भगवद्गीता 14.23 — गुणातीत के लक्षण (२): उदासीन भाव से स्थित और अविचलित
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते ।
गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते ॥ १४.२३ ॥
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जो उदासीन की भाँति स्थित रहता है, गुणों से विचलित नहीं होता और 'गुण ही गुणों में बरत रहे हैं' ऐसा जानकर अपने स्वरूप में स्थित रहता है और विचलित नहीं होता, वही गुणातीत है।
पदच्छेद
संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।
शब्दार्थ
| पंक्ति 1 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| उदासीनवत् | उदासीन की भाँति, तटस्थ होकर |
| आसीनः | स्थित रहने वाला |
| गुणैः | गुणों से |
| यः | जो |
| न विचाल्यते | विचलित नहीं होता |
| पंक्ति 2 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| गुणाः | गुण ही |
| वर्तन्ते | व्यवहार कर रहे हैं |
| इति एव | ऐसा जानकर |
| यः अवतिष्ठति | जो स्थित रहता है |
| न इङ्गते | विचलित नहीं होता, चेष्टा नहीं करता |
| पंक्ति 1 | पंक्ति 2 | ||
|---|---|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ | संस्कृत शब्द | अर्थ |
| उदासीनवत् | उदासीन की भाँति, तटस्थ होकर | गुणाः | गुण ही |
| आसीनः | स्थित रहने वाला | वर्तन्ते | व्यवहार कर रहे हैं |
| गुणैः | गुणों से | इति एव | ऐसा जानकर |
| यः | जो | यः अवतिष्ठति | जो स्थित रहता है |
| न विचाल्यते | विचलित नहीं होता | न इङ्गते | विचलित नहीं होता, चेष्टा नहीं करता |
विस्तृत विवरण
परिचय
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि गुणातीत पुरुष उदासीन की भाँति स्थित रहता है, गुणों से विचलित नहीं होता, और 'गुण ही अपना कार्य कर रहे हैं' ऐसा जानकर अपने स्थान पर स्थिर रहता है।
भावार्थ
गुणातीत की स्थिति: उदासीन साक्षी
पिछले श्लोक में भगवान ने गुणातीत की अवस्थाओं के प्रति समता बताई। इस श्लोक में वे बताते हैं कि वह इस सबके बीच कैसे स्थित रहता है। यहाँ एक बहुत सुंदर उपमा प्रयोग की गई है।
उदासीनवदासीनः — उदासीन की भाँति स्थित: 'उदासीन' शब्द का अर्थ उदास या निराश नहीं है। इसका अर्थ है 'उत् आसीन', अर्थात ऊपर बैठा हुआ। जैसे कोई न्यायाधीश या दर्शक ऊँचे आसन से घटनाओं को देखता है, पर उनमें उलझता नहीं, वैसे ही गुणातीत अपने भीतर चलते गुणों के खेल को ऊपर से देखता है। उसमें करुणा है, पर पक्षपात नहीं।
गुणैः यो न विचाल्यते — गुणों से विचलित नहीं होता: सत्त्व की खुशी, रजस की बेचैनी और तमस की जड़ता, इन सबके बीच उसका केंद्र नहीं हिलता। परिस्थितियाँ बदलती हैं और मन की अवस्थाएँ बदलती हैं, पर उसका आंतरिक आधार स्थिर रहता है।
गुणा वर्तन्त इत्येव — गुण ही अपना कार्य कर रहे हैं: यह उसकी मूल समझ है। जब क्रोध, इच्छा या आलस्य उठता है, तो वह जानता है कि यह प्रकृति के गुणों का स्वाभाविक खेल है। यह समझ उसे प्रतिक्रिया से बचाती है।
योऽवतिष्ठति नेङ्गते — जो स्थिर रहता है, डिगता नहीं: 'अवतिष्ठति' का अर्थ है अपने स्वरूप में टिका रहना, और 'न इङ्गते' का अर्थ है हिलता नहीं। यह वह अटल अवस्था है जो हर बाहरी और आंतरिक परिवर्तन के बीच भी अविचल रहती है।
गहरे भाव और आंतरिक संदेश
उदासीनता का यह अर्थ नहीं कि व्यक्ति कर्तव्य से विमुख हो जाए। गीता का आदर्श ऐसा व्यक्ति है जो कर्म करता है, पर भीतर से अलिप्त रहता है। उसकी गतिविधि बाहर होती है, पर उसका केंद्र भीतर शांत रहता है। यही कर्मयोग और ज्ञानयोग का संगम है।
