अध्याय 14 गुणत्रय विभाग योग

27 श्लोक

हमारे विचार, भावनाएँ और व्यवहार इतने परिवर्तनशील क्यों होते हैं? इस अध्याय में श्रीकृष्ण बताते हैं कि सम्पूर्ण प्रकृति और मानव व्यक्तित्व तीन गुणों—सत्त्व, रजस् और तमस्—से प्रभावित होते हैं। इस अध्याय से हमें यह समझने को मिलता है कि ये गुण हमारे स्वभाव, आदतों, संबंधों और निर्णयों को कैसे प्रभावित करते हैं। इन गुणों की कार्यप्रणाली को पहचानकर और सत्त्व को विकसित करके अधिक संतुलित, शांत और उद्देश्यपूर्ण जीवन की ओर बढ़ा जा सकता है।

श्लोक सूची

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श्लोक 1 ज्ञानों में सर्वोत्तम ज्ञान और परम सिद्धि का मार्ग श्रीभगवानुवाच । परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् । यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः ॥ १४.१ ॥ श्रीभगवान् ने कहा—मैं तुम्हें फिर से वह परम ज्ञान बताऊँगा, जो सब ज्ञानों में सर्वोत्तम है। उसे जानकर सभी मननशील मुनि इस संसार-बन्धन से मुक्त होकर परम सिद्धि को प्राप्त हो गए। → श्लोक 2 ज्ञान का आश्रय: भगवत्-साधर्म्य और जन्म-मरण से मुक्ति इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः । सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥ १४.२ ॥ इस ज्ञान का आश्रय लेकर जो मनुष्य मेरे स्वरूप की समानता को प्राप्त हो जाते हैं, वे सृष्टि के आरम्भ में फिर जन्म नहीं लेते और प्रलय के समय भी व्याकुल नहीं होते। → श्लोक 3 महद्ब्रह्म: प्रकृति रूपी योनि और परमात्मा रूपी बीजदाता मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम् । सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥ १४.३ ॥ हे भारत! महद्ब्रह्म अर्थात् मूल प्रकृति मेरी योनि है, मैं उसमें चेतन रूप गर्भ का आधान करता हूँ। उसी संयोग से सम्पूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति होती है। → श्लोक 4 सब योनियों की माता प्रकृति और बीजदाता पिता परमात्मा सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः । तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥ १४.४ ॥ हे कौन्तेय! सभी योनियों में जितने भी शरीर उत्पन्न होते हैं, उन सबकी योनि अर्थात् माता महद्ब्रह्म (मूल प्रकृति) है और उनमें बीज स्थापित करने वाला पिता मैं हूँ। → श्लोक 5 सत्त्व, रज और तम: प्रकृति के तीन गुण जो आत्मा को बाँधते हैं सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः । निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥ १४.५ ॥ हे महाबाहो! सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण प्रकृति से उत्पन्न होते हैं। ये अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बाँध देते हैं। → श्लोक 6 सत्त्वगुण: निर्मल प्रकाश, पर सुख और ज्ञान की आसक्ति तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् । सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ ॥ १४.६ ॥ हे निष्पाप अर्जुन! उन तीनों गुणों में सत्त्वगुण निर्मल होने के कारण प्रकाश करने वाला और विकार-रहित है। वह सुख की आसक्ति और ज्ञान की आसक्ति से जीव को बाँधता है। → श्लोक 7 रजोगुण: राग, तृष्णा और कर्म की आसक्ति रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् । तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् ॥ १४.७ ॥ हे कौन्तेय! रजोगुण को राग-स्वरूप जानो। वह तृष्णा और आसक्ति से उत्पन्न होता है। वह देहधारी जीव को कर्मों की आसक्ति से बाँध देता है। → श्लोक 8 तमोगुण: अज्ञान से उत्पन्न मोह, प्रमाद, आलस्य और निद्रा तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् । प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ॥ १४.८ ॥ हे भारत! तमोगुण को अज्ञान से उत्पन्न और सब देहधारियों को मोहित करने वाला जानो। वह प्रमाद, आलस्य और निद्रा के द्वारा जीव को बाँधता है। → श्लोक 9 तीन गुण कैसे जोड़ते हैं: सुख, कर्म और प्रमाद में सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत । ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत ॥ १४.९ ॥ हे भारत! सत्त्वगुण मनुष्य को सुख में लगाता है, रजोगुण कर्म में लगाता है और तमोगुण ज्ञान को ढककर प्रमाद में लगा देता है। → श्लोक 10 गुणों का उतार-चढ़ाव: एक दबकर दूसरा प्रबल होता है रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत । रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥ १४.१० ॥ हे भारत! रज और तम को दबाकर सत्त्वगुण बढ़ता है; सत्त्व और तम को दबाकर रजोगुण बढ़ता है; और सत्त्व तथा रज को दबाकर तमोगुण बढ़ता है। → श्लोक 11 सत्त्वगुण की वृद्धि के लक्षण: सभी द्वारों में ज्ञान-प्रकाश सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते । ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत ॥ १४.११ ॥ जब इस शरीर के सभी द्वारों—इन्द्रियों और अन्तःकरण—में प्रकाश और ज्ञान उत्पन्न होता है, तब जानना चाहिए कि सत्त्वगुण बढ़ा हुआ है। → श्लोक 12 रजोगुण की वृद्धि के लक्षण: लोभ, प्रवृत्ति, आरम्भ, अशान्ति और स्पृहा लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा । रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ॥ १४.१२ ॥ हे भरतश्रेष्ठ! रजोगुण के बढ़ने पर लोभ, कर्मों में प्रवृत्ति, नये-नये कर्मों का आरम्भ, अशान्ति और विषयों की तीव्र इच्छा—ये लक्षण उत्पन्न होते हैं। → श्लोक 13 तमोगुण की वृद्धि के लक्षण: अप्रकाश, अप्रवृत्ति, प्रमाद और मोह अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च । तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन ॥ १४.१३ ॥ हे कुरुनन्दन! तमोगुण के बढ़ने पर अप्रकाश (विवेक का अभाव), अप्रवृत्ति (कर्म में अरुचि), प्रमाद (असावधानी) और मोह (भ्रम)—ये लक्षण उत्पन्न होते हैं। → श्लोक 14 सत्त्वगुण में मृत्यु होने पर निर्मल उत्तम लोकों की प्राप्ति यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् । तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते ॥ १४.१४ ॥ जब सत्त्वगुण के बढ़े रहने की अवस्था में देहधारी की मृत्यु होती है, तब वह उत्तम तत्त्व जानने वालों के निर्मल लोकों को प्राप्त होता है। → श्लोक 15 गुणों के अनुसार मृत्यु के बाद की गति: कर्मासक्त या मूढ़ योनि रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते । तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते ॥ १४.१५ ॥ रजोगुण के बढ़े रहने पर मृत्यु को प्राप्त हुआ मनुष्य कर्मों में आसक्त लोगों में जन्म लेता है। इसी प्रकार तमोगुण के बढ़े रहने पर मरा हुआ मनुष्य मूढ़ योनियों में जन्म लेता है। → श्लोक 16 तीनों गुणों के कर्म-फल: निर्मलता, दुःख और अज्ञान कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् । रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम् ॥ १४.१६ ॥ ज्ञानीजन कहते हैं कि शुभ और श्रेष्ठ कर्म का फल सात्त्विक और निर्मल होता है। रजोगुण का फल दुःख है और तमोगुण का फल अज्ञान है। → श्लोक 17 गुणों से उत्पन्न होने वाले भाव: ज्ञान, लोभ, प्रमाद और मोह सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च । प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥ १४.१७ ॥ सत्त्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है, रजोगुण से लोभ उत्पन्न होता है और तमोगुण से प्रमाद, मोह और अज्ञान उत्पन्न होते हैं। → श्लोक 18 गुणों के अनुसार गति: ऊपर, मध्य और नीचे ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः । जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥ १४.१८ ॥ सत्त्वगुण में स्थित मनुष्य ऊपर के लोकों में जाते हैं, रजोगुण वाले मध्य में अर्थात् मनुष्यलोक में रहते हैं और निकृष्ट तमोगुण की वृत्ति में स्थित मनुष्य नीचे की गति को प्राप्त होते हैं। → श्लोक 19 गुणों को ही कर्ता देखने वाला द्रष्टा परमात्म-भाव को प्राप्त होता है नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति । गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥ १४.१९ ॥ जब द्रष्टा गुणों के अतिरिक्त किसी अन्य को कर्ता नहीं देखता और गुणों से परे परमात्मा को जान लेता है, तब वह मेरे स्वरूप को प्राप्त हो जाता है। → श्लोक 20 गुणों का अतिक्रमण करने से जन्म, मृत्यु, जरा और दुःख से मुक्ति गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् । जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥ १४.२० ॥ देहधारी जीव शरीर की उत्पत्ति के कारण बने इन तीनों गुणों को पार करके जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे और दुःखों से मुक्त हो जाता है और अमृतत्व को प्राप्त करता है। → श्लोक 21 अर्जुन का प्रश्न: गुणातीत के लक्षण, आचरण और उपाय अर्जुन उवाच । कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो । किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते ॥ १४.२१ ॥ अर्जुन ने कहा—हे प्रभो! मनुष्य इन तीनों गुणों से परे गया है, इसकी पहचान किन लक्षणों से होती है? उसका आचरण कैसा होता है? और वह इन तीनों गुणों को किस उपाय से पार करता है? → श्लोक 22 गुणातीत के लक्षण (१): प्रवृत्त और निवृत्त गुणों में राग-द्वेष का अभाव श्रीभगवानुवाच । प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव । न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥ १४.२२ ॥ श्रीभगवान् ने कहा—हे पाण्डव! जो मनुष्य सत्त्वगुण के प्रकाश, रजोगुण की प्रवृत्ति और तमोगुण के मोह के उत्पन्न होने पर उनसे द्वेष नहीं करता और उनके निवृत्त हो जाने पर उनकी इच्छा नहीं करता, वह गुणातीत है। → श्लोक 23 गुणातीत के लक्षण (२): उदासीन भाव से स्थित और अविचलित उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते । गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते ॥ १४.२३ ॥ जो उदासीन की भाँति स्थित रहता है, गुणों से विचलित नहीं होता और 'गुण ही गुणों में बरत रहे हैं' ऐसा जानकर अपने स्वरूप में स्थित रहता है और विचलित नहीं होता, वही गुणातीत है। → श्लोक 24 गुणातीत के लक्षण (३): सुख-दुःख, स्तुति-निन्दा और प्रिय-अप्रिय में समता समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः । तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥ १४.२४ ॥ जो सुख-दुःख में सम है, अपने स्वरूप में स्थित है, मिट्टी, पत्थर और सोने को समान समझता है, प्रिय और अप्रिय में तुल्य रहता है, धैर्यवान् है तथा निन्दा और अपनी स्तुति में समान रहता है, वह गुणातीत है। → श्लोक 25 गुणातीत के लक्षण (४): मान-अपमान, मित्र-शत्रु में समता और सर्वारम्भ-त्याग मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः । सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥ १४.२५ ॥ जो मान और अपमान में समान रहता है, मित्र और शत्रु के पक्ष में भी समान रहता है और सभी कर्मों के आरम्भ (कर्तापन के अभिमान) का त्यागी है, वह गुणातीत कहा जाता है। → श्लोक 26 अनन्य भक्तियोग: गुणों के अतिक्रमण और ब्रह्मभाव का उपाय मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते । स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ १४.२६ ॥ जो मनुष्य अनन्य भक्तियोग से मेरी सेवा करता है, वह इन तीनों गुणों को पार करके ब्रह्म-भाव को प्राप्त होने के योग्य हो जाता है। → श्लोक 27 ब्रह्म का आधार: अमृत, अव्यय, शाश्वत धर्म और ऐकान्तिक सुख ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च । शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥ १४.२७ ॥ मैं ही ब्रह्म का आधार हूँ। मैं ही अमृत, अविनाशी तत्त्व, शाश्वत धर्म और पूर्ण अखण्ड सुख का भी आश्रय हूँ। →

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