आत्मसाक्षात्कार का अर्थ है स्वयं को शरीर, पद, भूमिका और विचारों से अलग, अपने वास्तविक स्वरूप में पहचानना। यह कोई रहस्यमय घटना नहीं, बल्कि समझ और अनुभव की गहराई है, जिसमें व्यक्ति परिस्थितियों से कम हिलता है और भीतर का संतोष बढ़ता है। इस मार्ग में शुरुआत अक्सर कठिन लगती है, पर निरंतर अभ्यास से भीतर की शांति स्थिर होने लगती है।
गीता 13.35 कहती है कि जो ज्ञान-नेत्र से क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का भेद तथा प्रकृति के बंधन से मुक्त होने की विधि जान लेते हैं, वे परम को प्राप्त होते हैं, और गीता 13.24 के अनुसार पुरुष को प्रकृति और गुणों के साथ तत्त्व से जानने वाला पुनः जन्म नहीं लेता। इसे केवल पढ़कर नहीं, दैनिक अनुभव में बार-बार पहचानना चाहिए। गीता 6.20 और 6.22 में योगाभ्यास से शांत चित्त आत्मा में तुष्ट होता है और बाहरी दुःखों से विचलित नहीं होता।
गीता 6.21 इन्द्रियों से परे शुद्ध बुद्धि से अनुभव होने वाले परम आनंद की बात करती है, और गीता 4.35 के अनुसार ज्ञान से मोह मिटकर सबमें एकत्व का दर्शन होता है। गीता 18.37 सात्त्विक सुख को आरंभ में विष-सा और अंत में अमृत-सा बताती है, इसलिए आरंभिक कठिनाई के कारण अनुशासन, साधना और संयम न छोड़ें। गीता 2.69 संयमी की दृष्टि संसार की दृष्टि से भिन्न बताती है।