अध्याय 13 क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग
मानव दुःख का एक प्रमुख कारण अपनी वास्तविक पहचान को भूल जाना है। हम स्वयं को शरीर, मन, भावनाओं और सामाजिक भूमिकाओं तक सीमित मान लेते हैं। इस अध्याय में श्रीकृष्ण 'क्षेत्र' अर्थात अनुभव के क्षेत्र और 'क्षेत्रज्ञ' अर्थात उसे जानने वाले चेतन आत्मस्वरूप के बीच का भेद स्पष्ट करते हैं। इस अध्याय से हमें यह सीखने को मिलता है कि आत्म-जागरूकता, विनम्रता और सही ज्ञान के माध्यम से सीमित पहचान तथा मानसिक अशांति से ऊपर कैसे उठा जा सकता है। यह अध्याय आत्मबोध और आंतरिक स्वतंत्रता की मजबूत नींव रखता है।
श्लोक सूची
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श्लोक 1
अर्जुन की जिज्ञासा: प्रकृति, पुरुष, क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ, ज्ञान और ज्ञेय
अर्जुन उवाच ।
प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च ।
एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव ॥ १३.१ ॥
अर्जुन बोले—हे केशव! मैं प्रकृति और पुरुष, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ तथा ज्ञान और ज्ञेय—इन सबको जानना चाहता हूँ।
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श्लोक 2
शरीर क्षेत्र है और उसे जानने वाला क्षेत्रज्ञ
श्रीभगवानुवाच ।
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते ।
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥ १३.२ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—हे कुन्तीपुत्र! यह शरीर 'क्षेत्र' कहा जाता है, क्योंकि इसमें कर्मों के बीज बोए जाते हैं और उनके फल उगते हैं। जो इस शरीर को साक्षी भाव से जानता है, उसे तत्त्वज्ञानी लोग 'क्षेत्रज्ञ' कहते हैं।
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श्लोक 3
क्षेत्रज्ञ भी मैं हूँ: क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का ज्ञान ही सच्चा ज्ञान
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ॥ १३.३ ॥
हे भरतवंशी अर्जुन! सभी शरीरों में क्षेत्रज्ञ भी मुझे ही जान। क्षेत्र (शरीर आदि जड़ तत्त्व) और क्षेत्रज्ञ (जानने वाले चेतन) का जो वास्तविक बोध है, वही मेरे मत में सच्चा ज्ञान है।
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श्लोक 4
क्षेत्र का स्वरूप, विकार, उत्पत्ति और क्षेत्रज्ञ का प्रभाव
तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत् ।
स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु ॥ १३.४ ॥
वह क्षेत्र जो है, जैसा है, जिन विकारों वाला है और जिस कारण से जो उत्पन्न होता है; तथा वह क्षेत्रज्ञ जो है और जिस प्रभाव वाला है—यह सब मुझसे संक्षेप में सुन।
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श्लोक 5
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का ज्ञान: ऋषियों, वेदों और ब्रह्मसूत्र की प्रमाणित वाणी
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् ।
ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ॥ १३.५ ॥
यह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का तत्त्व ऋषियों ने अनेक प्रकार से कहा है। विविध वेदमन्त्रों में भी इसे अलग-अलग रूप से बताया गया है, और ब्रह्मसूत्र के युक्तियुक्त तथा सुनिश्चित पदों में भी इसका निरूपण हुआ है।
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श्लोक 6
क्षेत्र के चौबीस तत्त्व: महाभूत, अहंकार, बुद्धि, इन्द्रियाँ और विषय
महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ।
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ॥ १३.६ ॥
पाँच महाभूत, अहंकार, बुद्धि और मूल प्रकृति (अव्यक्त); दस इन्द्रियाँ, एक मन तथा इन्द्रियों के पाँच विषय—ये क्षेत्र के मूल तत्त्व हैं, जिनकी गणना यहाँ की गई है।
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श्लोक 7
क्षेत्र के विकार: इच्छा, द्वेष, सुख-दुःख, चेतना और धृति
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः ।
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ॥ १३.७ ॥
इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, शरीर-इन्द्रियों का समूह, चेतना और धृति—इन विकारों सहित यह क्षेत्र संक्षेप में कहा गया है।
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श्लोक 8
ज्ञान के लक्षण (1): अमानित्व, अहिंसा, सरलता, गुरु-सेवा और आत्म-संयम
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् ।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥ १३.८ ॥
अभिमान का अभाव, दिखावे का अभाव, अहिंसा, क्षमा, सरलता, गुरु की सेवा, बाहर-भीतर की पवित्रता, साधना में स्थिरता और मन-इन्द्रियों का संयम—ये ज्ञान के साधन और लक्षण हैं।
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श्लोक 9
ज्ञान के लक्षण (2): वैराग्य, अनहंकार और जीवन के दोषों का स्मरण
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च ।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥ १३.९ ॥
इन्द्रियों के भोगों में वैराग्य, अहंकार का अभाव, तथा जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और रोग में निहित दुःख और दोषों को बार-बार विचारना—ये भी ज्ञान के लक्षण हैं।
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श्लोक 10
ज्ञान के लक्षण (3): अनासक्ति और इष्ट-अनिष्ट में सम चित्त
असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु ।
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥ १३.१० ॥
पुत्र, स्त्री, घर आदि में आसक्ति और अत्यधिक ममता का अभाव, तथा प्रिय और अप्रिय परिस्थितियों के आने पर सदा चित्त की समता—यह भी ज्ञान का लक्षण है।
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श्लोक 11
ज्ञान के लक्षण (4): अनन्य भक्ति, एकान्तप्रियता और भीड़ में अरुचि
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ॥ १३.११ ॥
मुझ परमात्मा में अनन्य भाव से अटल भक्ति, एकान्त और शुद्ध स्थान में रहने की प्रवृत्ति तथा विषयासक्त जन-समुदाय में रुचि न होना—ये भी ज्ञान के लक्षण हैं।
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श्लोक 12
अध्यात्म-ज्ञान में स्थिति और तत्त्वज्ञान का लक्ष्य: ज्ञान तथा अज्ञान की कसौटी
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ॥ १३.१२ ॥
अध्यात्मज्ञान में नित्य स्थिति और तत्त्वज्ञान के प्रयोजन अर्थात् परमात्मा-तत्त्व का सदा दर्शन—यह सब ज्ञान कहा गया है। इससे जो विपरीत है, वह अज्ञान है।
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श्लोक 13
ज्ञेय तत्त्व: जिसे जानकर अमृत की प्राप्ति होती है, वह अनादि परम ब्रह्म
ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते ।
अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ॥ १३.१३ ॥
अब मैं वह जानने योग्य तत्त्व कहूँगा, जिसे जानकर मनुष्य अमरत्व को प्राप्त होता है। वह अनादि परम ब्रह्म न 'सत्' कहा जा सकता है और न 'असत्'।
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श्लोक 14
सर्वव्यापी परमात्मा: सब ओर हाथ-पैर, नेत्र, सिर, मुख और कान वाला
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ १३.१४ ॥
वह परमात्मा सब ओर हाथ-पैर वाला, सब ओर नेत्र, सिर और मुख वाला तथा सब ओर कानों वाला है। वह संसार में सबको व्याप्त करके स्थित है।
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श्लोक 15
परमात्मा का रहस्य: सब इन्द्रियों के प्रकाशक होकर भी इन्द्रियरहित और निर्गुण
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ।
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ॥ १३.१५ ॥
वह परमात्मा सम्पूर्ण इन्द्रियों के विषयों को प्रकाशित करने वाला है, फिर भी स्वयं सब इन्द्रियों से रहित है। वह आसक्ति-रहित होकर भी सबका धारण-पोषण करता है, और गुणों से रहित होकर भी गुणों का भोक्ता है।
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श्लोक 16
परमात्मा सबके भीतर-बाहर, चर-अचर में; सूक्ष्म होने से अज्ञेय, पर दूर भी और समीप भी
बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च ।
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥ १३.१६ ॥
वह परमात्मा सब प्राणियों के बाहर भी है और भीतर भी। वही स्थावर और जंगम रूप भी है। सूक्ष्म होने के कारण वह साधारण दृष्टि से जानने में नहीं आता; वही दूर भी स्थित है और अत्यन्त समीप भी।
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श्लोक 17
अविभक्त होकर भी विभक्त-सा: सबका पालक, संहारक और उत्पादक परमात्मा
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् ।
भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ॥ १३.१७ ॥
वह परमात्मा सब प्राणियों में अखण्ड रूप से स्थित है, फिर भी अलग-अलग शरीरों में विभक्त-सा प्रतीत होता है। उसी जानने योग्य तत्त्व को प्राणियों का धारण-पोषण करने वाला, संहार करने वाला और उत्पन्न करने वाला समझना चाहिए।
