भगवद्गीता 10.32 — सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त में भगवान्; विद्याओं में अध्यात्मविद्या
सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन ।
अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम् ॥ १०.३२ ॥
🔊 इस श्लोक का अर्थ सुनें
Current voice: —
Ready
Text-to-speech is not supported by this browser.
हे अर्जुन! मैं ही सब सृष्टियों का आदि, मध्य और अन्त हूँ। विद्याओं में मैं अध्यात्मविद्या हूँ और तर्क करने वालों में तत्त्व-निर्णय करने वाला वाद हूँ।
पदच्छेद
संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।
शब्दार्थ
| पंक्ति 1 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| सर्गाणाम् | सृष्टियों का |
| आदिः | आरम्भ |
| अन्तः | अन्त |
| च | और |
| मध्यम् | मध्य |
| च | और |
| एव | ही |
| अहम् | मैं |
| अर्जुन | हे अर्जुन |
| पंक्ति 2 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| अध्यात्मविद्या | आत्मा-परमात्मा का ज्ञान |
| विद्यानाम् | विद्याओं में |
| वादः | तत्त्व-निर्णय हेतु तर्क-वाद |
| प्रवदताम् | तर्क करने वालों में |
| अहम् | मैं |
| पंक्ति 1 | पंक्ति 2 | ||
|---|---|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ | संस्कृत शब्द | अर्थ |
| सर्गाणाम् | सृष्टियों का | अध्यात्मविद्या | आत्मा-परमात्मा का ज्ञान |
| आदिः | आरम्भ | विद्यानाम् | विद्याओं में |
| अन्तः | अन्त | वादः | तत्त्व-निर्णय हेतु तर्क-वाद |
| च | और | प्रवदताम् | तर्क करने वालों में |
| मध्यम् | मध्य | अहम् | मैं |
| च | और | ||
| एव | ही | ||
| अहम् | मैं | ||
| अर्जुन | हे अर्जुन | ||
विस्तृत विवरण
परिचय
पिछले श्लोक में प्रवाह और पराक्रम की विभूतियाँ बताई गईं. इस श्लोक में भगवान एक बार फिर सृष्टि के आदि, मध्य और अंत की बात करते हैं और विद्या तथा संवाद के क्षेत्र में अपनी विभूति बताते हैं.
भावार्थ
सृष्टि का आधार और ज्ञान की श्रेष्ठता
यह श्लोक दो अलग-अलग बातों को जोड़ता है. पहली बात पूरी सृष्टि के आधार से जुड़ी है और दूसरी ज्ञान के क्षेत्र में सर्वोच्च रूप से.
सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहम् — सृष्टियों का आदि, मध्य और अंत: सृष्टि की उत्पत्ति, उसकी स्थिति और उसका लय, तीनों के मूल में भगवान हैं. बीसवें श्लोक में यही बात प्राणियों के संदर्भ में कही गई थी, और यहाँ उसे समस्त सृष्टि पर लागू किया गया है.
अध्यात्मविद्या विद्यानाम् — विद्याओं में अध्यात्मविद्या: संसार में अनेक विद्याएँ हैं, जैसे कला, विज्ञान और शास्त्र. पर जो विद्या आत्मा और परमात्मा का बोध कराती है, वह सबसे श्रेष्ठ है, क्योंकि वह अज्ञान की जड़ को काटती है और मुक्ति का मार्ग दिखाती है. अन्य विद्याएँ जीवन को सुविधाजनक बनाती हैं, जबकि अध्यात्मविद्या जीवन का अर्थ और उद्देश्य समझाती है.
वादः प्रवदताम् — तर्क करने वालों में वाद: विवाद के अनेक रूप हैं. जल्प और वितंडा में केवल जीतने की इच्छा होती है, जबकि वाद में सत्य को खोजने की सच्ची भावना होती है. भगवान इस सत्य-अन्वेषी संवाद को अपनी विभूति बताते हैं. जब चर्चा का उद्देश्य अहंकार को संतुष्ट करना नहीं, बल्कि सत्य तक पहुँचना हो, तब वह साधना बन जाती है.
हमारे जीवन के लिए संदेश
ज्ञान की प्राथमिकता: जीवन में प्रोफेशनल ज्ञान आवश्यक है, पर अपने भीतर के सत्य को जानने की खोज भी उतनी ही आवश्यक है.
