अध्याय 4 ज्ञान कर्म संन्यास योग
यह अध्याय कर्म के पीछे छिपे हुए गहरे आध्यात्मिक ज्ञान को प्रकट करता है। श्रीकृष्ण बताते हैं कि ज्ञान मन को शुद्ध करता है और जीवन को देखने की दृष्टि बदल देता है। इस अध्याय से हमें यह समझने को मिलता है कि ज्ञान और कर्म परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। गुरु से सीखने का महत्व, दिव्य अवतारों का उद्देश्य तथा ज्ञान की परिवर्तनकारी शक्ति इस अध्याय के प्रमुख विषय हैं। यह अध्याय भ्रम को दूर कर आत्मविश्वास, विवेक और आंतरिक शांति की ओर ले जाता है।
श्लोक सूची
किसी भी श्लोक पर क्लिक करके संस्कृत पाठ, शब्दार्थ और विस्तृत व्याख्या देखें।
श्लोक 1
सनातन योग परम्परा का दिव्य प्रवाह
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्॥ ४.१॥
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—मैंने इस अविनाशी योग का उपदेश सबसे पहले सूर्यदेव विवस्वान को दिया। विवस्वान ने इसे मनु को बताया और मनु ने इसे इक्ष्वाकु को सिखाया।
→
श्लोक 2
परम्परा से प्राप्त योग का लोप
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप॥ ४.२॥
हे परन्तप अर्जुन! इस प्रकार गुरु-शिष्य परम्परा से प्राप्त इस योग को राजर्षियों ने जाना था, किन्तु बहुत समय बीत जाने पर यह योग इस संसार में लुप्तप्राय हो गया।
→
श्लोक 3
भक्त और सखा को दिव्य रहस्य का उपदेश
स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः।
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्॥ ४.३॥
वही प्राचीन योग आज मैंने तुम्हें कहा है, क्योंकि तुम मेरे भक्त और मित्र हो। यह योग अत्यन्त श्रेष्ठ रहस्य है।
→
श्लोक 4
भगवान् के जन्म और उपदेश पर अर्जुन का प्रश्न
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः।
कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति॥ ४.४॥
अर्जुन ने कहा—आपका जन्म तो बाद में हुआ है और सूर्यदेव विवस्वान का जन्म बहुत पहले हुआ था। फिर मैं यह कैसे समझूँ कि आपने ही आदि काल में उन्हें इस योग का उपदेश दिया था?
→
श्लोक 5
भगवान् और जीव के जन्मों का अन्तर
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप॥ ४.५॥
हे अर्जुन! मेरे और तुम्हारे बहुत से जन्म बीत चुके हैं। उन सभी जन्मों को मैं जानता हूँ, किन्तु तुम उन्हें नहीं जानते हो।
→
श्लोक 6
भगवान् का दिव्य अवतार
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥ ४.६॥
यद्यपि मैं अजन्मा, अविनाशी तथा समस्त प्राणियों का ईश्वर हूँ, फिर भी अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी दिव्य योगमाया से प्रकट होता हूँ।
→
श्लोक 7
धर्म की रक्षा हेतु भगवान् का अवतार
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ ४.७॥
हे भारत (अर्जुन)! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं प्रकट होता हूँ।
→
श्लोक 8
साधुओं की रक्षा और धर्म की स्थापना
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥ ४.८॥
साधु पुरुषों की रक्षा करने, दुष्कर्मियों का विनाश करने और धर्म की पुनः स्थापना करने के लिए मैं प्रत्येक युग में प्रकट होता हूँ।
→
श्लोक 9
भगवान् के दिव्य जन्म और कर्म का तत्त्व
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥ ४.९॥
हे अर्जुन! जो मनुष्य मेरे जन्म और कर्म की दिव्यता को तत्त्व से जान लेता है, वह शरीर त्यागने के बाद पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता, बल्कि मुझे ही प्राप्त हो जाता है।
→
श्लोक 10
राग, भय और क्रोध से मुक्त होकर भगवान् को प्राप्त करना
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः।
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः॥ ४.१०॥
राग, भय और क्रोध से मुक्त होकर, मुझमें तन्मय होकर तथा मेरी शरण ग्रहण करके, अनेक लोग ज्ञानरूपी तप द्वारा शुद्ध होकर मेरे स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं।
→
श्लोक 11
भगवान् सभी को उनके भाव के अनुसार फल देते हैं
