विद्यार्थी जीवन पर भगवद्गीता

43 श्लोक, अर्थ और जीवन में उपयोग सहित

विद्यार्थी जीवन के बारे में भगवद्गीता क्या सिखाती है 43 श्लोक, अर्थ और व्यावहारिक मार्गदर्शन सहित।

विद्यार्थी जीवन में पढ़ाई, परीक्षा, करियर की चिंता, दोस्तों से तुलना और भविष्य की अनिश्चितता एक साथ चलती हैं। कभी मन पढ़ाई में नहीं लगता, कभी जो पढ़ा वह याद नहीं रहता, और कभी लगता है कि दूसरे आगे निकल गए हैं। ऐसे समय में केवल अंक या डिग्री नहीं, सीखने का सही ढंग और सही भाव अधिक काम आता है।

गीता 5.16 कहती है कि ज्ञान अज्ञान को सूर्य की तरह मिटा देता है, इसलिए निरंतर अध्ययन और चिंतन से अपने भ्रमों को दूर करना चाहिए। गीता 18.72 में भगवान् अर्जुन से पूछते हैं कि क्या उन्होंने एकाग्र चित्त से सुना और क्या उनका मोह दूर हुआ, जो बताता है कि सीखने की कसौटी भ्रम का मिटना है। गीता 10.32 में सब विद्याओं में अध्यात्मविद्या को श्रेष्ठ कहा गया है।

गीता 3.32 चेताती है कि दोष-दृष्टि से सही मार्गदर्शन ठुकराने वाला अपने ही कल्याण से वंचित रहता है, इसलिए सुझावों को खुले मन से परखें। गीता 18.67 कहती है कि ज्ञान वहीं फलता है जहाँ अनुशासन, विनम्रता, श्रद्धा और सुनने की इच्छा हो। गीता 5.4 और 5.5 मार्गों के भेद में उलझने के बजाय उनके साझा लक्ष्य को समझने को कहती हैं, और गीता 13.26 में जो अभी स्वयं नहीं जानते, वे भी श्रद्धा से सुनकर आगे बढ़ सकते हैं।

इन श्लोकों से शुरू करें

सभी 43 श्लोक

18.63

आध्यात्मिक ज्ञान

गोपनीय से भी अधिक गोपनीय ज्ञान बताकर भगवान् अर्जुन को पूर्ण विचार कर स्वयं निर्णय लेने की स्वतंत्रता देते हैं

पूरी तरह विचारो, फिर जैसा चाहो वैसा करो: यही सच्चा ज्ञानयुक्त निर्णय है।

गीता में कहाँ

संबंधित विषय

जीवन-क्षेत्र

आधुनिक संदर्भ

गुण

विषय

चुनौतियाँ

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

विद्यार्थी जीवन में पढ़ाई का सही भाव क्या होना चाहिए?
जिज्ञासा, विनम्रता और एकाग्रता का भाव। गीता 18.67 के अनुसार ज्ञान वहीं फलता है जहाँ अनुशासन, श्रद्धा, सुनने की इच्छा और विनम्रता हो। पढ़ाई को केवल अंक पाने का साधन न मानकर अपने भ्रमों को दूर करने और समझ बढ़ाने का अवसर मानें, तब सीखना बोझ नहीं, प्रकाश बनता है।
गीता 5.16 में ज्ञान को सूर्य क्यों कहा गया है?
गीता 5.16 के अनुसार जब अज्ञान नष्ट होता है, तब ज्ञान सूर्य के समान आत्मा और परम सत्य का प्रकाश प्रकट कर देता है। जैसे सूर्य उगते ही अंधकार छँट जाता है, वैसे ही निरंतर अध्ययन, चिंतन और साधना से जीवन के भ्रम दूर होते हैं। इसलिए सीखना एक सतत प्रक्रिया है।
गीता 18.72 के अनुसार सीखने की सच्ची कसौटी क्या है?
गीता 18.72 में भगवान् अर्जुन से पूछते हैं कि क्या तुमने एकाग्र चित्त से सुना और क्या अज्ञान से उपजा मोह दूर हुआ। इसका संकेत है कि ज्ञान की कसौटी याद करने की मात्रा नहीं, भ्रम और मोह का मिटना है। हर सीख के बाद स्वयं से यही पूछना उपयोगी है।
गीता 3.32 के अनुसार शिक्षकों और बड़ों की सलाह को कैसे लें?
गीता 3.32 कहती है कि ईर्ष्या और अहंकार के कारण सही मार्गदर्शन में दोष देखने वाला अपने ही कल्याण से वंचित रह जाता है। इसलिए हर सुझाव को आलोचना की नज़र से देखने के बजाय उसमें छिपे सत्य को खुले मन से परखें। दोष-दृष्टि सीखने का द्वार बंद कर देती है।
अगर कोई विषय अभी बिल्कुल समझ न आए तो क्या करें?
निराश न हों और श्रद्धा से सुनना-सीखना जारी रखें। गीता 13.26 में जो लोग स्वयं तत्त्व नहीं जानते, वे भी तत्त्वज्ञ पुरुषों या शास्त्र से श्रद्धापूर्वक सुनकर आगे बढ़ सकते हैं। यानी समझ धीरे-धीरे आती है; योग्य शिक्षक से पूछें, ध्यान से सुनें और जो सीखें उसे अभ्यास में उतारें।

एक्सप्लोरर में फ़िल्टर करें

भगवद्गीता खोजें

← जीवन-क्षेत्र