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श्लोक 18
ज्योतियों की भी ज्योति: अज्ञान से परे, ज्ञानस्वरूप और सबके हृदय में स्थित परमात्मा
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते ।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् ॥ १३.१८ ॥
वह परमात्मा सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि आदि सभी प्रकाशकों का भी प्रकाशक है और अज्ञान रूपी अन्धकार से परे कहा जाता है। वही ज्ञानस्वरूप, जानने योग्य और तत्त्वज्ञान के साधनों से प्राप्त होने योग्य है, तथा सबके हृदय में विशेष रूप से स्थित है।
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श्लोक 19
क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेय का सार: भक्त को परमात्म-भाव की प्राप्ति
इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः ।
मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते ॥ १३.१९ ॥
इस प्रकार मैंने क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेय का स्वरूप संक्षेप में कहा। मेरा भक्त इसे भलीभाँति जानकर मेरे भाव, अर्थात् मेरे स्वरूप को प्राप्त करने योग्य हो जाता है।
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श्लोक 20
प्रकृति और पुरुष दोनों अनादि हैं; विकार और गुण प्रकृति से उत्पन्न होते हैं
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि ।
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् ॥ १३.२० ॥
प्रकृति और पुरुष, इन दोनों को ही अनादि जान। और जितने भी विकार (इच्छा-द्वेष आदि) तथा गुण (सत्त्व, रज, तम) हैं, उन सबको प्रकृति से उत्पन्न हुआ जान।
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श्लोक 21
कर्तापन में प्रकृति कारण है और भोक्तापन में पुरुष
कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते ।
पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥ १३.२१ ॥
कार्य (शरीर) और करण (इन्द्रियाँ) के कर्तापन में प्रकृति को कारण कहा जाता है, और सुख-दुःखों के भोक्तापन में पुरुष को कारण कहा जाता है।
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श्लोक 22
गुणों में आसक्ति ही जन्म-मरण का कारण: प्रकृति में स्थित पुरुष का भोग
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान् ।
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ॥ १३.२२ ॥
प्रकृति में स्थित जीव प्रकृति से उत्पन्न गुणों के विषयों को भोगता है। इन गुणों के साथ उसकी आसक्ति ही उसके अच्छी-बुरी योनियों में जन्म लेने का कारण है।
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श्लोक 23
देह में स्थित परम पुरुष: उपद्रष्टा, अनुमन्ता, भर्ता, भोक्ता और महेश्वर परमात्मा
उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः ।
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः ॥ १३.२३ ॥
इस शरीर में स्थित वह परम पुरुष साक्षी रूप से देखने वाला, अनुमति देने वाला, धारण-पोषण करने वाला, भोक्ता और महान् ईश्वर है। उसे ही 'परमात्मा' भी कहा गया है।
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श्लोक 24
पुरुष और प्रकृति को गुणों सहित जानने वाला फिर जन्म नहीं लेता
य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ॥ १३.२४ ॥
जो मनुष्य पुरुष को तथा गुणों सहित प्रकृति को इस प्रकार तत्त्व से जान लेता है, वह सब प्रकार से व्यवहार करता हुआ भी फिर जन्म नहीं लेता।
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श्लोक 25
आत्म-दर्शन के अनेक मार्ग: ध्यान, सांख्य (ज्ञान) और कर्मयोग
ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना ।
अन्ये साङ्ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे ॥ १३.२५ ॥
कुछ साधक शुद्ध हुए मन-बुद्धि से ध्यान द्वारा अपने भीतर परमात्मा को देखते हैं। दूसरे लोग ज्ञानयोग (सांख्य) के द्वारा देखते हैं और अन्य लोग कर्मयोग के द्वारा।
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श्लोक 26
श्रवण और श्रद्धा से उपासना करने वाले भी मृत्यु को पार कर जाते हैं
अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते ।
तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः ॥ १३.२६ ॥
