भगवद्गीता 2.60 — प्रयत्नशील विवेकी पुरुष का मन भी प्रबल इन्द्रियाँ बलपूर्वक हर लेती हैं
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः ।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥ २.६० ॥
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हे कौन्तेय! प्रयत्न करने वाले विवेकी पुरुष के भी मन को ये मथ डालने वाली प्रबल इन्द्रियाँ बलपूर्वक हर लेती हैं।
पदच्छेद
संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।
शब्दार्थ
| पंक्ति 1 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| यततः | प्रयत्न करते हुए |
| हि अपि | भी |
| कौन्तेय | हे कुन्तीपुत्र |
| पुरुषस्य | पुरुष के |
| विपश्चितः | विवेकी, बुद्धिमान् |
| पंक्ति 2 | |
|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ |
| इन्द्रियाणि | इन्द्रियाँ |
| प्रमाथीनि | मथ डालने वाली, प्रबल |
| हरन्ति | हर लेती हैं |
| प्रसभम् | बलपूर्वक |
| मनः | मन को |
| पंक्ति 1 | पंक्ति 2 | ||
|---|---|---|---|
| संस्कृत शब्द | अर्थ | संस्कृत शब्द | अर्थ |
| यततः | प्रयत्न करते हुए | इन्द्रियाणि | इन्द्रियाँ |
| हि अपि | भी | प्रमाथीनि | मथ डालने वाली, प्रबल |
| कौन्तेय | हे कुन्तीपुत्र | हरन्ति | हर लेती हैं |
| पुरुषस्य | पुरुष के | प्रसभम् | बलपूर्वक |
| विपश्चितः | विवेकी, बुद्धिमान् | मनः | मन को |
विस्तृत विवरण
परिचय
इस श्लोक में श्रीकृष्ण इंद्रियों की बलवत्ता के बारे में सावधान करते हैं। वे कहते हैं कि प्रयत्न करने वाले विवेकी पुरुष के मन को भी ये प्रमथन करने वाली इंद्रियाँ बलपूर्वक हर लेती हैं।
भावार्थ
साधना में सतर्कता की आवश्यकता
पिछले श्लोकों में श्रीकृष्ण ने इंद्रिय-संयम की आवश्यकता और उसके तरीक़े बताए। इस श्लोक में वे एक यथार्थवादी चेतावनी देते हैं कि यह कार्य सरल नहीं है। एक अनुभवी गुरु की तरह वे शिष्य को अति-आत्मविश्वास से बचाते हैं।
यततो ह्यपि कौन्तेय — हे कुंतीपुत्र, प्रयत्न करते हुए भी: यहाँ ध्यान देने की बात है कि वह व्यक्ति प्रयास कर रहा है। श्रीकृष्ण उसकी निष्ठा पर संदेह नहीं करते। फिर भी वे बताते हैं कि प्रयत्नशील साधक के लिए भी यह मार्ग कठिन हो सकता है।
पुरुषस्य विपश्चितः — विवेकी पुरुष के भी: ‘विपश्चित’ वह है जो शास्त्र और जीवन का ज्ञान रखता है। यह संकेत है कि केवल जानकारी या विद्वत्ता इंद्रियों से बचाव की गारंटी नहीं है। जानना और संयम करना अलग बातें हैं।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि — इंद्रियाँ मथ डालने वाली हैं: ‘प्रमाथी’ का अर्थ है उथल-पुथल मचा देने वाली। जैसे तूफ़ानी वायु समुद्र को मथ देती है, वैसे ही ये इंद्रियाँ मन को अशांत कर देती हैं।
हरन्ति प्रसभं मनः — बलपूर्वक मन को हर लेती हैं: ‘प्रसभ’ का अर्थ है बलपूर्वक। इंद्रियाँ मन को खींच ले जाती हैं और अक्सर हमें पता ही नहीं चलता कि हम कब अपने संकल्प से विचलित हो गए।
इस चेतावनी का उद्देश्य
श्रीकृष्ण साधक को निराश करने के लिए नहीं, बल्कि सतर्क करने के लिए यह कहते हैं। जो अपनी कमज़ोरी को समझता है, वह उसकी रक्षा की व्यवस्था करता है। अति-आत्मविश्वास में ही सबसे बड़ा खतरा है।
हमारे दैनिक जीवन के लिए संदेश
अपनी कमज़ोरियों की ईमानदार पहचान: हम चाहे कितने भी जानकार हों, प्रलोभन के क्षण में हमारी इच्छाशक्ति भी डिग सकती है। इसलिए पहले से ऐसी परिस्थितियों से बचने की व्यवस्था करना बुद्धिमानी है।
