भगवद्गीता 4.7 — धर्म की रक्षा हेतु भगवान् का अवतार

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ ४.७॥

हे भारत (अर्जुन)! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं प्रकट होता हूँ।

पदच्छेद

संस्कृत श्लोक को अध्ययन-सुविधा के लिए अलग-अलग शब्दों में विभाजित किया गया है।

यदा यदा हि धर्मस्य
ग्लानिः भवति भारत ।
अभ्युत्थानम् अधर्मस्य
तदा आत्मानम् सृजामि अहम् ॥

शब्दार्थ

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संस्कृत शब्द अर्थ
यदा यदा जब-जब
हि ही
धर्मस्य धर्म की
ग्लानिः हानि, क्षय
भवति होती है
भारत हे भरतवंशी अर्जुन!
पंक्ति 2
संस्कृत शब्द अर्थ
अभ्युत्थानम् वृद्धि, प्रबलता
अधर्मस्य अधर्म की
तदा तब
आत्मानम् अपने स्वरूप को
सृजामि प्रकट करता हूँ
अहम् मैं
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संस्कृत शब्द अर्थ संस्कृत शब्द अर्थ
यदा यदा जब-जब अभ्युत्थानम् वृद्धि, प्रबलता
हि ही अधर्मस्य अधर्म की
धर्मस्य धर्म की तदा तब
ग्लानिः हानि, क्षय आत्मानम् अपने स्वरूप को
भवति होती है सृजामि प्रकट करता हूँ
भारत हे भरतवंशी अर्जुन! अहम् मैं

विस्तृत विवरण

परिचय

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अपने अवतरण के समय का रहस्य प्रकट करते हैं। यहाँ वे बताते हैं कि जब संसार में धर्म का संतुलन बिगड़ जाता है और अधर्म का प्रभाव बढ़ने लगता है, तब वे स्वयं लोककल्याण के लिए प्रकट होते हैं।

भावार्थ

इस श्लोक को गहराई से समझने के लिए इसके प्रमुख शब्दों के मर्म को समझना आवश्यक है:

क. धर्म की 'ग्लानि' का वास्तविक अर्थ क्या है?

यहाँ 'धर्म' का मतलब कोई मजहब, रिलिजन या हिंदू-मुस्लिम-ईसाई नहीं है। गीता में धर्म का अर्थ है 'सृष्टि का संतुलन' (Cosmic Order), कर्तव्य और मानवता।

'ग्लानि' शब्द का अर्थ केवल कमी होना नहीं होता। ग्लानि का मतलब होता है जब कोई चीज अंदर ही अंदर सड़ने लगे, कमजोर होने लगे। जब समाज में ईमानदारी, दया, प्रेम और कर्तव्य की भावना सड़ने लगती है और लोग सही-गलत का अंतर भूल जाते हैं, उसे धर्म की ग्लानि कहते हैं।

ख. अधर्म का 'अभ्युत्थान'

'अभ्युत्थान' का अर्थ है बहुत तेजी से ऊपर उठना या हावी हो जाना। जब समाज में स्वार्थ, अहंकार, क्रूरता और अन्याय इतने शक्तिशाली हो जाते हैं कि वे नियम बन जाते हैं, और सज्जन लोग डरे-सहमे चुप बैठ जाते हैं, तब अधर्म का अभ्युत्थान होता है।

ग. 'तदात्मानं सृजाम्यहम्' (मैं स्वयं को रचता हूँ)

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जब यह असंतुलन अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाता है, तब वे किसी और को भेजने के बजाय स्वयं उस स्थिति को ठीक करने के लिए आकार ग्रहण करते हैं।

गहरे भाव और आंतरिक संदेश

इस श्लोक के भीतर छिपे भाव ब्रह्मांडीय स्तर पर और हमारे व्यक्तिगत स्तर पर, दोनों जगह लागू होते हैं:

ब्रह्मांडीय भाव (Cosmic Level): यह श्लोक हमें एक बहुत बड़ा दिलासा देता है कि यह संसार लावारिस नहीं है। कोई परम सत्ता है जो इस पूरी सृष्टि पर नजर रखे हुए है। जब भी बुराई का घड़ा भरता है, उसे फूटना ही पड़ता है। भगवान श्रीकृष्ण आश्वासन देते हैं कि जब भी धर्म का संतुलन बिगड़ेगा, तब दिव्य शक्ति किसी न किसी रूप में उसे पुनः स्थापित करेगी।