हमारे दैनिक जीवन के लिए संदेश
ऊँचे आसन का अभ्यास: जब कोई कठिन परिस्थिति आए, तो एक क्षण के लिए स्वयं को ऊपर से देखने का प्रयास करें, जैसे कोई दूसरा देख रहा हो। इस दूरी से स्पष्टता मिलती है।
कर्तव्य और अलिप्तता: अपने काम को पूरी निष्ठा से करें, पर उसके उतार-चढ़ाव को अपनी पहचान न बनाएँ। यही संतुलन तनाव को कम करता है।
गुणातीत की स्थिति: उदासीन साक्षी
पिछले श्लोक में भगवान ने गुणातीत की अवस्थाओं के प्रति समता बताई। इस श्लोक में वे बताते हैं कि वह इस सबके बीच कैसे स्थित रहता है। यहाँ एक बहुत सुंदर उपमा प्रयोग की गई है।
उदासीनवदासीनः — उदासीन की भाँति स्थित: 'उदासीन' शब्द का अर्थ उदास या निराश नहीं है। इसका अर्थ है 'उत् आसीन', अर्थात ऊपर बैठा हुआ। जैसे कोई न्यायाधीश या दर्शक ऊँचे आसन से घटनाओं को देखता है, पर उनमें उलझता नहीं, वैसे ही गुणातीत अपने भीतर चलते गुणों के खेल को ऊपर से देखता है। उसमें करुणा है, पर पक्षपात नहीं।
गुणैः यो न विचाल्यते — गुणों से विचलित नहीं होता: सत्त्व की खुशी, रजस की बेचैनी और तमस की जड़ता, इन सबके बीच उसका केंद्र नहीं हिलता। परिस्थितियाँ बदलती हैं और मन की अवस्थाएँ बदलती हैं, पर उसका आंतरिक आधार स्थिर रहता है।
गुणा वर्तन्त इत्येव — गुण ही अपना कार्य कर रहे हैं: यह उसकी मूल समझ है। जब क्रोध, इच्छा या आलस्य उठता है, तो वह जानता है कि यह प्रकृति के गुणों का स्वाभाविक खेल है। यह समझ उसे प्रतिक्रिया से बचाती है।
योऽवतिष्ठति नेङ्गते — जो स्थिर रहता है, डिगता नहीं: 'अवतिष्ठति' का अर्थ है अपने स्वरूप में टिका रहना, और 'न इङ्गते' का अर्थ है हिलता नहीं। यह वह अटल अवस्था है जो हर बाहरी और आंतरिक परिवर्तन के बीच भी अविचल रहती है।
गहरे भाव और आंतरिक संदेश
उदासीनता का यह अर्थ नहीं कि व्यक्ति कर्तव्य से विमुख हो जाए। गीता का आदर्श ऐसा व्यक्ति है जो कर्म करता है, पर भीतर से अलिप्त रहता है। उसकी गतिविधि बाहर होती है, पर उसका केंद्र भीतर शांत रहता है। यही कर्मयोग और ज्ञानयोग का संगम है।
हमारे दैनिक जीवन के लिए संदेश
ऊँचे आसन का अभ्यास: जब कोई कठिन परिस्थिति आए, तो एक क्षण के लिए स्वयं को ऊपर से देखने का प्रयास करें, जैसे कोई दूसरा देख रहा हो। इस दूरी से स्पष्टता मिलती है।
कर्तव्य और अलिप्तता: अपने काम को पूरी निष्ठा से करें, पर उसके उतार-चढ़ाव को अपनी पहचान न बनाएँ। यही संतुलन तनाव को कम करता है।
आगे का विषय
भगवान ने गुणातीत की आंतरिक स्थिति का चित्र दिया। अब वे उसके सहज व्यवहार के लक्षण बताना आरंभ करते हैं, जो उसकी समता को बाहरी जीवन में प्रकट करते हैं।
इस श्लोक में छिपे संदेश
इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।
सूत्र
उदासीन का अर्थ उदासी नहीं, उदासीन का अर्थ तटस्थ साक्षी है।
जो भीतर स्थिर है, उसे बाहरी लहरें नहीं हिलातीं।
गुण अपना काम करते हैं, साधक अपना स्थान नहीं छोड़ता।
विचार आते हैं, भाव उठते हैं, पर साक्षी अपने स्थान पर रहता है।
जब कर्तापन ढीला पड़ता है, तब विचलन भी घटता है।
ध्यान मन को दबाना नहीं, उसे साक्षीभाव से देखना है।
अपने स्वरूप में टिके रहना ही परम शान्ति है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
'उदासीनवत्' का क्या अर्थ है?
'गुणा वर्तन्ते' का क्या भाव है?
'न इङ्गते' का क्या अर्थ है?
क्या गुणातीत कर्म नहीं करता?
इस श्लोक का एक वाक्य में व्यावहारिक संदेश क्या है?
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