कुछ अन्य लोग इस प्रकार स्वयं नहीं जानते, परन्तु दूसरे महापुरुषों से सुनकर श्रद्धापूर्वक उपासना करते हैं। वे श्रवण-परायण लोग भी मृत्युरूप संसार-सागर को निश्चय ही पार कर जाते हैं।
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श्लोक 27
सम्पूर्ण चराचर जगत क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से उत्पन्न होता है
यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ ॥ १३.२७ ॥
हे भरतश्रेष्ठ! जितने भी स्थावर और जंगम प्राणी उत्पन्न होते हैं, उन सबको क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से उत्पन्न हुआ जान।
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श्लोक 28
जो सब प्राणियों में समभाव से स्थित अविनाशी परमेश्वर को देखता है, वही यथार्थ देखता है
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥ १३.२८ ॥
जो मनुष्य नष्ट होने वाले सब प्राणियों में समान रूप से स्थित अविनाशी परमेश्वर को देखता है, वही वास्तव में देखता है।
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श्लोक 29
सर्वत्र समान ईश्वर को देखने वाला अपने द्वारा अपना घात नहीं करता और परम गति पाता है
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् ।
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् ॥ १३.२९ ॥
जो मनुष्य सब जगह समान रूप से स्थित परमेश्वर को समभाव से देखता है, वह अपने द्वारा अपना नाश नहीं करता। इसी कारण वह परम गति को प्राप्त होता है।
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श्लोक 30
सब कर्म प्रकृति द्वारा हो रहे हैं और आत्मा अकर्ता है: यही यथार्थ दर्शन
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः ।
यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति ॥ १३.३० ॥
जो मनुष्य सब प्रकार के कर्मों को प्रकृति द्वारा ही किए जाते हुए देखता है और आत्मा को अकर्ता देखता है, वही यथार्थ देखता है।
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श्लोक 31
जब प्राणियों के पृथक् भाव एक परमात्मा में स्थित दिखें, तब ब्रह्म की प्राप्ति होती है
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥ १३.३१ ॥
जब मनुष्य प्राणियों के अलग-अलग भावों को एक ही परमात्मा में स्थित और उसी से फैला हुआ देखता है, तब वह ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।
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श्लोक 32
अनादि और निर्गुण होने से परमात्मा शरीर में रहकर भी न कर्ता है, न लिप्त होता है
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः ।
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥ १३.३२ ॥
हे कुन्तीपुत्र! अनादि और निर्गुण होने के कारण यह अविनाशी परमात्मा शरीर में स्थित होकर भी न कुछ करता है और न किसी कर्मफल से लिप्त होता है।
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श्लोक 33
आकाश की तरह आत्मा सर्वत्र स्थित होकर भी लिप्त नहीं होता
यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते ।
सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते ॥ १३.३३ ॥
जैसे सर्वत्र व्याप्त आकाश अपनी सूक्ष्मता के कारण किसी भी वस्तु से लिप्त नहीं होता, वैसे ही सब देहों में स्थित आत्मा भी देह के गुण-दोषों से लिप्त नहीं होता।
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श्लोक 34
जैसे एक सूर्य सारे संसार को प्रकाशित करता है, वैसे ही क्षेत्री सम्पूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करता है
यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः ।
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥ १३.३४ ॥
हे भारत! जैसे एक ही सूर्य इस सम्पूर्ण संसार को प्रकाशित करता है, वैसे ही एक ही क्षेत्री (आत्मा) सम्पूर्ण क्षेत्र को चेतन-प्रकाश से प्रकाशित करता है।
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श्लोक 35
ज्ञान-चक्षु से क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का अन्तर जानने वाले परम पद को प्राप्त होते हैं
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा ।
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम् ॥ १३.३५ ॥
जो लोग इस प्रकार ज्ञान-चक्षु से क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को तथा प्राणियों की प्रकृति (माया) से मुक्ति के उपाय को जान लेते हैं, वे परम पद को प्राप्त होते हैं।
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