निरंतर अभ्यास का महत्व: इंद्रिय-संयम एक बार का निर्णय नहीं, बल्कि सतत अभ्यास है। हर दिन थोड़ी सजगता इसे मज़बूत बनाती है।
विनम्रता के साथ साधना: अपने संयम पर अहंकार करने के बजाय सजग और विनम्र रहना साधना को सुरक्षित रखता है।
साधना में सतर्कता की आवश्यकता
पिछले श्लोकों में श्रीकृष्ण ने इंद्रिय-संयम की आवश्यकता और उसके तरीक़े बताए। इस श्लोक में वे एक यथार्थवादी चेतावनी देते हैं कि यह कार्य सरल नहीं है। एक अनुभवी गुरु की तरह वे शिष्य को अति-आत्मविश्वास से बचाते हैं।
यततो ह्यपि कौन्तेय — हे कुंतीपुत्र, प्रयत्न करते हुए भी: यहाँ ध्यान देने की बात है कि वह व्यक्ति प्रयास कर रहा है। श्रीकृष्ण उसकी निष्ठा पर संदेह नहीं करते। फिर भी वे बताते हैं कि प्रयत्नशील साधक के लिए भी यह मार्ग कठिन हो सकता है।
पुरुषस्य विपश्चितः — विवेकी पुरुष के भी: ‘विपश्चित’ वह है जो शास्त्र और जीवन का ज्ञान रखता है। यह संकेत है कि केवल जानकारी या विद्वत्ता इंद्रियों से बचाव की गारंटी नहीं है। जानना और संयम करना अलग बातें हैं।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि — इंद्रियाँ मथ डालने वाली हैं: ‘प्रमाथी’ का अर्थ है उथल-पुथल मचा देने वाली। जैसे तूफ़ानी वायु समुद्र को मथ देती है, वैसे ही ये इंद्रियाँ मन को अशांत कर देती हैं।
हरन्ति प्रसभं मनः — बलपूर्वक मन को हर लेती हैं: ‘प्रसभ’ का अर्थ है बलपूर्वक। इंद्रियाँ मन को खींच ले जाती हैं और अक्सर हमें पता ही नहीं चलता कि हम कब अपने संकल्प से विचलित हो गए।
इस चेतावनी का उद्देश्य
श्रीकृष्ण साधक को निराश करने के लिए नहीं, बल्कि सतर्क करने के लिए यह कहते हैं। जो अपनी कमज़ोरी को समझता है, वह उसकी रक्षा की व्यवस्था करता है। अति-आत्मविश्वास में ही सबसे बड़ा खतरा है।
हमारे दैनिक जीवन के लिए संदेश
अपनी कमज़ोरियों की ईमानदार पहचान: हम चाहे कितने भी जानकार हों, प्रलोभन के क्षण में हमारी इच्छाशक्ति भी डिग सकती है। इसलिए पहले से ऐसी परिस्थितियों से बचने की व्यवस्था करना बुद्धिमानी है।
निरंतर अभ्यास का महत्व: इंद्रिय-संयम एक बार का निर्णय नहीं, बल्कि सतत अभ्यास है। हर दिन थोड़ी सजगता इसे मज़बूत बनाती है।
विनम्रता के साथ साधना: अपने संयम पर अहंकार करने के बजाय सजग और विनम्र रहना साधना को सुरक्षित रखता है।
आगे का विषय
श्रीकृष्ण ने इंद्रियों की प्रबलता का सत्य बताकर साधक को सचेत किया। अब प्रश्न यह उठता है कि इतनी बलवान इंद्रियों को वश में कैसे किया जाए। अगले श्लोक में श्रीकृष्ण इसका उत्तर देते हैं।
इस श्लोक में छिपे संदेश
इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।
सूत्र
प्रयत्न आवश्यक है, पर अकेला पर्याप्त नहीं।
इन्द्रियाँ विवेकी को भी बहका सकती हैं, इसलिए सजगता सतत चाहिए।
मन जब इन्द्रियों के साथ बह जाए, तब बुद्धि कमजोर हो जाती है।
साधना में विनम्रता रखना सबसे बड़ी सुरक्षा है।
इन्द्रियों का बल बड़ा है, इसलिए संयम के लिए उपाय भी बड़े चाहिए।
सावधानी का अभाव ज्ञानी को भी गिरा सकता है।
जहाँ अपना बल कम पड़े, वहाँ परम का आश्रय काम आता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
'प्रमाथीनि' का क्या अर्थ है?
'विपश्चितः' के लिए भी यह कठिन क्यों है?
'प्रसभम्' का क्या अर्थ है?
यह श्लोक साधकों को क्या सिखाता है?
इस श्लोक का एक वाक्य में व्यावहारिक संदेश क्या है?
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