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥ ४.११॥
हे पार्थ! जो लोग जिस प्रकार मेरी शरण आते हैं, मैं भी उन्हें उसी प्रकार प्रत्युत्तर देता हूँ। सभी मनुष्य किसी न किसी रूप में मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।
→
श्लोक 12
कर्मफल की इच्छा रखने वाले देवताओं की पूजा करते हैं
काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः।
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा॥ ४.१२॥
जो लोग कर्मों की सिद्धि अर्थात् उनके फल की इच्छा रखते हैं, वे इस संसार में देवताओं की पूजा करते हैं; क्योंकि मनुष्यलोक में कर्मों से उत्पन्न होने वाली सफलता शीघ्र प्राप्त हो जाती है।
→
श्लोक 13
गुण और कर्म के अनुसार चातुर्वर्ण्य व्यवस्था
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्॥ ४.१३॥
चार वर्णों की व्यवस्था मैंने गुण और कर्म के विभाजन के अनुसार बनाई है। यद्यपि मैं उसका रचयिता हूँ, फिर भी मुझे अविनाशी और अकर्ता जानो।
→
श्लोक 14
कर्म भगवान् को बाँध नहीं सकते
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते॥ ४.१४॥
कर्म मुझे बाँध नहीं सकते, क्योंकि मुझे कर्मफल की कोई इच्छा नहीं है। जो मनुष्य इस प्रकार मुझे यथार्थ रूप से जान लेता है, वह भी कर्मों से नहीं बँधता।
→
श्लोक 15
पूर्वज मुमुक्षुओं का अनुसरण करके कर्म करो
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः।
कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्॥ ४.१५॥
इस प्रकार जानकर पूर्वकाल के मोक्ष की इच्छा रखने वाले महापुरुषों ने भी कर्म किए हैं। इसलिए तुम भी उन पूर्वजों द्वारा किए गए कर्मों का अनुसरण करते हुए अपना कर्तव्य-कर्म करो।
→
श्लोक 16
कर्म, अकर्म और विकर्म का गूढ़ रहस्य
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः।
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥ ४.१६॥
कौन-सा कर्म है और कौन-सा अकर्म है—इस विषय में बड़े-बड़े विद्वान भी भ्रमित हो जाते हैं। इसलिए मैं तुम्हें कर्म का वह तत्त्व बताऊँगा, जिसे जानकर तुम अशुभ अर्थात् कर्मबन्धन से मुक्त हो जाओगे।
→
श्लोक 17
कर्म, विकर्म और अकर्म को जानना आवश्यक है
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः॥ ४.१७॥
कर्म क्या है, विकर्म क्या है और अकर्म क्या है—इन तीनों को जानना आवश्यक है, क्योंकि कर्म की गति अत्यन्त गहन और समझने में कठिन है।
→
श्लोक 18
कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखने वाला ज्ञानी
कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः।
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्॥ ४.१८॥
जो मनुष्य कर्म करते हुए भी उसमें अकर्म (कर्मबन्धन का अभाव) देखता है और बाह्य रूप से अकर्म में भी कर्म को देखता है, वही मनुष्यों में बुद्धिमान है। वही योगयुक्त है और वास्तव में समस्त कर्मों को करने वाला है।
→
श्लोक 19
जिसके कर्म ज्ञानाग्नि से दग्ध हो गए हैं
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः॥ ४.१९॥
जिस मनुष्य के सभी कार्य स्वार्थपूर्ण इच्छाओं और फल-संकल्पों से रहित होते हैं तथा जिसके कर्म ज्ञानरूपी अग्नि द्वारा दग्ध हो चुके होते हैं, उसे बुद्धिमान लोग सच्चा पण्डित कहते हैं।
→
श्लोक 20
कर्मफलासक्ति त्यागकर कर्म करने वाला मुक्त पुरुष
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः॥ ४.२०॥
जो पुरुष कर्मफल की आसक्ति छोड़ चुका है, जो सदा सन्तुष्ट और बाहरी आश्रयों से मुक्त है, वह कर्मों में पूर्णतः लगा हुआ होने पर भी वास्तव में कुछ नहीं करता अर्थात् कर्मबन्धन से नहीं बँधता।
→
श्लोक 21
निराशी, यतचित्त और अपरिग्रही कर्मयोगी
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्॥ ४.२१॥
जो पुरुष फल की आशा से रहित है, जिसका मन और इन्द्रियाँ संयमित हैं तथा जिसने संग्रह और स्वामित्व-बुद्धि का त्याग कर दिया है, वह केवल शरीर-निर्वाह के लिए कर्म करते हुए भी पाप अथवा कर्मबन्धन को प्राप्त नहीं होता।
→
श्लोक 22
यदृच्छालाभ में सन्तुष्ट समदर्शी कर्मयोगी
यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः।
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते॥ ४.२२॥
जो सहज प्राप्त होने वाली वस्तुओं में सन्तुष्ट रहता है, सुख-दुःख आदि द्वन्द्वों से ऊपर उठ चुका है, ईर्ष्या से रहित है तथा सफलता और असफलता में समान रहता है, वह कर्म करते हुए भी कर्मबन्धन में नहीं बँधता।
→
श्लोक 23
ज्ञानस्थित मुक्त पुरुष के कर्म विलीन हो जाते हैं
गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः।
यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते॥ ४.२३॥
जिस मुक्त पुरुष की आसक्ति समाप्त हो चुकी है, जिसका चित्त ज्ञान में स्थित है और जो यज्ञभाव अर्थात् ईश्वरार्पण बुद्धि से कर्म करता है, उसके सम्पूर्ण कर्म विलीन हो जाते हैं अर्थात् कर्मबन्धन उत्पन्न नहीं करते।
→
श्लोक 24
ब्रह्मरूप यज्ञ की अद्वैत दृष्टि
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥ ४.२४॥
जिस साधक की दृष्टि ब्रह्ममय हो गई है, उसके लिए यज्ञ का अर्पण, हवि, अग्नि, आहुति देने वाला और प्राप्त होने वाला लक्ष्य—सब ब्रह्म ही हैं। ऐसे ब्रह्मकर्मसमाधि वाले साधक को ब्रह्म ही प्राप्त होता है।
→
श्लोक 25
विभिन्न प्रकार के यज्ञों का वर्णन
दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते।
ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति॥ ४.२५॥
कुछ योगी देवताओं के लिए किए जाने वाले यज्ञों की उपासना करते हैं, जबकि अन्य योगी ब्रह्मरूप अग्नि में यज्ञ को ही यज्ञ द्वारा अर्पित करते हैं।
→
श्लोक 26
इन्द्रियसंयम और विषय-निग्रह रूप यज्ञ
श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति।
शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति॥ ४.२६॥
कुछ साधक श्रोत्र आदि इन्द्रियों को संयमरूपी अग्नि में आहुति देते हैं अर्थात् इन्द्रियों का दमन और नियंत्रण करते हैं। अन्य साधक शब्द आदि विषयों को इन्द्रियरूपी अग्नि में आहुति देते हैं अर्थात् शास्त्रसम्मत और संयमित रूप से विषयों का उपयोग करते हैं।
→
श्लोक 27
सभी इन्द्रिय और प्राण कर्मों का आत्मसंयमयोगाग्नि में समर्पण
सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे।
आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते॥ ४.२७॥
कुछ साधक समस्त इन्द्रियों के कार्यों तथा प्राणों के कार्यों को ज्ञान द्वारा प्रकाशित आत्मसंयमरूपी योगाग्नि में समर्पित कर देते हैं।
→
श्लोक 28
द्रव्य, तप, योग और स्वाध्याय-ज्ञान यज्ञ
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः॥ ४.२८॥
कुछ साधक द्रव्यदान रूप यज्ञ करते हैं, कुछ तपस्या रूप यज्ञ करते हैं, कुछ योग-साधना रूप यज्ञ करते हैं और कुछ दृढ़व्रती साधक स्वाध्याय तथा ज्ञानयज्ञ का अनुष्ठान करते हैं।
→
श्लोक 29
प्राणायाम रूप यज्ञ
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे।
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः॥ ४.२९॥
कुछ साधक प्राण को अपान में और अपान को प्राण में अर्पित करते हैं तथा प्राण और अपान की गति को नियंत्रित करके प्राणायाम में लगे रहते हैं।
→
श्लोक 30
नियत आहार और प्राणों का यज्ञ
अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति।
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः॥ ४.३०॥
अन्य साधक संयमित आहार का पालन करते हुए प्राणों को प्राणों में ही समर्पित करते हैं। ये सभी यज्ञ के वास्तविक तत्त्व को जानने वाले हैं और यज्ञ के द्वारा इनके दोष तथा पाप नष्ट हो जाते हैं।
→
श्लोक 31
यज्ञशिष्ट अमृत का सेवन और यज्ञ का महत्व
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्।
नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम॥ ४.३१॥
यज्ञ से पवित्र हुए अमृततुल्य अवशेष का सेवन करने वाले साधक शाश्वत ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। हे अर्जुन! जो यज्ञभाव से रहित है, उसके लिए यह लोक भी सुखद नहीं है, फिर परलोक की प्राप्ति कैसे हो सकती है?