संवाद की शुद्धता: जब हम किसी से चर्चा करें, तब अपना पक्ष जिताने के स्थान पर सत्य को समझने की इच्छा रखें.
जीवन के हर चरण में ईश्वर: जन्म, जीवन और अंत में एक ही सत्ता का आश्रय मानने से हमारा मन स्थिर रहता है.
सृष्टि का आधार और ज्ञान की श्रेष्ठता
यह श्लोक दो अलग-अलग बातों को जोड़ता है. पहली बात पूरी सृष्टि के आधार से जुड़ी है और दूसरी ज्ञान के क्षेत्र में सर्वोच्च रूप से.
सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहम् — सृष्टियों का आदि, मध्य और अंत: सृष्टि की उत्पत्ति, उसकी स्थिति और उसका लय, तीनों के मूल में भगवान हैं. बीसवें श्लोक में यही बात प्राणियों के संदर्भ में कही गई थी, और यहाँ उसे समस्त सृष्टि पर लागू किया गया है.
अध्यात्मविद्या विद्यानाम् — विद्याओं में अध्यात्मविद्या: संसार में अनेक विद्याएँ हैं, जैसे कला, विज्ञान और शास्त्र. पर जो विद्या आत्मा और परमात्मा का बोध कराती है, वह सबसे श्रेष्ठ है, क्योंकि वह अज्ञान की जड़ को काटती है और मुक्ति का मार्ग दिखाती है. अन्य विद्याएँ जीवन को सुविधाजनक बनाती हैं, जबकि अध्यात्मविद्या जीवन का अर्थ और उद्देश्य समझाती है.
वादः प्रवदताम् — तर्क करने वालों में वाद: विवाद के अनेक रूप हैं. जल्प और वितंडा में केवल जीतने की इच्छा होती है, जबकि वाद में सत्य को खोजने की सच्ची भावना होती है. भगवान इस सत्य-अन्वेषी संवाद को अपनी विभूति बताते हैं. जब चर्चा का उद्देश्य अहंकार को संतुष्ट करना नहीं, बल्कि सत्य तक पहुँचना हो, तब वह साधना बन जाती है.
हमारे जीवन के लिए संदेश
ज्ञान की प्राथमिकता: जीवन में प्रोफेशनल ज्ञान आवश्यक है, पर अपने भीतर के सत्य को जानने की खोज भी उतनी ही आवश्यक है.
संवाद की शुद्धता: जब हम किसी से चर्चा करें, तब अपना पक्ष जिताने के स्थान पर सत्य को समझने की इच्छा रखें.
जीवन के हर चरण में ईश्वर: जन्म, जीवन और अंत में एक ही सत्ता का आश्रय मानने से हमारा मन स्थिर रहता है.
आगे का विषय
भगवान ने अध्यात्मविद्या और सत्य-अन्वेषी वाद में अपनी विभूति बताई. अब वे भाषा, काल और सृष्टि करने वाली शक्ति में अपनी उपस्थिति का वर्णन करते हैं.
इस श्लोक में छिपे संदेश
इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।
सूत्र
जो आरम्भ, मध्य और अन्त में समान रूप से विद्यमान है, वही सबका आधार है।
सब विद्याओं में वही विद्या श्रेष्ठ है जो स्वयं को जानना सिखाए।
वह तर्क श्रेष्ठ है जो सत्य तक पहुँचाए, जीत तक नहीं।
खुला और ईमानदार संवाद ज्ञान की ओर ले जाता है।
हर आरम्भ और अन्त के पीछे एक ही सत्ता है।
तर्क के साथ विवेक हो तभी वह सार्थक है।
बाहर की विद्या से पहले भीतर की विद्या आवश्यक है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
'सर्गाणाम् आदिः अन्तश्च मध्यं च' का क्या अर्थ है?
'अध्यात्मविद्या' क्या है?
'वादः' का क्या अर्थ है?
क्या तर्क को भी विभूति कहा गया है?
इस श्लोक का एक वाक्य में व्यावहारिक संदेश क्या है?
संबंधित विषय खोजें
इस श्लोक से जुड़े विषयों पर और श्लोक: