स्वधर्म श्रेष्ठ है, परधर्म भयावह है
अपने स्वभाव और कर्तव्य के अनुरूप कर्म ही साधक के लिए कल्याणकारी है, जबकि दूसरे के मार्ग की नकल भय और भ्रम उत्पन्न करती है।
जीवन में उपयोग: दूसरों की सफलता की नकल करने के बजाय अपनी क्षमता, स्वभाव और कर्तव्य के अनुरूप मार्ग चुनें और उस पर दृढ़ रहें।