→
श्लोक 32
विविध यज्ञों का वेदों में विस्तार और कर्मजन्य स्वरूप
एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे।
कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे॥ ४.३२॥
इस प्रकार अनेक प्रकार के यज्ञ वेदों में विस्तारपूर्वक बताए गए हैं। इन सभी यज्ञों को कर्मजन्य जानो। इन्हें इस प्रकार तत्त्व से जानकर तुम कर्मबन्धन से मुक्त हो जाओगे।
→
श्लोक 33
द्रव्यमय यज्ञ से ज्ञानयज्ञ की श्रेष्ठता
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप।
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते॥ ४.३३॥
हे अर्जुन! द्रव्य से किए जाने वाले यज्ञों की अपेक्षा ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है, क्योंकि समस्त कर्म अंततः ज्ञान में जाकर पूर्णता प्राप्त करते हैं।
→
श्लोक 34
तत्त्वदर्शी गुरु से ज्ञान प्राप्त करने की विधि
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥ ४.३४॥
उस ज्ञान को तुम विनम्रतापूर्वक समर्पण, उचित प्रश्न और सेवा के माध्यम से प्राप्त करो। तत्त्व का प्रत्यक्ष अनुभव रखने वाले ज्ञानी पुरुष तुम्हें वह ज्ञान प्रदान करेंगे।
→
श्लोक 35
ज्ञान प्राप्त होने पर मोह का नाश और सर्वात्मदर्शन
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव।
येन भूतान्यशेषाणि द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि॥ ४.३५॥
हे अर्जुन! उस ज्ञान को प्राप्त कर लेने पर तुम फिर कभी इस प्रकार के मोह में नहीं पड़ोगे। उस ज्ञान के द्वारा तुम समस्त प्राणियों को अपने आत्मस्वरूप में और फिर मुझ परमात्मा में स्थित देखोगे।
→
श्लोक 36
ज्ञानरूपी नौका से पाप-सागर का पारगमन
अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः।
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि॥ ४.३६॥
यदि तुम सभी पापियों से भी अधिक पाप करने वाले हो, तब भी ज्ञानरूपी नौका के द्वारा समस्त पापरूप संकटों को पार कर जाओगे।
→
श्लोक 37
ज्ञानाग्नि समस्त कर्मों को भस्म कर देती है
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा॥ ४.३७॥
हे अर्जुन! जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधन को भस्म कर देती है, उसी प्रकार ज्ञानरूपी अग्नि समस्त कर्मों और उनके बन्धनकारी प्रभावों को भस्म कर देती है।
→
श्लोक 38
ज्ञान से बढ़कर कोई पवित्र करने वाला नहीं
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति॥ ४.३८॥
इस संसार में ज्ञान के समान कोई भी पवित्र करने वाला नहीं है। योग में सिद्ध हुआ साधक समय आने पर उस ज्ञान को अपने अन्तःकरण में स्वयं अनुभव करता है।
→
श्लोक 39
श्रद्धावान्, तत्पर और संयमी को ज्ञान तथा परम शान्ति की प्राप्ति
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥ ४.३९॥
जो व्यक्ति श्रद्धावान् है, ज्ञान प्राप्त करने में तत्पर है और जिसकी इन्द्रियाँ संयमित हैं, वह ज्ञान प्राप्त करता है। और ज्ञान प्राप्त करके वह शीघ्र ही परम शान्ति को प्राप्त कर लेता है।
→
श्लोक 40
अज्ञानी, अश्रद्धालु और संशयात्मा का विनाश
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः॥ ४.४०॥
अज्ञानी, श्रद्धाहीन और सदा संदेह में रहने वाला व्यक्ति पतन को प्राप्त होता है। ऐसे संशयग्रस्त व्यक्ति के लिए न यह लोक सुखद होता है, न परलोक और न ही उसे वास्तविक सुख प्राप्त होता है।
→
श्लोक 41
योग द्वारा कर्मसंन्यास और ज्ञान द्वारा संशय का छेदन
योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम्।
आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय॥ ४.४१॥
हे अर्जुन! जिसने योग के द्वारा कर्मों को समर्पित कर दिया है, जिसके सभी संशय ज्ञान द्वारा काट दिए गए हैं और जो आत्मसंयमी है, उसे कर्म बन्धन में नहीं बाँधते।
→
श्लोक 42
ज्ञानरूपी तलवार से संशय का छेदन कर योग में स्थित हो
तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः।
छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत॥ ४.४२॥
इसलिए, हे अर्जुन! अपने हृदय में स्थित अज्ञानजनित संशय को ज्ञानरूपी तलवार से काटकर योग में स्थित हो जाओ और अपने कर्तव्य के लिए उठ खड़े हो।
→