करुणा से प्रेरित है. वे अपने भक्तों पर दया करके स्वयं यह कृपा करते हैं.
अज्ञानजं तमः — अज्ञान से उत्पन्न अंधकार: यह अंधकार बाहर नहीं, भीतर है. यह वह भ्रम है जिसमें हम स्वयं को शरीर मानते हैं, क्षणिक वस्तुओं को स्थायी मानते हैं और परमात्मा से अलगाव का अनुभव करते हैं. यही हमारे अनेक दुःखों का मूल है.
आत्मभावस्थः — हृदय में स्थित होकर: भगवान कहते हैं कि वे साधक के अंतःकरण में ही स्थित होकर यह कार्य करते हैं. परमात्मा कहीं दूर नहीं, भीतर ही उपस्थित हैं और भीतर से ही प्रकाश देते हैं.
ज्ञानदीपेन भास्वता — चमकते हुए ज्ञान के दीपक से: अंधकार को लड़कर नहीं भगाया जाता, प्रकाश लाने से वह स्वयं मिट जाता है. उसी प्रकार अज्ञान से संघर्ष करने की अपेक्षा ज्ञान का दीप जलना ही उसका समाधान है. दीपक की विशेषता यह है कि उसके आते ही अंधकार का कोई अस्तित्व नहीं रहता.
नाशयामि — मैं नष्ट कर देता हूँ: यह कृपा भगवान की ओर से है. साधक का कार्य है समर्पण, प्रेम और निरंतर स्मरण, और अज्ञान का नाश करने की सामर्थ्य भगवान की कृपा से मिलती है.
हमारे जीवन के लिए संदेश
अपने भीतर की रोशनी पर भरोसा: जब जीवन में भ्रम और निराशा का अंधकार हो, तब यह स्मरण रखना चाहिए कि प्रकाश का स्रोत हमारे भीतर ही है.
समस्या की जड़ अज्ञान में: हमारे कई संघर्ष परिस्थितियों से अधिक हमारी गलत समझ से पैदा होते हैं. सही समझ विकसित होने पर वही परिस्थितियाँ बोझ नहीं लगतीं.
सीखना और समर्पण साथ-साथ: ज्ञान पाने के लिए प्रयास आवश्यक है और उसके साथ विनम्रता तथा समर्पण भी. जब दोनों साथ हों तो भीतर समझ का प्रकाश बढ़ता है.
ज्ञान के दीपक से अंधकार का नाश
यह श्लोक भगवान की करुणा का अत्यंत सुंदर चित्र प्रस्तुत करता है. अज्ञान को अंधकार और ज्ञान को दीपक कहकर भगवान एक सरल उपमा से गहरी बात समझाते हैं.
तेषामेवानुकम्पार्थम् — उन पर करुणा करने के लिए: भगवान का यह कार्य किसी आवश्यकता से नहीं, केवल करुणा से प्रेरित है. वे अपने भक्तों पर दया करके स्वयं यह कृपा करते हैं.
अज्ञानजं तमः — अज्ञान से उत्पन्न अंधकार: यह अंधकार बाहर नहीं, भीतर है. यह वह भ्रम है जिसमें हम स्वयं को शरीर मानते हैं, क्षणिक वस्तुओं को स्थायी मानते हैं और परमात्मा से अलगाव का अनुभव करते हैं. यही हमारे अनेक दुःखों का मूल है.
आत्मभावस्थः — हृदय में स्थित होकर: भगवान कहते हैं कि वे साधक के अंतःकरण में ही स्थित होकर यह कार्य करते हैं. परमात्मा कहीं दूर नहीं, भीतर ही उपस्थित हैं और भीतर से ही प्रकाश देते हैं.
ज्ञानदीपेन भास्वता — चमकते हुए ज्ञान के दीपक से: अंधकार को लड़कर नहीं भगाया जाता, प्रकाश लाने से वह स्वयं मिट जाता है. उसी प्रकार अज्ञान से संघर्ष करने की अपेक्षा ज्ञान का दीप जलना ही उसका समाधान है. दीपक की विशेषता यह है कि उसके आते ही अंधकार का कोई अस्तित्व नहीं रहता.
नाशयामि — मैं नष्ट कर देता हूँ: यह कृपा भगवान की ओर से है. साधक का कार्य है समर्पण, प्रेम और निरंतर स्मरण, और अज्ञान का नाश करने की सामर्थ्य भगवान की कृपा से मिलती है.
हमारे जीवन के लिए संदेश
अपने भीतर की रोशनी पर भरोसा: जब जीवन में भ्रम और निराशा का अंधकार हो, तब यह स्मरण रखना चाहिए कि प्रकाश का स्रोत हमारे भीतर ही है.
समस्या की जड़ अज्ञान में: हमारे कई संघर्ष परिस्थितियों से अधिक हमारी गलत समझ से पैदा होते हैं. सही समझ विकसित होने पर वही परिस्थितियाँ बोझ नहीं लगतीं.
सीखना और समर्पण साथ-साथ: ज्ञान पाने के लिए प्रयास आवश्यक है और उसके साथ विनम्रता तथा समर्पण भी. जब दोनों साथ हों तो भीतर समझ का प्रकाश बढ़ता है.
आगे का विषय
भगवान ने अपनी कृपा का वचन देकर भक्तों के प्रति अपना स्नेह स्पष्ट कर दिया. अब अर्जुन इस पूरे उपदेश को सुनकर अत्यंत भावविभोर हो जाता है. अगले श्लोक से वह भगवान के स्वरूप की स्तुति और अपनी श्रद्धा प्रकट करना आरंभ करता है.
इस श्लोक में छिपे संदेश
इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।
सूत्र
जैसे दीपक अँधेरा हटाता है, वैसे ज्ञान अज्ञान को हटाता है।
ईश्वर की कृपा भक्त के हृदय में प्रकाश बनकर उतरती है।
दुःख का मूल बाहर नहीं, भीतर के अज्ञान में है।
जो हृदय में बैठा है, वही भीतर का अन्धकार हटाता है।
सच्चा ज्ञान स्वयं प्रकाशमान होता है, उसे बाहर से सिद्ध नहीं करना पड़ता।
प्रेम से जुड़ा हृदय ज्ञान का पात्र बनता है।
अज्ञान मिटते ही मन का बन्धन ढीला पड़ने लगता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
'अज्ञानजं तमः' का क्या अर्थ है?
'आत्मभावस्थः' का क्या अर्थ है?
'ज्ञानदीप' से क्या तात्पर्य है?
भगवान् ने यह कार्य किस कारण से करने की बात कही?
इस श्लोक का एक वाक्य में व्यावहारिक संदेश क्या है?
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