स्वास्थ्य केवल बीमारी का न होना नहीं है, बल्कि शरीर और मन के संतुलन का नाम है। आज देर रात तक जागना, बिना सोचे खाना, स्क्रीन पर घंटों बैठना और तनाव में रहना आम हो गया है। ऐसी आदतें धीरे-धीरे थकान, चिड़चिड़ाहट और कमज़ोर एकाग्रता के रूप में असर दिखाती हैं, इसलिए जीवनशैली को सँभालना पहला कदम है।
गीता 6.17 संतुलित आहार-विहार, कर्म, निद्रा और जागरण को जीवन के दुःख दूर करने में सहायक बताती है, और गीता 6.16 कहती है कि भोजन या निद्रा में किसी भी प्रकार की अति बाधा बनती है, इसलिए मध्यम मार्ग अपनाना चाहिए। गीता 4.30 संयमित आहार और अनुशासित जीवन को अंतःकरण की शुद्धि में सहायक बताती है। गीता 5.22 क्षणिक इन्द्रिय-सुख के लिए दीर्घकालिक कल्याण छोड़ने से सावधान करती है।
गीता 4.26 और 2.60 भोजन, मनोरंजन और सोशल मीडिया जैसे आकर्षणों के विवेकपूर्ण, नियंत्रित उपयोग तथा निरंतर सावधानी की बात करती हैं, और गीता 2.58 में कछुए की तरह ध्यान को समेट लेने का अभ्यास है। गीता 4.29 में श्वास के सचेत नियंत्रण को मन और प्राण को संतुलित करने वाला साधन बताया गया है। नियमित दिनचर्या, पर्याप्त विश्राम और संतुलित भोजन अपनाएँ।