व्यक्तिगत भाव (Internal Level): कुरुक्षेत्र केवल बाहर नहीं है, यह हमारे मन के भीतर भी है। हमारे भीतर भी धर्म (विवेक, करुणा, सत्य) और अधर्म (काम, क्रोध, लोभ, मोह) के बीच निरंतर संघर्ष चलता रहता है। जब हमारे भीतर नकारात्मकता बहुत बढ़ जाती है और हम स्वयं को असहाय अनुभव करने लगते हैं, तब ईश्वर की ओर सच्चे हृदय से किया गया आह्वान हमारी सुप्त दिव्य चेतना को जागृत कर सकता है।

हमारे जीवन के लिए संदेश: यह श्लोक आशा का संदेश देता है। चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों, धर्म और सत्य की शक्ति कभी समाप्त नहीं होती। जब हम धर्म के पक्ष में खड़े रहते हैं, तब हम उसी दिव्य व्यवस्था का हिस्सा बन जाते हैं जिसकी रक्षा के लिए भगवान स्वयं अवतरित होते हैं।

आगे का विषय

भगवान श्रीकृष्ण ने यह तो बता दिया कि वे कब प्रकट होते हैं, किन्तु अब यह जानना शेष है कि उनके अवतरण का उद्देश्य क्या होता है। अगले प्रसंग में भगवान श्रीकृष्ण अपने अवतार के तीन प्रमुख उद्देश्यों—साधुओं की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की स्थापना—का उद्घाटन करते हैं।

इस श्लोक में छिपे संदेश

इस श्लोक को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखकर मनन करें और देखें कि कौन-सा गहरा संदेश आपके लिए खुलता है।

अवतार-दृष्टि
अवतार दिव्य हस्तक्षेप धर्मसंस्थापन
धर्म-दृष्टि
धर्म मर्यादा सत्य न्याय
भक्ति-दृष्टि
भगवान् की करुणा भक्त-रक्षा
आध्यात्मिक
ईश्वरीय व्यवस्था दिव्य संरक्षण
नैतिक
सदाचार उत्तरदायित्व
दार्शनिक
धर्म-अधर्म का संघर्ष
मानवता
न्याय कल्याण
वैज्ञानिक
आत्म-संशोधन संतुलन
मनोवैज्ञानिक
नैतिक पुनर्स्थापन
नेतृत्व
संकट-हस्तक्षेप
सामाजिक
व्यवस्था की पुनर्स्थापना
प्रबन्धन
सुधारात्मक कार्यवाही
राष्ट्रीय
मूल्यों का संरक्षण
पारिवारिक
मार्गदर्शक सिद्धान्त

सूत्र

धर्म केवल पूजा नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाला सिद्धान्त है।

भगवान् तब प्रकट होते हैं जब मानवता दिशा खोने लगती है।

अन्याय की वृद्धि ईश्वरीय हस्तक्षेप को आमन्त्रित करती है।

अधर्म चाहे कितना भी बढ़ जाए, अन्तिम विजय धर्म की ही होती है।

सच्चा नेतृत्व संकट के समय प्रकट होता है।

मूल्यों की रक्षा के बिना सभ्यता टिक नहीं सकती।

भगवान् अपने भक्तों और धर्म की रक्षा के लिए सदैव सजग हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

"धर्मस्य ग्लानि" का क्या अर्थ है?
धर्मस्य ग्लानि का अर्थ है—धर्म के सिद्धान्तों, मूल्यों, मर्यादाओं और सदाचार का कमजोर पड़ जाना।
क्या भगवान् हर बार शारीरिक रूप से अवतार लेते हैं?
गीता का मुख्य भाव यह है कि भगवान् धर्म की रक्षा के लिए किसी न किसी रूप में हस्तक्षेप करते हैं। यह अवतार, महापुरुष, संत या अन्य दिव्य माध्यमों से भी हो सकता है।
अधर्म का अभ्युत्थान क्या है?
जब असत्य, अन्याय, स्वार्थ, हिंसा और अनैतिकता समाज में बढ़ने लगती है, तो उसे अधर्म का अभ्युत्थान कहा जाता है।
इस श्लोक से हमें क्या प्रेरणा मिलती है?
धर्म की रक्षा केवल भगवान् का कार्य नहीं; प्रत्येक व्यक्ति को भी अपने स्तर पर सत्य, न्याय और सदाचार का समर्थन करना चाहिए।
इस श्लोक का एक वाक्य में व्यावहारिक संदेश क्या है?
जब जीवन या समाज में मूल्य कमजोर पड़ने लगें, तब उन्हें पुनः स्थापित करने के लिए सक्रिय होना ही धर्म है।